इस बार नहीं होगा इंदौर के परंपरागत हिंगोट युद्ध का आयोजन

इंदौर। दिवाली के बाद होने वाले हिंगोट युद्ध का आयोजन इस बार नहीं होगा। कोरोना की वजह से जिला प्रशासन ने यह निर्णय लिया है। इस युद्ध में दो गांव के लोग एक-दूसरे पर आग के गोले बरसते हैं। हिंगोट काफी रोचक होता है, इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। कोरोना के कारण के 200 साल बाद यह परंपरा टूट गई है। इस बार इसका आयोजन नहीं किया जाएगा।
दरअसल, इंदौर जिले के गौतमपुरा और रूणजी गांव के बीच हिंगोट युद्ध होता है। यह परंपरा 200 वर्षों से चली आ रही है। इस युद्ध के दौरान दोनों गांव के लोग एक-दूसरे पर आग के गोले बरसाते हैं। इसमें दर्जनों लोग घायल भी होते हैं। प्रशासन की तरफ से पूरी व्यवस्था गांव में की जाती है। घायल लोगों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाता है। साथ ही मैदान में दोनों तरफ के योद्धाओं को देखने के लिए हजारों लोग भी मौजूद होते हैं। देपालपुर के तहसीलदार बजरंग बहादुर ने कहा कि सरकारी आदेश के कारण कोरोना काल में भीड़ इकट्ठा नहीं करने की इजाजत है। इसलिए हिंगोट युद्ध का आयोजन इस बार नहीं किया जाएगा।
क्या होता है हिंगोट
वहीं लोगों के मन में यह सवाल होता है कि हिंगोट होता क्या है। दरअसल, हिंगोरिया पेड़ के फल को हिंगोट कहते हैं। यह फल नींबू के आकार से बड़ा होता है। साथ ही इस बाहरी आवरण काफी सख्त होता है। लोग बताते हैं कि यह चंबल किनारे जंगलों में अधिक पाया जाता है। हिंगोट युद्ध के पहले पेड़ तोड़ कर हिंगोट को जमा कर लेते हैं। फिर हिंगोट के बारूद भर कर इसको तैयार करते हैं। उसी से एक दूसरे पर हमला करते हैं।
कोई नहीं रोक पाया इस युद्ध को
गांव के लोग बताते हैं कि यह परंपरा 200 वर्षों से चली आ रही है। आज तक इसे कोई नहीं रोक पाया है लेकिन कोरोना की वजह से पहली बार हिंगोट युद्ध नहीं होगा। परंपरा के अनुसार हिंगोट युद्ध हर साल दिवाली के दूसरे दिन होता है।
क्या है मान्यता
हिंगोट युद्ध का आयोजन मुख्य रूप से मालवा अंचल में होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार के गौतमपुरा क्षेत्र में रियासत की सुरक्षा में तैनात सैनिक मुगल सेना के दुश्मन घुड़सवारों पर हिंगोट दागते थे। साथ ही युद्ध से पहले भी हिंगोट से ही अभ्यास करते थे। उसी समय से यह परंपरा चली आ रही है।
-एजेंसियां

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