आरक्षित वर्ग का वोट पाने के लिए शीर्षासन तो ठीक, लेकिन सवर्णों के वोट बैंक को भी समझना होगा

एससी/एसटी एक्‍ट के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद जिस तरह अफवाहों की राजनीति शुरू हुई और उसके परिणाम स्‍वरूप जिस तरह आरक्षित वर्ग के लोगों ने भारत बंद की आड़ में अराजकता फैलाई, उसने केंद्र की मोदी सरकार को एक ऐसा कदम उठाने पर बाध्‍य कर दिया जो आत्‍मघाती भी साबित हो सकता है।
केंद्र सरकार हालांकि अपने बचाव में लगातार यह कह रही है कि कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा किंतु उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि दुरुपयोग होने की स्‍थिति में वह क्‍या करेगी।
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह इस सवाल के जवाब में यह कहकर पीछा छुड़ाने की कोशिश करते हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था को देखना राज्‍य सरकारों का काम है, लेकिन राज्‍य सरकारें एससी/एसटी एक्‍ट के दुरुपयोग पर कुछ नहीं बोलतीं।
राज्‍य सरकारें कुछ कहेंगी भी कैसे और राजनाथ सिंह क्‍या बोलेंगे क्‍योंकि यदि इस एक्‍ट का दुरुपयोग न हो रहा होता तो क्‍यों कोई न्‍यायालय की शरण में जाता व क्‍यों देश का सर्वोच्‍च न्‍यायालय यह मानते हुए फैसला सुनाता कि एससी/एसटी एक्‍ट का दुरुपयोग हो रहा है और उसके शिकार आम सवर्ण ही नहीं, वो खास सवर्ण भी हो रहे हैं जो अधिकारी वर्ग में आते हैं।
सच तो यह है कि मौके की नजाकत को देखते हुए और 2019 के मद्देनजर केंद्र सरकार ने विपक्षी पार्टियों की धार कुंद करने के उद्देश्‍य से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का तोड़ तो निकाल लिया किंतु उसे संभवत: यह इल्‍म नहीं था कि सवर्णों के बीच उसकी प्रतिक्रिया ऐसी होगी।
कल का भारत बंद सही मायनों में किसी क्रिया की प्रतिक्रिया का ज्‍वलंत उदाहरण है, बावजूद इसके कि बहुत से लोग इससे सहमत नहीं थे।
जहां तक सवाल विपक्षी राजनीतिक दलों का है तो उनमें से कोई कल सवर्णों के साथ खड़ा नहीं हुआ, दलितों की मसीहा मायावती की पार्टी बसपा भी नहीं जबकि अपने शासनकाल में बसपा ने खुद एससी/एसटी एक्‍ट के दुरुपयोग की बात स्‍वीकार की थी और पुलिस को इसका दुरुपयोग रोकने का जिम्‍मा भी सौंपा था।
अन्‍य दूसरे उन राजनीतिक दलों को भी सांप सूंघ गया जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर इस आशय का भ्रम फैलाने में सबसे आगे थे कि मोदी सरकार एससी/एसटी एक्‍ट को समाप्‍त करने जा रही है।
एससी/एसटी एक्‍ट से पहले दहेज उत्‍पीड़न के मामलों का भी दुरुपयोग किए जाने की शिकायतों पर कोर्ट ने संज्ञान लिया था किंतु तब इसे लेकर कोई हंगामा नहीं हुआ क्‍योंकि दहेज एक्‍ट का मामला वोट की राजनीति का हिस्‍सा नहीं था।
सीधी सी बात यह है कि यदि किसी कानून का दुरुपयोग होने लगे और उसकी आड़ लेकर निर्दोष लोगों को टारगेट बनाया जा रहा हो तो उस पर नए सिरे से सोचने में हर्ज क्‍या है।
भारत की पूरी न्‍याय व्‍यवस्‍था इस सिद्धांत पर टिकी है कि चाहे दस दोषी क्‍यों न छूट जाएं किंतु किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। ऐसे में मात्र इस बात के लिए अध्‍यादेश ले आना कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने जांच उपरांत गिरफ्तारी करने की बात कही थी, किसी तरह न्‍याय संगत नहीं माना जा सकता।
यही कारण है कि आज मोदी सरकार के खिलाफ सवर्णों में यह जानते-समझते हुए गुस्‍सा पनपने लगा है कि मोदी सरकार विपक्षी दलों के दबाव, उनके द्वारा फैलाई गई अफवाहों एवं वोट की राजनीति के लिए ही सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में संशोधन करने पर मजबूर हुई।
माना कि इस दौर में सत्ता की खातिर इस तरह के हथकंडे अपनाना राजनीतिक दलों के लिए जरूरी हो गया है लेकिन मोदी सरकार को विपक्ष द्वारा फेंके जाने वाले भ्रम जाल से बचना चाहिए और हर कदम सोच-समझ कर उठाना चाहिए अन्‍यथा दांव उलटा भी पड़ सकता है।
सवर्णों की सहिष्‍णुता या उनके धैर्य को कमजोरी समझने की भूल किसी भी राजनीतिक दल पर भारी पड़ सकती है क्‍योंकि वोट बैंक तो उनका भी है, और इतना भी है कि सत्ता बदलने की सामर्थ्‍य रखता है। ऐसा नहीं होता तो न मायावती को कभी सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लेना पड़ता और न राहुल गांधी खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण साबित करने पर आमादा होते।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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