यूएस ने कहा- कम्प्यूटर प्रोग्रामर्स को H-1B वीजा नहीं

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यूएस ने कहा- कम्प्यूटर प्रोग्रामर्स को H-1B वीजा नहीं

सामान्य कम्प्यूटर प्रोग्रामर को अब विशेषज्ञ प्राप्त पेशेवर नहीं माना जाएगा जो एच1बी कार्य वीजा के मामले में एक अनिवार्य शर्त है
नई दिल्ली। डोनाल्ड ट्रम्प एडमिनिस्ट्रेशन से साफ किया है कि एच-1बी वीजा फ्रॉड और गलत इस्तेमाल से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए जाएंगे। ताजा मामले में अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा ने एक नई व्यवस्था दी है। इसके तहत अब किसी सामान्य कम्प्यूटर प्रोग्रामर को अब विशेषज्ञ प्राप्त पेशेवर नहीं माना जाएगा जो एच1बी कार्य वीजा के मामले में एक अनिवार्य शर्त है। इस कदम का असर एच1बी कार्य वीजा के लिए आवेदन करने वाले हजारों भारतीयों पर पड़ सकता है।

यह व्यवस्था अमेरिका के डेढ़ दशक पुराने दिशानिर्देशों के ठीक उलट हैं जिन्हें नई सहस्राब्दी की जरूरतों को पूरी करने के लिए जारी किया गया था। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवाओं (यूएससीआईएस) ने कहा है कि प्रवेश के स्तर वाले कम्प्यूटर प्रोग्रामर अब सामान्य तौर पर विशिष्ट पेशे में स्थान नहीं पा सकेंगे। यूएससीआईएस ने 31 मार्च को एक ज्ञापन जारी करके यह स्प्ष्ट किया है कि अब कौन सी चीजें विशिष्ट पेशे के लिए जरूरी हैं।

H-1Bvisaइस कदम का असर एक अक्टूबर 2017 से शुरू हो रहे वित्त वर्ष के लिए एच1बी कार्य वीजा के लिए आवेदन करने वाले हजारों भारतीयों पर पड़ सकता है। इसके लिए प्रक्रिया सोमवार से शुरू हो गई है। यूएससीआईएस पॉलिसी मेमोरैंडम में कहा गया है कि, एक व्यक्ति कम्प्यूटर प्रोग्रामर के तौर पर कार्यरत हो सकता। वह सूचना तकनीक कौशल व ज्ञान का इस्तेमाल किसी कंपनी को उसके लक्ष्य को हासिल कराने के लिए कर सकता है। लेकिन उसकी नौकरी उसको विशिष्ट पेश के लिए स्थापित कराने के लिए पर्याप्त नहीं है। यूएससीआईएस ने तर्क दिया कि पुराना मेमोरेंडम ऑक्यूपेशनल आउटलुक हैंडबुक के 1998-1999 और 2000-01 संस्करणों पर आधारित है, जो कि अब अप्रचलित हो गया है।

सिंगापुर भी चला अमेरिका की राह

भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिकी वीजा प्रतिबंधों ने अभी सिरा भी नहीं पकड़ा कि सिंगापुर भी उसी राह चल पड़ा। सिंगापुर में भी भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए वीजा सीमित करते हुए वहां की भारतीय आईटी कंपनियों पर स्थानीय लोगों को ही रोजगार देने का दबाव बनाया जा रहा है। ऐसे में, भारत की कई नामी आईटी कंपनियां किसी और देश में ठौर तलाशने लगी हैं। सिंगापुर का यह कदम भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स के लिए नया संकट बनकर सामने आया है। इसे दो तरह से देखा जा सकता है।

एक तो सीधे-सीधे यह कि सिंगापुर भी अमेरिका की राह चल पड़ा और उसे अपने देश की मेधा की अचानक याद आ गई। दूसरे यह कि इसे सिंगापुर की एक चाल के रूप में क्यों न देखा जाए, क्योंकि भारत ने हाल ही में ट्रेड पैक्ट का हवाला देते हुए व्यापक स्तर पर आर्थिक सहयोग समझौते (सीईसीए) की समीक्षा की बात कही थी, जिसे उसने अपने लिए खतरे के रूप में देखा हो। भारत ने फिलहाल यह समीक्षा स्थगित कर दी है। हालांकि सिंगापुर का यह कदम सीधे-सीधे उस समझौते का उल्लंघन है, जो कहता है कि दोनों देशों के बीच जिन सेवाओं पर समझौते हुए हैं, उनमें कोई इकोनॉमिक नीड्स टेस्ट (ईएनटी) या कोटा नहीं होगा।

सिंगापुर पिछले कुछ वर्षों में आईटी क्षेत्र में जिस तरह बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है, ऐसे में उसकी कुछ महत्वाकांक्षाओं का उभरना अप्रत्याशित नहीं है। लेकिन सिंगापुर को नहीं भूलना चाहिए कि एक तो वह अमेरिका नहीं है। दूसरे, उसके यहां काम करने वाले भारतीय आईटी विशेषज्ञों जैसी योग्यता ढूढ़ना उसके लिए खासी मुश्किल वाला साबित होगा। इतना ही नहीं, उसका आर्थिक ढांचा भी काफी कुछ भारत के साथ व्यापार पर निर्भर है और यदि भारत ने सिंगापुर से सामान आयात-निर्यात पर कमी की या रोक लगाई या शर्तें बदलीं, तो उसे खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

-एजेंसी

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