कल है वाजपेय यज्ञ का फल देने वाली Parivartani Ekadashi

कल सोमवार को Parivartani Ekadashi है, ज‍िसे योगिनी एकादशी भी कहते हैं। इस द‍िन भगवान श्री विष्णु शयन शैय्या पर सोते हुए करवट लेते हैं, इसलिए इसे Parivartani Ekadashi भी कहा जाता है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जलझूलनी एकादशी कहते हैं। इसे परिवर्तिनी एकादशी व डोल ग्यारस आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान वामन की पूजा की जाती है। इस बार यह एकादशी 9 सितंबर, सोमवार को है। इस दिन भगवान योग निद्रा के दौरान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। कुछ स्थानों पर ये दिन भगवान श्रीकृष्ण के सूरज पूजा (जन्म के बाद होने वाला मांगलिक कार्यक्रम) के रूप में मनाया जाता है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि और सोमवार का दिन है। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी पद्मा एकादशी के नाम से जानी जाती है। कहते हैं इस दिन भगवान श्री विष्णु शयन शैय्या पर सोते हुए करवट लेते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस बार 9 सिंतबर, सोमवार को पड़ रही है।

इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत करने और विधि-पूर्वक उनकी पूजा करने का विधान है। साथ ही इस दिन अलग-अलग सात अनाजों से मिट्टी के बर्तन भरकर रखने और अगले दिन उन्हीं बर्तनों को अनाज समेत दान करने की भी परंपरा है। जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा।

परिवर्तिनी एकादशी का शुभ मुहूर्त

एकादशी तिथि प्रारम्भ: 8 सितंबर को रात 10 बजकर 41 मिनट से
एकादशी समाप्त: 10 सितंबर सुबह 12 बजकर 31 मिनट पर
पारण का समय: सुबह 7 बजकर 4 मिनट से 8 बजकर 13 मिनट तक।

परिवर्तिनी एकादशी की पूजा विधि
परिवर्तिनी एकादशी के दिन सुबह उठकर सभी कामों से निवृत्त होकर स्नान कर लें। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए विधि-विधान से पूजा करें। सबसे पहले घर में या मंदिर में भगवान विष्णु व लक्ष्मीजी की मूर्ति को चौकी पर स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल पीकर आत्मा शुद्धि करें। फिर रक्षासूत्र बांधे। इसके बाद शुद्ध घी से दीपक जलाकर शंख और घंटी बजाकर पूजन करें। व्रत करने का संकल्प लें। इसके बाद विधिपूर्वक प्रभु का पूजन करें और दिन भर उपवास करें।

सारी रात जागकर भगवान का भजन-कीर्तन करें। इसी साथ भगवान से किसी प्रकार हुआ गलती के लिए क्षमा भी मांगे। अगले दूसरे दिन यानी की 10 सितंबर, मंगलवार के दिन भगवान विष्णु का पूजन पहले की तरह करें। इसके बाद ब्राह्मणों को ससम्मान आमंत्रित करके भोजन कराएं और अपने अनुसार उन्हे भेट और दक्षिणा दे। इसके बाद सभी को प्रसाद देने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें।

-Legend news

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