ये दौरे-इम्तहान है, बस खुदा का नाम लो…ऐसे वक्‍त में काजी…

ये दौरे-इम्तहान है, बस खुदा का नाम लो
ऐसे वक्त में तो काज़ी,नज़ाकत से काम लो

क्या सोचा तुम्हारे कर्मों का हिसाब नहीं होगा
अब अपनी सफाई के सारे साज़ो-सामान लो

ये तमाम रियासतें धरी की धरी ही रह जाएँगीं
अपने गुनाहों की माफी अब सुबहो-शाम लो

जिस्म सारा दुहरा जा चुका बेदिल कामों में
अब तो बच्चों के साथ दो वक्त आराम लो

मंदिर-मस्जिद करके तुमने बहुत घर हैं तुड़वाएँ
अंतिम घड़ी में ही सही,अमन का पैग़ाम लो

कोई मिल्कियत नहीं टिकती उसके दरबार में
अपनी ज़ुबान पे कभी अल्लाह तो कभी राम लो

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मेरे अज़ीम मुल्क़ से ही मेरी पहचान है
मंदिर की घंटी,मस्जिद की अजान है
सब नेमतें अता कर दी मुझपे मेहरबां होके
मेरा मुल्क ही सिर्फ मेरे लिए भगवान है
माँ के आँचल की तरह हिफाज़त की है
हर ज़ख़्म से बचा लेगा,इतना इत्मीनान है
इन्द्रधनुष से भी ज्यादा रंग हैं इसके परिधान में
सबसे अजीमोशान इतिहास होने का गुमान है
दुनिया हर मोड़ इस ओर ताकती रहती है
ज्ञान,विज्ञान और ध्यान का बेजोड़ निशान है

 

– सलिल सरोज

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