अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पीएम मोदी को दिया G7 देशों के सम्‍मेलन का औपचारिक न्‍योता

नई दिल्‍ली। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस साल के आख़िर में होने वाले G7 देशों के सम्मेलन के लिए औपचारिक तौर पर न्योता दिया है.
ख़बर के अनुसार ट्रंप पहले विश्व की सात बड़ी आर्थिक शक्तियों के इस समूह के सदस्यों की संख्या बढ़ाने की बात कर चुके हैं.
अख़बार के अनुसार मंगलवार शाम दोनों नेताओं में क़रीब 25 मिनट तक बातचीत हुई, जिस दौरान अमरीका में काले नागरिक जॉर्ज फ्लाड की मौत के बाद जारी तनाव, भारत और चीन सीमा पर जारी तनाव, कोरोना महामारी से मुक़ाबला करने और विश्व स्वास्थ्य संगठन में सुधारों की ज़रूरत के विषय पर चर्चा हुई.
इसी दौरान ट्रंप ने मोदी को इस साल अमरीका में आयोजित होने वाले G7 देशों के सम्मेलन में आने का न्योता दिया.
अख़बार के अनुसार मोदी ने कहा कि सम्मेलन की सफलता के लिए अमरीका और दूसरे सदस्य देशों के साथ कम करने में उन्हें खुशी होगी.
इससे पहले ये मीटिंग जून में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए होने वाली थी.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने G7 देशों का सम्मेलन स्थगित करने की घोषणा के साथ कहा था कि वे भारत, रूस, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया को भी इस बैठक में शरीक होने का न्योता देंगे.
एयरफोर्स वन में उन्होंने संवाददाताओं से कहा, “आज दुनिया में जो कुछ हो रहा है, मुझे नहीं लगता कि ग्रुप सेवन उसका वाजिब तरीके से प्रतिनिधित्व करता है. G7 कुछ देशों एक पुराना पड़ गया समूह बन गया है.”
उन्होंने कहा कि वे भारत, रूस, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया को भी इस सम्मेलन में शामिल होने का न्योता देंगे.
“अगला सम्मेलन सितंबर में या उससे पहले हो सकता है या फिर संयुक्त राष्ट्र की महासभा के बाद. मुमकिन है कि मैं चुनाव के बाद ये बैठक बुलाऊं.”
शुरुआत में यह छह देशों का समूह था, जिसकी पहली बैठक 1975 में हुई थी. इस बैठक में वैश्विक आर्थिक संकट के संभावित समाधानों पर विचार किया गया था. अगले साल कनाडा इस समूह में शामिल हो गया और इस तरह यह जी-7 बन गया. G7 देशों के मंत्री और नौकरशाह आपसी हितों के मामलों पर चर्चा करने के लिए हर साल मिलते हैं.
प्रत्येक सदस्य देश बारी-बारी से इस समूह की अध्यक्षता करता है और दो दिवसीय वार्षिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी करता है. यह प्रक्रिया एक चक्र में चलती है. ऊर्जा नीति, जलवायु परिवर्तन, एचआईवी-एड्स और वैश्विक सुरक्षा जैसे कुछ विषय हैं, जिन पर पिछले शिखर सम्मेलनों में चर्चाएं हुई थीं.
शिखर सम्मेलन के अंत में एक सूचना जारी की जाती है, जिसमें सहमति वाले बिंदुओं का जिक्र होता है. सम्मलेन में भाग लेने वाले लोगों में G7 देशों के राष्ट्र प्रमुख, यूरोपीयन कमीशन और यूरोपीयन काउंसिल के अध्यक्ष शामिल होते हैं.
शिखर सम्मेलन में अन्य देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों को भी भाग लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है. हर साल शिखर सम्मेलन के ख़िलाफ़ बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन होते हैं. पर्यावरण कार्यकर्ताओं से लेकर पूंजीवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले संगठन इन विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होते हैं.
प्रदर्शनकारियों को आयोजन स्थल से दूर रखने के लिए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है.
G7 कितना प्रभावी?
G7 की आलोचना यह कह कर की जाती है कि यह कभी भी प्रभावी संगठन नहीं रहा है, हालांकि समूह कई सफलताओं का दावा करता है, जिनमें एड्स, टीबी और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक फंड की शुरुआत करना भी है. समूह का दावा है कि इसने साल 2002 के बाद से अब तक 2.7 करोड़ लोगों की जान बचाई है.
समूह यह भी दावा करता है कि 2016 के पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने के पीछे इसकी भूमिका है, हालांकि अमरीका ने इस समझौते से अलग हो जाने की बात कही है.
रूस भी कभी शामिल था?
साल 1998 में इस समूह में रूस भी शामिल हो गया था और यह G7 से जी-8 बन गया था. लेकिन साल 2014 में यूक्रेन से क्रीमिया हड़प लेने के बाद रूस को समूह से निलंबित कर दिया गया था.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का मानना है कि रूस को समूह में फिर से शामिल किया जाना चाहिए “क्योंकि वार्ता की मेज पर हमारे साथ रूस होना चाहिए.”
G7 के सामने चुनौतियां
G7 समूह देशों के बीच कई असहमतियां भी हैं. पिछले साल कनाडा में हुए शिखर सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का अन्य सदस्य देशों के साथ मतभेद हो गया था. राष्ट्रपति ट्रंप के आरोप थे कि दूसरे देश अमरीका पर भारी आयात शुल्क लगा रहे हैं. पर्यावरण के मुद्दे पर भी उनका सदस्य देशों के साथ मतभेद था.
समूह की आलोचना इस बात के लिए भी की जाती है कि इसमें मौजूदा वैश्विक राजनीति और आर्थिक मुद्दों पर बात नहीं होती है. अफ्रीका, लैटिन अमरीका और दक्षिणी गोलार्ध का कोई भी देश इस समूह का हिस्सा नहीं है.
भारत और ब्राज़ील जैसी तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं से इस समूह को चुनौती मिल रही है जो जी-20 समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन G7 का हिस्सा नहीं हैं. कुछ वैश्विक अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जी-20 के कुछ देश 2050 तक G7 के कुछ सदस्य देशों को पीछे छोड़ देंगे.
-BBC

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