पत्रकारिता और पत्रकारों को समर्पित है यह आर्टिकल क्‍योंकि…

अधिकांशत: पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग इस बात से क्षुब्‍ध रहता है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधीन कार्यरत जिला सूचना अधिकारी उन्‍हें तरजीह नहीं देते।
वो पत्रकारों के बीच न सिर्फ भेदभाव बरतते हैं बल्‍कि उन्‍हें बड़े और छोटे में विभक्‍त करते हैं। सतही तौर पर देखें तो उनकी यह पीड़ा जायज लगती है परंतु हकीकत कुछ और है।
हकीकत जानने के लिए पत्रकारों को एक ओर जहां पहले अपने अधिकार और कर्तव्‍य जानने होंगे वहीं दूसरी ओर ‘जिला सूचना अधिकारी’ के पद की वास्‍तविकता और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के औचित्‍य को भी समझना होगा।
सबसे पहले तो पत्रकारों को अपने दिमाग से यह निकालना होगा कि जिला सूचना अधिकारी, कोई उनके ऊपर बैठा सरकारी अधिकारी है। सच तो यह है कि जिला सूचना अधिकारी उनसे है, वो जिला सूचना अधिकारी से नहीं हैं।
जिला सूचना अधिकारी देशभर में जिलाधिकारी के पीआरओ की भूमिका निभाते हैं इसलिए वो ‘यथा राजा तथा प्रजा’ की कहावत को ही चरितार्थ करते हैं। उनसे इससे अधिक की अपेक्षा की भी नहीं जा सकती।
इसके अलावा पत्रकारों को उस दौर की रटी-रटाई पत्रकारिता से बाहर निकलना होगा जिसमें सूचना अधिकारी ही उसके पास सूचना का एकमात्र स्‍त्रोत हुआ करता था। आज हर पल विभिन्न माध्‍यमों से खबरें तैरती रहती हैं। जिला सूचना अधिकारी आपको उनमें से कोई सूचना देने के लिए अधिकृत भी नहीं है। यदि आप उनमें से विश्‍वसनीय खबरों का संकलन कर पाते हैं तो सूचना विभाग चलकर आपके पास आएगा, आपको सूचना विभाग का मुंह देखने की कभी जरूरत महसूस नहीं होगी।
जहां तक सवाल पत्रकारों को मान्‍यता देने अथवा दिलाने का है तो उसका लोभ भी पत्रकारों को छोड़ देना चाहिए क्‍योंकि आज खुद सूचना विभाग ही मान्‍यता का मोहताज है। जनसामान्‍य तो जानता तक नहीं कि जिले में कोई सूचना विभाग भी होता है और वो पत्रकारों को मान्‍यता दिलाता है। आम आदमी के लिए हर वो व्‍यक्‍ति पत्रकार के रूप में मान्‍य है जो उनके बीच काम करता है और उनकी समस्‍याओं को अपने माध्‍यम से उठाता है।
वो समय भी बीत गया जब सूचना विभाग अखबारों की कटिंग चिपकाकर ऊपर तक फाइल भेजा करता था। आज सूचना विभाग जब तक किसी कटिंग पर निशान लगाने की सोचता है, तब तक तो सोशल मीडिया के माध्‍यम से वो खबर शासन के हर वर्ग तक पहुंच चुकी होती है।
सोशल मीडिया के जमाने में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और उसके अधीनस्‍थ कार्यरत जिला सूचना अधिकारी आउट डेटेड हो चुके हैं। जब तक उसे सरकार अपडेट नहीं करती तब तक उसका होना या न होना कोई मायने नहीं रखता। इनफेक्‍ट सूचना अधिकारी का पद औचित्‍यहीन हो गया है।
और हां, जो पत्रकार किसी सरकारी विभाग अथवा सरकार के अधिकारी से कोई मान-सम्‍मान पाने की अपेक्षा रखते हों तो उन्‍हें समझ लेना चाहिए कि सम्‍मान कभी किसी को भीख में नहीं मिलता।
सच तो यह है कि सूचना विभाग ही नहीं, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया भी अपना महत्‍व खो चुकी है। आज तक उसके दायरे में न इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया है और न वेब मीडिया या सोशल मीडिया।
जिस प्रिंट मीडिया के लिए उसका महत्‍व है, वो भी वेब मीडिया के बिना आज अधूरा है इसलिए प्रेस काउंसिल एक ऐसी अपूर्ण संस्‍था बनकर रह गई है जो सिर्फ अधिकार और कर्तव्‍यों की लकीर पीट रही है।
यूं भी यदि किसी पत्रकार पर कोई हमला होता है, या उसका किसी के द्वारा उत्‍पीड़न किया जाता है तो प्रेस काउंसिल के पास कोई दंडात्‍मक कार्यवाही करने का अधिकार पहले से नहीं है। उसके पास अधिकतम अधिकार संस्‍तुति करने का है, जिसे मानना या न मानना संबधित विभाग के अधिकारियों पर निर्भर करता है। और यदि पत्रकार न्‍यायालय की शरण में चला जाता है तो प्रेस काउंसिल के पास दखल देने का उतना अधिकार भी नहीं रह जाता।
आज से ठीक तीन साल पहले प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष न्यायमूर्ति सीके प्रसाद ने कहा था कि सभी प्रकार की मीडिया को इस वैधानिक निकाय के दायरे में लाना चाहिए किंतु आज तक कुछ नहीं हुआ। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी एक स्‍वयंभू संस्‍था का गठन किया हुआ है और वेब मीडिया के लिए तो डोमेन नेम तक अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर रजिस्‍टर्ड होता है। ऐसे में सूचना विभाग का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता।
इन परिस्‍थितियों में पत्रकारों को यदि मांग ही करनी है तो इस बात की करनी चाहिए कि सरकार या तो सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को अपडेट करे या फिर उसे समाप्‍त कर दे।
इस आर्टिकल के साथ लगाया गया इजिप्‍ट के एक पेंटर का पत्रकारों एवं पत्रकारिता को रेखांकित एवं परिभाषित करता हुआ चित्र संभव है कि बहुत से पत्रकारों को समझ में न आए, लेकिन कोशिश जरूर कीजिए क्‍योंकि यदि समझ में आ गया तो अधिकारियों को आपसे शिकायत होगी, आपको अधिकारियों से नहीं।
– सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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