उत्‍तर प्रदेश में सियासी बयार बदलने के बाद नौकरशाहों में बढ़ रही बेचैनी, खलबली

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उत्‍तर प्रदेश में सियासी बयार बदलने के बाद नौकरशाहों में बढ़ रही बेचैनी, खलबली

उत्‍तर प्रदेश में शीर्ष नौकरशाही से लेकर पूरे प्रशासनिक महकमे में इस समय बीजेपी और संघ के नजदीकी सूत्रों को तलाशने की बेचैनी दिख रही है
लखनऊ। उत्‍तरप्रदेश में सियासी बयार बदलने के बाद नौकरशाहों में बेचैनी बढ़ गई है, नौकरशाहों के बीच इस खलबली में कुछ अफसर नए संरक्षकों की तलाश में सक्रिय हैं।
कुछ अपनी तैनाती के आकलन भर से सहम रहे हैं। इससे इतर अब तक हाशिए पर रहे अफसरों को उम्मीद की किरण दिख रही है।
ऐतिहासिक बहुमत के बाद बीजेपी अब उत्‍तर प्रदेश में नई सरकार के गठन की तैयारी जोर शोर से हो रही है, शीर्ष नौकरशाही से लेकर पूरे प्रशासनिक महकमे में इस समय बीजेपी और संघ के नजदीकी सूत्रों को तलाशने की बेचैनी दिख रही है।

इस आहट ने तमाम अफसरों के होश उड़ा दिए हैं। ब्लॉक, तहसील और थाना स्तर से लेकर शासन के शीर्ष स्तर तक बेचैनी बढ़ रही है।
उत्तर प्रदेश की सियासी बयार बदलने के साथ ही नौकरशाहों ने अपनी फितरत के अनुरूप रंग बदलने शुरू कर दिए हैं। ब्यूरोक्रेसी में अहम पदों पर तैनाती के लिए जोर आजमाइश की जा रही है। सियासी संतुलन साधने के लिए अफसर संभावित सत्ता शीर्ष के सियासी शक्ति केंद्रों से सेटिंग में जुटे हैं। दूसरी ओर पिछली सरकार में महत्वहीन पदों पर तैनात रहे अफसर भी दांव लगा रहे हैं। कई अफसर सरकार के नए मुखिया का नाम तय होने के इंतजार में हैं ताकि सही जगह निशाना लगाया जा सके। करीब हर पार्टी के चहेते अफसरों को आसानी से पहचाना जा सकता है।

चुनाव नतीजे आने के पहले यह अधिकारी अपने-अपने सजातीय नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर देखने लगे थे। कई अफसर बड़े नेताओं के करीबी नौकरशाहों के घर हाजिरी देने लगे थे। जब सभी अफसर जोर-जुगाड़ में लगे हों तो काम काज क्या होगा सो दफ्तरों-सचिवालय में फाइलें इंतजार में ही पड़ी हैं और काम काज ठप सा है।

जिस तरह उत्तर प्रदेश में राजनीति और अफसरशाही एक दूसरे में घुल मिल गए हैं सो सरकार बदलने की आहट नौकरशाह पहले ही भांप लेते हैं। तभी तो चुनावों के बीच में ही उन स्मारकों की साफ-सफाई शुरू करा दी गई जो बसपा शासन में बनाए गए थे। नौकरशाहों को बसपा के आने की आहट सुनाई दे रही थी लेकिन यह आहट गलत निकली।

बसपा शासन में एक खास वर्ग को प्राथमिकता मिली और फिर सपा शासन में भी यही स्थिति बनी रही। बीजेपी ने लगातार यही आरोप लगाया कि अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से अच्छे और कर्मठ अफसरों को किनारे करके दोनों सरकारों ने जातीय आधार पर तैनाती की।

आम आदमी की जरूरतों, दिक्कतों के हल के लिए थाना और तहसील सबसे अहम केंद्र होते हैं लेकिन वहां जाने वालों को न्याय नहीं मिला।

डेढ़ दशक से यहां होने वाली तैनातियों ने पूरे समाज को प्रभावित किया। पुलिस और शासन में भी बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती में पारदर्शिता नहीं रही।

ऐसा भी नहीं कि योग्य और ईमानदार अफसर मुख्यधारा में नहीं रहे, लेकिन उनकी संख्या कम थी और उन्हें अपने मन-माफिक काम करने नहीं दिया गया। जिस तरह तबादले-दर-तबादले होते रहे, उससे भी नीयत पर लगातार सवाल उठे।

जाहिर है कि अब बीजेपी सरकार बनने के बाद सीएम कार्यालय से लेकर सचिवालय और फील्ड में पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की नए सिरे से तैनाती होगी। ऐसे में यूपी कैडर के दिल्ली में तैनात कई वरिष्ठ अफसरों की वापसी की अटकलें लगने लगी है।

प्रशासनिक हल्कों में दखल रखने वाले और बीजेपी के लिए काम करने वाले कुछ लोग अफसरों की पोस्टिंग को लेकर अभी से सक्रिय भी हो गए हैं हालांकि, यूपी बीजेपी प्रेसिडेंट अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य का कहना है कि सरकार की नीयत के हिसाब से अफसर काम करते हैं।

ज्यादातर अफसर अच्छे होते हैं, लेकिन उन्हें प्रभावशाली बुरे लोग अच्छा काम नहीं करने देते। बीजेपी शुचिता और ईमानदारी को प्राथमिकता देगी। बीजेपी संकल्प पत्र में किए गए हर वादे को पूरा करेगी। -Legend News

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