ये आज भी बिना किसी हथियार के शेर-चीतों का करते हैं सामना

अफ्रीका के तंजानिया में रहती है मसाई जनजाति जो आज तक अपनी 5 हजार साल पुरानी परंपराओं से जुड़ी है। यहां के लोगों की बहादुरी के किस्से दुनियाभर में मशहूर हैं।
वाराणसी के रत्नेश पांडे भूगर्भ वैज्ञानिक हैं। वह कनाडा, अमेरिका के साथ-साथ मिडिल ईस्ट, साउथ ईस्ट एशिया और अफ्रीका महाद्वीप के 35 देशों काम कर चुके हैं। रत्नेश पांडे पिछले 11 साल से तंजानिया में काम कर रहे हैं। जब उन्होंने यहां के जंगलों में खतरनाक हिंसक जंगली जानवरों के साथ रहने वाली बहादुर अफ्रीकन जनजातियों के बारे में मीडिया को बताया तो विश्वास नहीं हुआ कि दुनिया के किसी कोने में आज भी प्रकृति के साथ कोई हजारों सालों से इतना गहरा रिश्ता बनाकर रह सकता है। रत्नेश यहां की जनजातियों को करीब से देखते आ रहे हैं और उनसे हमने जानी तंजानिया की मसाई जनजाति की कहानी।
मजबूत हैं 5 हजार साल पुरानी जड़ें
तंजानिया में मुख्यत: तीन तरह की आदिम जनजातियां रहती हैं- मसाई, माकोन्डेय और मनाती। जब दुनिया विकास के नाम पर दौड़ते हुए प्रकृति के प्रति क्रूर हो चुकी है, ये जनजातियां पिछले पांच हजार साल से पुरातन तौर-तरीकों के साथ रह रही हैं। यही नहीं, ये आज भी उसी तरह के पर्यावरण और माहौल में रहने की अभ्यस्त हैं। इन समूहों का मुख्य पेशा गायों का पालन है और इसी के इर्द-गिर्द इनकी अर्थव्यवस्था घूमती है। यहां तक कि ये बहादुर लोग जंगलों में अपनी गायों की रक्षा के लिए जंगली शेर और चीते जैसे खूंखार जानवरों से भी लड़ जाते हैं। बिना किसी हथियार के इन खूंखार जानवरों को मार डालते हैं। हालांकि, कोरोना वायरस की महामारी की वजह से बाजार बंद होने इनके काम पर काफी असर पड़ा है।
हाथ से करते हैं शेर का शिकार
अफ्रीकन मसाई जनजाति के लोग बहुत बहादुर होते हैं। ये लोग कभी-कभी बिना किसी हथियार के ही जंगली शेरों को मार गिराते हैं। कई बार मसाई योद्धा भूखे होने पर शेरों के मुंह से उसका निवाला भी छीन लेते हैं। अकसर जंगल मे मसाई जनजाति के योद्धा जंगली शेरों पर नजर रखते हैं और जब कोई शेर या शेरों का समूह किसी जंगली भैंस, जिराफ, हाथी आदि का शिकार करता है तो मसाई योद्धा उन शेरों को भगा देते हैं और शेरों के उस निवाले को उठा ले जाते हैं। अपने समुदाय में उसका बंटवारा कर देते है।
कभी थे एक-दूसरे के दुश्मन
आज से लगभग 50 साल पहले तक ये तीनों आदिम जनजातियां एक-दूसरे की कट्टर दुश्मन हुआ करती थीं। भूलवश भी अगर एक जनजाति के लोग दूसरी जनजाति के इलाके में चले जाते थे तो दुश्मन उनकी हत्या कर देता था। यहां तक कि सर को काटकर विजय के प्रतीक के रूप मे अपने गांव के बाहर के सबसे ऊंचे पेड़ पर टांग देते थे। इस वजह से मसाई जनजाति के लोगों को लेकर बाहरी दुनिया में ऐसे भ्रम भी फैल चुके हैं कि सोशल मीडिया पर फेक न्यूज़ तक उड़ चुकी हैं। दरअसल, सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर दावा किया गया था कि केन्या की सरकार ने कोरोना वायरस लॉकडाउन लागू कराने के लिए मसाई लोगों को काम पर लगाया है ताकि वे सख्ती से इसका पालन करा सकें। हालांकि, बाद में यह वीडियो फेक निकला।
शादी का वादा…बिना हथियार, शेर का शिकार
यहां के रीति-रिवाज भी बहादुरी पर ही आधारित हैं। इन जनजातियों के उन्हीं पुरुषों को लोग अपनी बेटियां शादी के लिए सौंपते हैं जो जंगलों में जाकर बिना किसी हथियार के कम से कम एक शेर का खात्मा करते हैं। हालांकि आजकल सरकार इनके इलाकों में जाकर इन्हें शिक्षित कर रही है कि ये लोग परंपरा के नाम पर जंगली जानवरों की हत्या ना करें। इससे अब काफी हद तक इस प्रथा पर अंकुश लग चुका है। अभी भी विवाह के लिए लड़का पक्ष कम से कम 30 गायों को लड़की पक्ष को उपहार के तौर पर देता है। उसके बाद ही लड़की पक्ष वाले अपनी लड़की का विवाह लड़के वाले के परिवार में करते हैं।
महिलाओं के रिवाज एकदम अलग
मसाई जनजाति की औरतें अपनी कमर के नीचे के हिस्से को कपड़े से ढकती हैं लेकिन कमर का ऊपरी हिस्सा खुला रहता है। ये महिलाएं जब अपनी सखी-सहेलियों से मिलती हैं तो वे एक-दूसरे पर थूकती हैं। यह खास तरीका उनकी संस्कृति में प्यार और सम्मान जताने का प्रतीक होता है। सिर्फ यही नहीं, यहां के लोग नवजात बच्चों को आशीर्वाद भी थूककर ही देते हं। बेटियों की शादी में पिता उनके माथे पर थूकते हैं। आमतौर पर लोग भी हाथ पर थूकने के बाद सामने वाले से हाथ मिलाते हैं।
हर 15 साल पर होता है ‘ग्रेजुएशन’
Olng’esherr समारोह में मसाई मोरान या वॉरिअर हिस्सा लेते हैं। हर 15 साल में एक बार होने वाले समारोह में हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। इसके साथ ही युवा वॉरिअर को प्रौढ़ घोषित किया जाता है। इस समारोह में 3 हजार मवेशी और 30 हजार बकरियां लाई जाती हैं। इनमें से कुछ की बलि दी जाती है और बाकियों को जश्न के तौर पर खाया जाता है। इस समारोह में पुरुष लाल रंग का चोगा पहनते हैं और ढेर सारे जेवर। समारोह से पहले उनके सिर पर गेरू लगाया जाता है। महिलाएं भी खूब सज-धजकर इसमें हिस्सा लेती हैं। मसाई अगर अपने मेहमान से खुश हो जाते हैं तो उन्‍हें अपनी पत्‍नी एक रात के लिए दे देते हैं। वह इसे शिष्‍टाचार मानते हैं।
11 साल से तंजानिया में हैं रत्नेश
रत्नेश वाराणसी के रहने वाले हैं और उन्होंने साल 2000 मे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से बैचलर ऑफ साइंस इन फिजिक्स ऑनर्स मे ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की। साल 2003 मे बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (BHU) से ही मास्टर ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इन एक्सप्लोरेशन जिओफिजिक्स मे पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की। पिछले 17 साल से ऑइल एंड गैस इंडस्ट्री में काम कर रहे हैं। भूगर्भ वैज्ञानिक के तौर पर रत्नेश तंजानिया में भूगर्भीय प्राकृतिक गैस और तेल को खोजने का काम करते हैं।
-एजेंसियां

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