आज ही के दिन दुनिया में आए थे हास्य कवि शैल चतुर्वेदी

हिंदी के सुप्रसिद्ध हास्य कवि और गीतकार शैल चतुर्वेदी आज के दिन ही इस दुनिया में आए थे। हास्य व्यंग के लिए पहचाने जाने जाने वाले शैल चतुर्वेदी ने बॉलीवुड में भी बतौर चरित्र अभिनेता बेहतरीन काम किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राध्यापक के रूप में अपने करियर की शुरूआत करने वाले शैल चतुर्वेदी ने उपहार, चितचोर, नैया, हम दो हमारे दो, चमेली की शादी, नरसिम्हा और क़रीब जैसी हिंदी फिल्मों में काम किया। लोग उनकी समसामयिक राजनीति पर काव्यात्मक व्यंग्य से आज भी लोटपोट हो जाते हैं। 70 और 80 के दशक में बदलते राजनीतिक समीकरणों से उन्होंने खूब खाद-पानी लिया और अपनी काव्यात्मक टिप्पणियों में उसका उपयोग किया।
शैल चतुर्वेदी ने एक कवि और चरित्र अभिनेता के रूप में अपनी पीढ़ी को तो प्रभावित किया ही, आज की जनरेशन पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी।
पेश हैं उनकी कविताओं से चुनिंदा अंश-

सारे काम अपने-आप हो रहे हैं
जिसकी अंटी में गवाह है
उसके सारे खून
माफ़ हो रहे हैं

इंसानियत मर रही है
और राजनीति
सभ्यता के सफ़ेद कैनवास पर
आदमी के ख़ून से
हस्ताक्षर कर रही है।

मूल अधिकार ?
बस वोट देना है
सो दिये जाओ
और गंगाजल के देश में
ज़हर पिये जाओ।

लोकल ट्रेन से उतरते ही
हमने सिगरेट जलाने के लिए
एक साहब से माचिस माँगी,
तभी किसी भिखारी ने
हमारी तरफ हाथ बढ़ाया,
हमने कहा-
“भीख माँगते शर्म नहीं आती?”
ओके, वो बोला-
“माचिस माँगते आपको आयी थी क्या?”
बाबूजी! माँगना देश का करेक्टर है,
जो जितनी सफ़ाई से माँगे
उतना ही बड़ा एक्टर है

गरीबों का पेट काटकर
उगाहे गए चंदे से
ख़रीदा गया शाल
देश (अपने) कन्धों पर डाल
और तीन घंटे तक
बजाकर गाल
मंत्री जी ने
अपनी दृष्टि का संबंध
तुलसी के चित्र से जोड़ा
फिर रामराज की जै बोलते हुए
(लंच नहीं) मंच छोड़ा
मार्ग में सचिव बोला-
“सर, आपने तो कमाल कर दिया
आज तुलसी जयंती है
और भाषण गांधी पर दिया।”

हमारे एक मित्र हैं
रहने वाले हैं रीवाँ के
एजेंट हैं बीमा के
मिलते ही पूछेंगे- “बीमा कब करा रहे हैं।”
मानो कहते हों- “कब मर रहे हैं?”
फिर धीरे से पूछेंगे- “कब आऊँ
कहिए तो दो फ़ार्म लाऊँ
पत्नी का भी करवा लीजिए
एक साथ दो-दो रिस्क कवर कीजिए
आप मर जाएँ तो उन्हें फ़ायदा
वो मर जाएँ
तो आपका फ़ायदा।”
अब आप ही सोचिए
मरने के बाद
क्या फ़ायदा
और क्या घाटा

हमारे एक फ्रैंड हैं
सूरत-शक्ल से
बिल्कुल इंग्लैंड हैं
एक दिन बोले-
“यार तीन लड़के हैं
एक से एक बढ़के हैं
एक नेता है
हर पाँचवें साल
दस-बीस हज़ार की चोट देता है
पिछले दस साल से
चुनाव लड़ रहा है
नहीं बन पाया सड़ा-सा एमएलए
बोलो तो कहता है-
“अनुभव बढ़ रहा है”

पालिटिक्स के चक्कर में
बन गया पोलिटिकल घनचक्कर
और दूसरा ले रहा है
कवियों से टक्कर
कविताएँ बनाता है
न सुनो तो
चाय पिलाकर सुनाता है

तीसरा लड़का डॉक्टर है
कई मरीज़ों को
छूते ही मार चुका है
बाहर तो बाहर
घर वालों को तार चुका है

हरा भरा घर था
दस थे खाने वाले
कुछ और थे आने वाले
केवल पांच रह गए
बाकी के सब
दवा के साथ बह गए
मगर हमारी काकी
बड़े-बूढ़ों के नाम पर
वही थी बाकी
चल फिर लेती थी
कम से कम
घर का काम तो कर लेती थी
जैसे-तैसे जी रही थी
कम से कम
पानी तो पी रही थी
मगर हमारे डॉक्टर बेटे का
लगते ही हाथ
हो गया सन्निपात
बिना जल की मछली-सी
फड़फड़ाती रही
दो ही दिनों में सिकुड़कर
हाफ़ हो गई
और तीसरे दिन साफ़ हो गई
दुख तो इस बात का है
कि हमारी ग़ैरहाज़िरी में मर गई
पाला हमने
और वसीयत दूसरे के नाम कर गई”

एक दिन अकस्मात
एक पुराने मित्र से
हो गई मुलाकात
कहने लगे-“जो लोग
कविता को कैश कर रहे हैं
वे ऐश कर रहे हैं
लिखने वाले मौन हैं
श्रोता तो यह देखता है
कि पढ़ने वाला कौन है
लोग-बाग
चार-ग़ज़लें
और दो लोक गीत चुराकर
अपने नाम से सुना रहे हैं
भगवान ने उन्हें ख़ूबसूरत बनाया है
वे ज़माने को
बेवकूफ़ बना रहे हैं
-एजेंसियां

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