प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार चंद्रकांत देवताले की पुण्‍यतिथि आज

7 नवंबर 1936 को बैतूल (मध्य प्रदेश) के जौलखेड़ा में जन्‍मे प्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार चंद्रकांत देवताले की मृत्‍यु 14 अगस्त 2017 को हुई थी।
देवताले जी की प्रमुख कृतियाँ हैं- हड्डियों में छिपा ज्वर, दीवारों पर खून से, लकड़बग्घा हँस रहा है, रोशनी के मैदान की तरफ़, भूखंड तप रहा है, हर चीज़ आग में बताई गई थी, पत्थर की बैंच, इतनी पत्थर रोशनी, उजाड़ में संग्रहालय।
उत्तर आधुनिकता को भारतीय साहित्यिक सिद्धांत के रूप में न मानने वालों को भी यह स्वीकार करना पड़ता है कि देवताले जी की कविता में समकालीन समय की सभी प्रवृत्तियाँ मिलती हैं।
देवताले जी को उनकी रचनाओं के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। इनमें प्रमुख हैं- माखन लाल चतुर्वेदी पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान। उनकी कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में और कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं। देवताले की कविता की जड़ें गाँव-कस्बों और निम्न मध्यवर्ग के जीवन में हैं। उसमें मानव जीवन अपनी विविधता और विडंबनाओं के साथ उपस्थित हुआ है। कवि में जहाँ व्यवस्था की कुरूपता के खिलाफ गुस्सा है, वहीं मानवीय प्रेम-भाव भी है। वह अपनी बात सीधे और मारक ढंग से कहते हैं। कविता की भाषा में अत्यंत पारदर्शिता और एक विरल संगीतात्मकता दिखाई देती है।
उन्होंने कवि गजानन माधव मुक्तिबोध पर पीएचडी की थी। कविता संग्रह ‘पत्थर फेंक रहा हूं’ के लिए उन्हें 2012 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। प्रस्तुत है उनकी 4 चुनिंदा रचनाएं-

मेरे होने के प्रगाढ़ अंधेरे को
पता नहीं कैसे जगमगा देती हो तुम
अपने देखने भर के करिश्मे से

कुछ तो है तुम्हारे भीतर
जिससे अपने बियाबान सन्नाटे को
तुम सितार सा बजा लेती हो समुद्र की छाती में

अपने असंभव आकाश में
तुम आजाद चिड़िया की तरह खेल रही हो
उसकी आवाज की परछाई के साथ
जो लगभग गूंगा है
और मैं कविता के बन्दरगाह पर खड़ा
आँखे खोल रहा हूँ गहरी धुंध में
लगता है काल्पनिक खुशी का भी
अन्त हो चुका है
पता नहीं कहाँ किस चट्टान पर बैठी
तुम फूलों को नोंच रही हो
मैं यहाँ दुःख की सूखी आँखों पर
पानी के छींटे मार रहा हूँ
हमारे बीच तितलियों का अभेद्य परदा है शायद

जो भी हो
मैं आता रहूँगा उजली रातों में
चन्द्रमा को गिटार सा बजाऊँगा
तुम्हारे लिए
और वसन्त के पूरे समय
वसन्त को रूई की तरह धुनकता रहूँगा
तुम्हारे लिए
भाप के बिस्तर पर लेटा हुआ एक आदमी
भाप के बिस्तर पर लेटा हुआ एक आदमी
कुछ भी तो नहीं कर रहा है
अंधेरे पर सिर टिकाये
वह इस तरह देख रहा है चीज़ों को

जैसे उनसे माफी मांगते हुए उन्हें
वह क्षमा भी कर रहा है

अब वह सीढ़ियां चढ़ रहा है
बादलों की
अपनी मां को ढूंढता हुआ
उसके एक- दो आंसू
छेद कर रहे हैं
बादलों में
वह आदमी टेलीफोन में उतर गया
वह आदमी टेलीफोन में उतर गया
पुराने पत्थरों और घरों के बारे में
तहक़ीकात करते हुए
उसकी नाक इन्द्रधनुष की तरह बन गयी
आकाश में
उसकी आंखें उड़ते- उड़ते गायब हो गयीं
और फिर पैराशूट की तरह उतरने लगीं धीमे-धीमे

वह सशरीर
आ धमका अपनी कुर्सी पर

उसके देखने भर से
अधर में लटका टाइपराइटर
खटाखट चलने लगा
उसने दस्ताने उतारे
और पत्तियों में छिपी
औरत की पीठ पर
उंगलियों से लिखा
बसन्त

औरत के अदृश्य होते ही
वह एक कवि की तरह
पढ़ने लगा कविता
पत्थरों के बीच
और पत्थर
आहिस्ता- आहिस्ता
सिर हिलाने लगे ।

-Legend News

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