प्रमुख साहित्यकार अशोक वाजपेयी का जन्‍मदिन आज

समकालीन हिंदी के प्रमुख साहित्यकार अशोक वाजपेयी व्यावसायिक तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक पूर्वाधिकारी है, परंतु वह एक कवि के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं।
उनकी विभिन्न कविताओं के लिए सन् 1994 में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा गया। वाजपेयी महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति भी रह चुके हैं। इन्होंने भोपाल में भारत भवन की स्थापना में भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
अशोक वाजपेयी का जन्‍म 16 जनवरी 1941 को मध्‍य प्रदेश के दुर्ग जिले में हुआ।
अशोक वजपेयी अपने कवि कर्म के साथ साहित्य और कलाओं के अनुरागी संस्था के रूप में भी पहचाने और माने जाते हैं। उनका होना और बने रहना कलाओं के सौंदर्य संस्कार के लिए बहुत जरूरी है। अशोक वाजपेयी ने प्रेम की अनुराग की स्फूर्ति की उल्लास की दुनिया कविता में रची तो उसके बरक्स जीवन के कठोर अनुभवों का ताप भी महसूस किया। पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं अशोक जी की कुछ चुनिंदा कविताएं-
एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी पत्तियों से बुलाता है।
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है
आँखों में हरी परछाइयाँ फिसलती हैं
कंधों पर एक हरा आकाश ठहरा है

होंठ मेरे एक हरे गान में काँपते हैं: मैं नहीं हूँ और कुछ बस एक हरा पेड़ हूँ

–हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना!

ओ युवा जंगल बुलाते हो आता हूँ
एक हरे बसंत में डूबा हुआ
आऽताऽ हूँ…।
एक बार जो ढल जाएँगे
एक बार जो ढल जाएँगे
शायद ही फिर खिल पाएँगे।

फूल शब्द या प्रेम
पंख स्वप्न या याद
जीवन से जब छूट गए तो
फिर न वापस आएँगे।
अभी बचाने या सहेजने का अवसर है
अभी बैठकर साथ
गीत गाने का क्षण है।
अभी मृत्यु से दाँव लगाकर
समय जीत जाने का क्षण है।
कुम्हलाने के बाद
झुलसकर ढह जाने के बाद
फिर बैठ पछताएँगे।

एक बार जो ढल जाएँगे
शायद ही फिर खिल पाएँगे।
कोई नहीं सुनता पुकार —
सुनती है कान खड़े कर
सीढ़ियों पर चौकन्नी खड़ी बिल्ली,
जिसे ठीक से पता नहीं कि
डर कर भाग जाना चाहिए या
ठिठककर एकटक उस ओर देखना चाहिए।
-एजेंसियां

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