उर्दू शायर ‘मजाज़’ लखनवी का जन्‍मदिन आज

19 October 1911 जन्‍मे उर्दू शायर ‘मजाज़’ लखनवी का मूल नाम असरारुल हक़ था। उनका जन्म यूपी के रुदौली कस्बे में हुआ था। कुल 44 बरस जीने वाले मजाज़ ने उर्दू शायरी में जो मकाम हासिल किया, वह बहुतों के हिस्से नहीं आया। मजाज़ की मकबूलियत का आलम यह था कि उनकी नज़्में दूसरी भाषाओं में भी खूब सराही गई। मजाज़ उस दौर के शायर हैं जब उर्दू में तरक्कीपसंद शायराना अदब अपना आकार ले रहा था। मजाज़ के कलाम में जगह-जगह रूमानियत भी दिखाई देती है। उनके व्यक्तित्व में संकल्पशीलता और अति संवेदनशीलता का एक अजीब विरोधाभास था। संकल्पशीलता उभरकर सामने आती तो साम्राज्यवाद और फासीवाद के खिलाफ बयान जारी करते, लेकिन जब अति संवेदनशीलता उभरती तो हुस्न, इश्क़ और शराब की गहराइयों में डूब जाते।
खुद उर्दू में उन्होंने भाषा के नए पैमाने गढ़े। पेश हैं उनके चुनिंदा शेर:

हाय वह वक्त कि बेपिये बेहोशी थी,
हाय यह वक्त कि पीकर भी मख्मूर नहीं।

इश्क का ज़ौके-नज़ारा मुफ्त को बदनाम है,
हुस्न खुद बेताब है जलवा दिखाने के लिए।

बहुत मुश्किल है दुनियां का संवरना
तिरी जुल्फों का पेचो-ख़म नहीं है।

आंख से आंख जब नहीं मिलती
दिल से दिल हमकलाम होता है

ख़ुद दिल में रखके आंख से पर्दा करे कोई
हां लुफ्त जब है पा के भी ढूंढा करे कोई।

लाख छिपाते हो मगर छिपके भी मस्तूर नहीं
तुम अजब चीज़ हो, नजदीक नहीं दूर नहीं

कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी
कुछ मुझे भी ख़राब होना था

तुझी से तुझे छीनना चाहता हूं
ये क्या चाहता हूं, ये क्या चाहता हूं।

तेरे गुनहगार, गुनहगार ही सही
तेरे करम की आस लगाए हुए तो हैं।

ये रंग-बहार-आलम है
क्यों फ़िक्र है तुझको ऐ साकी!

मह़फिल तो तेरी सूना न हुई
कुछ उठ भी गए, कुछ आ भी गए।

उनका करम है उनकी मुहब्बत
क्या मेरे नग़्मे, क्या मेरी हस्ती।

ये तो क्या कहिए चला था मैं कहां से हमदम
मुझको ये भी न था मालूम, किधर जाना था

चारागरी सर-आंखों पर, इस चारागरी से क्या होगा
दर्द की अपनी आप दवा है, तुमसे क्या अच्छा होगा
-Legend News

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