युवा कवि सलिल सरोज की तीन कविताएं

  1. तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था

क्या हुआ ऐसा कि इस कदर बदल गया है तू
पहले तू मेरी आँखों का पानी भी पढ़ लेता था

वो हँसी- ठिठोली और कहकहे सब छूट गए
यूँ तो बात-बेबात भी तू तो मुझसे लड़ लेता था

मेरी ज़रा सी नाराज़गी से निजात पाने के लिए
तू कितने ही किस्से-कहानियाँ झट गढ़ लेता था

बस कोई लफ्ज़ कील बनके दिल में चुभ गई है
नहीं तो आँधियों-तूफानों से भी तू अड़ लेता था

मैं रहूँ या न रहूँ निगाहों में तेरे काबिज़ हमेशा
पर ख्वाबों-ख्यालों में तो बाँहों में भर लेता था

2. उसने मेरा ही क़त्ल सरेआम किया,गज़ब किया

उसने चूड़ी,बिंदी,कंगन,जेवर,पाजेब सब पहन लिए
और फिर बेपर्दा महफ़िल में आ गयी , गज़ब किया

सत्ता,मद,अहंकार, विलासिता सब तुमको माफ़ है
तुम ने सर से कफ़न तक माँग लिया, गज़ब किया

माँ रोती रही और बाप बेहोश हो गया विदाई पर
और बेटा फिर भी लौट कर नहीं आया,गज़ब किया

पुराने खत, कुछ वक़्त और महकते फूल ज़िंदा हैं
पर उसने मेरा ही क़त्ल सरेआम किया,गज़ब किया

जश्न में बहुत शोर था, बहुत जोर था तुम्हारे नाम का
पर तुमने फिर भी मेरा ही शेर सुनाया , गज़ब किया

3. वो खिलौनों से बहल जाएगा क्या

झूठ गर तूफ़ान उठा ले सर पे
तो सच भी बदल जाएगा क्या

फ़रियाद नहीं पहुँचती उस तक
वो पत्थर है पिघल जाएगा क्या

वो जिस्म से मेरे दूर तो हो गया
रूह से भी निकल जाएगा क्या

जिसे अपनी ताबीर लिखनी है
आज,वो फिर कल जाएगा क्या

जो अपने घर को गिरते देखा है
वो खिलौनों से बहल जाएगा क्या।

-सलिल सरोज

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