अमेरिकी विदेश मंत्री ने दिल्‍ली में चीन को मिर्ची लगाने वाला काम किया

नई दिल्‍ली। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ( AntonyBlinken) ने अपनी भारत यात्रा में कुछ ऐसा किया है, जिससे चीन को मिर्ची लग सकती है। बुधवार को ब्लिंकन ने दिल्ली में तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा के एक प्रतिनिधि मंडल से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि सिविल सोसाइटी के नेताओं से मिलकर मुझे खुशी हुई।
दलाई लामा से क्यों चिढ़ता है चीन?
23 मई 1951 को एक समझौते के बाद चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था। दरअसल, चीन कहता है कि तिब्बत तेरहवीं शताब्दी में चीन का हिस्सा रहा है इसलिए तिब्बत पर उसका हक है। तिब्बत चीन के इस दावे को खारिज करता है। 1912 में तिब्बत के 13वें धर्मगुरु दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। उस समय चीन ने कोई आपत्ति नहीं जताई लेकिन करीब 40 सालों बाद चीन में कम्युनिस्ट सरकार आ गई।
विस्तारवादी नीतियों के चलते 1950 में चीन ने हजारों सैनिकों के साथ तिब्बत पर हमला कर दिया। करीब 8 महीनों तक तिब्बत पर चीन का कब्जा चलता रहा। आखिरकार तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने 17 बिंदुओं वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के बाद तिब्बत आधिकारिक तौर पर चीन का हिस्सा बन गया। हालांकि दलाई लामा इस संधि को नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ये संधि जबरदस्ती दबाव बनाकर करवाई गई थी।
मार्च 1959 में खबर फैली कि चीन दलाई लामा को बंधक बनाने वाला है। इसके बाद हजारों की संख्या में लोग दलाई लामा के महल के बाहर जमा हो गए। आखिरकार एक सैनिक के वेश में दलाई लामा तिब्बत की राजधानी ल्हासा से भागकर भारत पहुंचे। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। चीन को ये बात पसंद नहीं आई। 2010 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन के विरोध के बावजूद दलाई लामा से मुलाकात की थी।
-एजेंसियां

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