तीन कव‍िताएं: दर्द को भी…नदी की तरह बहना आना चाहिए

कुछ किस्से और कुछ कहानी छोड़ आए
हम गाँव की गलियों में जवानी छोड़ आए

शहर ने बुला लिया नौकरी का लालच देकर
हम शहद से भी मीठी दादी-नानी छोड़ आए

खूबसूरत बोतलों की पानी से प्यास नहीं मिटती
उस पे हम कुएँ का मीठा पानी छोड़ आए

क्यों बना दिया वक़्त से पहले ही जवाँ हमें,कि
धूल और मिट्टी में लिपटी नादानी छोड़ आए

कोई राह नहीं तकती,कोई हमें सहती नहीं
क्यूँ पिछ्ले मोड़ पे मीरा सी दीवानी छोड़ आए

मन को मार के सन्दूक में बन्द कर दिया हमने
जब से माँ-बाप छूटे,हम मनमानी छोड़ आए
………

तेरे शहर में फिर से आना चाहता हूँ मैं
मेरा दिल फिर से जलाना चाहता हूँ मैं

जो आग लगी लेकिन फिर बुझी नहीं
उसी राख से धुआँ उठाना चाहता हूँ मैं

इक दरख्त पे अब भी तेरा मेरा नाम है
उसे अब शाख से मिटाना चाहता हूँ मैं

तेरे नाम के किताबों में जो गुलाब हैं
उन सब को घर से हटाना चाहता हूँ मैं

जितनी भी उम्र बढ़ाई तेरी मोहब्बत ने
वो एक-एक लम्हा घटाना चाहता हूँ मैं

कैसे जिया जाता है किसी से बिछड़के
बड़े गौर से तुमको बताना चाहता हूँ मैं

……….

दर्द को भी
नदी की तरह बहना आना चाहिए
वर्ना एक जगह पर जमा होकर
यह दर्द, कीचड़ बन जाता है
जो गीला हो या सूखा है
बस केवल बदबू देता है

दर्द को सहेजने का मतलब है
किसी उमड़ती हुई नदी पर बाँध बनाना
जो आवेग और आवेश में आकर
किसी भी दिन बाँध को तोड़कर
कितने की अन्जाने प्रान्तों में घुस सकता है
और एक दिन कोढ़,नहीं तो
नासूड़ बन सकता है

दर्द
अपने कर्मों की जमा-पूँजी है, या
सब जमा-पूँजी का कर्म है
लेकिन दोनो ही सूरतों में
यह टीस कम नहीं देता
या अपना प्रारब्ध बदल नहीं लेता

दर्द
अगर बहकर निकल जाए
तो क्या यह सुख बन जाता है?
या, फिर किसी संक्रामक रोग की तरह फैल जाता है?
जिससे दर्द बाँटने की हिमायत है
बात सोचने की है,कि
दर्द को उससे कितनी राहत है

दर्द रूप बदल कर भी आता है
पहचाने वाले सतर्क रहें,तो भी क्या
दर्द का सामना करना इतना आसान नहीं होता,
जितना इसको भुलाना;
और इन्सान बहुत कुछ भूल कर
बहुत लम्बा जी सकता है।

– सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
नई दिल्ली

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