इसराइल और यूएई के बीच हुए शांति समझौते से तुर्की को मिर्ची लगी

इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने आपसी संबंधों को सामान्य बनाने के लिए एक समझौता किया है. इस समझौते के साथ ही इसराइल ने वेस्ट बैंक में अपने कब्ज़े वाले हिस्सों की विवादास्पद योजनाओं को निलंबित करने पर सहमति ज़ाहिर की है.
इस समझौते के बाद संयुक्त अरब अमीरात पहला ऐसा खाड़ी अरब देश बन गया है जिसने इसराइल के साथ संबंध सामान्य करने के लिए समझौता किया है.
जहाँ यूएई ने इसे क्षेत्र में कूटनीति की ‘जीत’ बताया, वहीं इसरायल ने इसे दोनों देशों के लिए ‘ऐतिहासिक दिन’ कहा
लेकिन इस समझौते पर पूरे विश्व से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. कुछ देशों ने इसका स्वागत किया है, तो कुछ ने इसे ‘ढोंग’ तक कहा है.
तुर्की की नाराज़गी
इसराइल और यूएई के समझौते को लेकर तुर्की ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है.
तुर्की ने कहा कि संयुक्त अरब अमीरात को इतिहास कभी माफ़ नहीं करेगा. तुर्की ने कहा कि यह यूएई का पाखंडपूर्ण व्यवहार है.
तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इतिहास और क्षेत्र के लोगों की अंतरात्मा इसराइल के साथ समझौते पर संयुक्त अरब अमीरात के ‘ढोंगी व्यवहार’ को कभी नहीं भूल पाएगी क्योंकि अपने हितों के लिए उसने यह निर्णय लिया है.
एक लिखित बयान में कहा गया है कि ‘फ़लस्तीनी लोग और प्रशासन इस समझौते के ख़िलाफ़ एक सख़्त प्रतिक्रिया देने को लेकर सही थे.’
“ये बेहद चिंताजनक है, यूएई को अरब लीग द्वारा विकसित ‘अरब शांति योजना’ के साथ चलना चाहिए था. यह ज़रा भी विश्वसनीय नहीं है कि इस तीन-तरफ़ा घोषणा को फ़लस्तीनी लोगों के फ़ायदे का बताया जा रहा है.”
तुर्की के इसराइल के साथ राजनयिक और व्यापारिक संबंध हैं, लेकिन वर्षों से ये संबंध तनावपूर्ण हैं.
2010 में इसराइल के सैनिकों ने ग़ज़ा पट्टी पर एक नाकाबंदी को तोड़ने की कोशिश कर रहे 10 तुर्क कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी थी जो फ़लस्तीनी इस्लामवादी आंदोलन- हमास द्वारा शासित है.
अरब देशों में यूएई इसराइल के साथ संबंध बहाल करने वाला मिस्र (1979) और जॉर्डन (1994) के बाद तीसरा देश बन गया है.
फ़लस्तीनी मान रहे ‘धोखा’
फ़लस्तीनी नेतृत्व ने इस समझौते को यरुशलम और अल-अक़्सा के साथ विश्वासघात करार दिया है.
फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने अपने प्रवक्ता द्वारा जारी एक बयान में यूएई के साथ इसरायल के समझौते की निंदा की.
महमूद अब्बास के वरिष्ठ सलाहकार नबील अबु-रुदाइनेह ने कहा कि “फ़लस्तीनी नेतृत्व यूएई, इसराइल और अमरीका की त्रिपक्षीय आश्चर्यजनक घोषणा को अस्वीकार करता है.”
उन्होंने फ़लस्तीनी मुख्यालय रामल्लाह के बाहर एक बयान पढ़ते हुए कहा कि ये समझौता ‘यरुशलम, अल-अक़्सा और फ़लस्तीनी मक़सद के साथ धोखा’ है.
हमास के एक प्रवक्ता ने कहा कि यूएई ने फ़लस्तीनियों की पीठ में छुरा मारा है.
एक वरिष्ठ फ़लस्तीनी अधिकारी हनान अशरावी ने कहा कि इसराइल को 1967 में फ़लस्तीनी क्षेत्रों में अपने कार्यों के लिए इनाम दिया गया है.
उन्होंने ट्वीट किया, “यूएई इसराइल के साथ अपने गुप्त समझौतों को लेकर खुलकर बाहर आ गया है.”
ईरान ने की निंदा
ईरान के पूर्व उप-विदेश मंत्री हुसैन आमिर अब्दुल्लाहिंया ने समझौते की निंदा करते हुए कहा कि इससे इलाक़े में शांति और सुरक्षा नहीं आएगी.
उन्होंने ट्वीट करके कहा, “यूएई के इस रवैये के लिए कोई तर्क़ नहीं हो सकता. फ़लस्तीन के मक़सद से पीछे हटना, ये एक रणनीतिक ग़लती है. उन्हें यहूदीवाद में उलझा दिया जाएगा.”
मिस्र, जॉर्डन और पश्चिमी देश
यूएई के क़रीबी सहयोगी मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फ़तेह अल-सिसी ने कहा है कि संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल के ‘हमारे क्षेत्र में समृद्धि और स्थिरता लाने के प्रयास’ उनके लिए अहम हैं.
उन्होंने ट्वीट करके कहा, “मैंने फ़लस्तीनी ज़मीन पर इसराइली कब्ज़े पर रोक और मध्य-पूर्व में शांति लाने के लिए अमरीका, संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल के बीच संयुक्त बयान को दिलचस्पी के साथ देखा और सराहना की.”
जॉर्डन और बहरीन ने भी इस समझौते का स्वागत किया है.
जॉर्डन का कहना है कि अगर ये समझौता इसराइल को अपने कब्ज़े में ली गई ज़मीन पर फ़लस्तीनी देश को स्वीकार कराने में सफल होता है, तो ये समझौता शांति-वार्ता को आगे बढ़ा सकता है.
बहरीन का कहना है कि ये समझौता इसराइली कार्यवाही की योजनाओं को रोकेगा और शांति की संभावना बढ़ाएगा.
वहीं ब्रिटेन, फ्रांस और संयुक्त राष्ट्र ने भी इस समझौते का स्वागत किया है और इसे शांति और सुरक्षा लाने वाला प्रयास बताया है.
-एजेंसियां

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