मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की 221वीं जयंती आज

ऊर्दू के सबसे मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की आज 221वीं जयंती (Mirza Ghalib’s 221th) है. ग़ालिब का जन्‍म 27 दिसंबर 1717 को उत्तर प्रदेश (आगरा) के काला महल में और मौत 15 फरवरी 1869 को दिल्ली में हुई। उन्हें जिंदगी में हर चीज़ का तज़ुर्बा हुआ पर वो हमेशा अधूरी ही रही, मुकम्मल नहीं हो पाई। वे जब चार साल के थे तभी उनके पिता अब्दुल्ला बेग खाँ का इंतेकाल हो गया। वे बचपन से ही अनियंत्रित, स्वच्छंद स्वभाव के थे।
यह स्वभाव पूरी जिंदगी उन पर हावी रहा। जीवन में जिम्मेदारी से कोई अच्छी नौकरी लेकर गृहस्थ जीवन बिताने की ओर उनका ध्यान नहीं गया। उनकी शादी 13 वर्ष की उम्र में नवाब इलाही बख्श खान की बेटी उमराव बेगम से हुई। गालिब की सात संतानें हुईं पर कोई भी जीवित नहीं रह सकी। उनकी शायरी में गम का ये कतरा भी घुलता रहा।
‘इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के’ या फिर ‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है’. जैसी प्रसिद्ध शायरी के लिए पहचाने जाने वाले मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) ने इससे बढ़कर शेर, शायरियां, रुबाई, कसीदा और किताबें लिखें हैं. आप भी इस खास मौके पर पढ़ें उनकी ये बेहद ही खूबसूरत नज्में पढ़ें, जिन्हें पढ़कर आपको एक बार फिर मिर्ज़ा ग़ालिब से प्यार हो जाएगा.
बता दें, साल 2017 में गूगल (Google) ने शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की 220वीं जयंती (Mirza Ghalib 220th Birthday) पर उन्हें डूडल (Doodle) से श्रद्धांजलि दी थी. वहीं, उन पर बॉलीवुड में सोहराब मोदी (Sohrab Modi) की ‘मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)’ नाम की फिल्म (Mirza Ghalib Film, 1954) बनीं. इसके साथ ही टेलीविजन पर गुलज़ार का टीवी सीरियल ‘मिर्ज़ा ग़ालिब (1988)’ (Mirza Ghalib TV Serial, 1988) भी काफी प्रसिद्ध रहा.
मिर्ज़ा ग़ालिब का पूरा नाम असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ ग़ालिब (‎Mirza Asadullah Baig Khan Ghalib) था. इस महान शायर का जन्म 27 दिसंबर 1796 में उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ. वहीं, इन्होंने आखिरी सांस 15 फरवरी 1869 में अपनी ग़ालिब की हवेली, चांदनी चौक (Ghalib ki Haveli, Chandni Chowk) में ली.
उन्होंने कहा था-
शहादत थी मिरी किस्मत में, जो दी थी यह खू मुझको
जहाँ तलवार को देखा, झुका देता था गर्दन को।
यानी मेरा जुनून मुझे बेकार बैठने नहीं देता, आग जितनी तेज है उतनी ही मैं और उसे हवा दे रहा हूं, मौत से लड़ता हूं और नंगी तलवारों पर अपने शरीर को फेंकता हूं, तलवार और कटार से खेलता हूं और तीरों को चूमता हूं। (संदर्भ – दीवान-ए-गालिब)
उधार की शराब : एक बार का वाकया है जब ग़ालिब उधार ली गई शराब की कीमत नहीं चुका सके। उन पर दुकानदार ने मुकदमा कर दिया। अदालत में सुनवाई के दौरान उनसे सवाल-जवाब हुए तो उन्होंने एक शेर पढ़ दिया…
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां,
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन।
एक बार ग़ालिब को अंग्रेजों ने पकड़ लिया और सार्जेंट के सामने पेश किया। उनका वेश देखकर पूछा- क्या तुम मुसलमान हो?
तब ग़ालिब ने जवाब दिया कि मुसलमान हूं पर आधा, शराब पीता हूं, सूअर नहीं खाता।
ग़ालिब की जिंदगी फक्कड़पन में गुजरी। वे अपनी पूरी पेंशन शराब पर ही खर्च दिया करते थे। कभी-कभी इंसान के सामने अभाव और संघर्ष मोटी दीवार खड़ी होती है। आदमी उससे टकराकर टूट भी जाता है तो कभी जीत भी जाता है। जो भी उस दीवार में दरार पैदा करने में कामयाब होता है, मंजिल वही पाता है क्योंकि उन्हीं दरारों से नैसर्गिकता, मौलिकता और रचनात्मकता फूटती है। यही वो चीज है जिसने ग़ालिब को मकबूल बनाया। उन्होंने दर्द को भी एक आनंद का जामा पहनाकर जिंदगी को जिया। उन्होंने ‘असद’ और ‘ग़ालिब’ दोनों नामों से लिखा।
-एजेंसियां

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