दो कव‍िताएं प्रेम की: रातों के पास जमा है तेरी भी और मेरी बात

दो कव‍िताऐं प्रेम की, मनुहार की, र‍िश्तों  के नवीनीकरण की ….

1………

अक्सर रातों के पास जमा
तेरी भी और मेरी बात
ना मैं बोलूं ना तू बोले
रात ही करे, बस अब सब बात

ज‍िद पर रहते तो अच्छा है
ना ही करें हम कोई बात
हम दोनों की ज़िद कर देगी
फिर उलझे हुए हालात

ऐसा भी होता देखा है
झटके कोई बढ़ाकर हाथ
कोश‍िश करने में हर्ज़ नहीं
भरो मन में अपने विश्वास

कभी लगे तुम्हें कोई उलझन
कहनी, सुननी हो बात,
दुनियादारी रख कर आना
पाओगे सुकून और वही साथ

मुश्किल और नामुमकिन में
अंतर तुम समझ लो साफ
बिन मेरे रह के देखो तो सही
क्या कहते हैं कुछ तो जज़्बात

2………..

कैसे तुम निश्चित करते हो
मुझे क्या चाह‍िए और क्या नहीं
मेरे प्रेम से बढ़कर दुन‍िया में
कोई र‍िश्ता तुम्हें कुछ देगा नहीं

लोगों की फ़ितरत है मांगने की
कभी दौलत कभी काम करने की
सब लेके तुम्हें कुछ दे देंगे
अहसान तुम्हीं पे जड़ देंगे

फिर आते हो मुझ पर तुम देखो
पर मान मेरा मर जाता है,
फिर भी हर ग़लत फैसला तुम्हारा
स्वीकार मुझे हो जाता है।

तुम खूब खुश रहो जीवन में
एक मुस्कान मगर मुझे भी दो,
या तो हाथ पकड़ते नहीं मेरा
थोड़ी सी अहमि‍यत मुझे भी दो।

सारी उमर मतभेद में काटें हम,
ये तो सरासर बेवकूफी है।
खुद पे नहीं भरोसा तो मुझ पे रखो
ज‍िंदगी तुम्हारी तो थोड़ी मेरी भी है।

 

– कीर्त‍ि स‍िंह

 

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