TV पर TRP की तरह अखबारों, वेब मीडिया और सोशल मीडिया प्‍लेटफार्म पर भी होता है बड़ा घपला

मीडिया से बाहर की दुनिया के बहुत कम लोग इस कड़वी सच्‍चाई से परिचित होंगे कि फेक TRP दिखाने के लिए TV पर ही नहीं, अखबारों में भी फेक सर्क्‍युलेशन और संस्करण, वेब मीडिया में फेक व्‍यूअर्स तथा सोशल मीडिया में फेक फॉलोअर्स से लेकर फेक री-ट्वीट एवं हैश टैग चलाने के लिए भी घपलेबाजी की जाती है।
समाचार और मनोरंजन परोसने वाले TV चैनल्‍स किन फेक तरीकों से अपनी TRP गेन करते हैं, इसकी जानकारी तो आम लोगों को काफी हद तक अब मिल चुकी होगी लेकिन प्रिंट मीडिया, वेब मीडिया और सोशल मीडिया भी खुद को नंबर वन साबित करने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपनाता है, इसका सबको ज्ञान होना ज़रूरी हो गया है।
प्रतिस्‍पर्धा की अंधी दौड़ में क्‍वालिटी की जगह क्‍वांटिटी का बोलबाला होने के कारण मीडिया भी इसका हिस्‍सा बनता चला गया, हालांकि वह अछूता इससे कभी नहीं रहा। तब भी नहीं जब ‘मीडिया’ जैसा शब्‍द ईजाद तक नहीं हुआ था और अखबारों, न्‍यूज़ एजेंसियों या रेडियो (आकाशवाणी) के लिए काम करने वाले सभी क्षेत्रों को ‘प्रेस’ ही कहा जाता था।
सबसे पहले बात प्रिंट मीडिया की
समाचार जगत में कहने को आज भी प्रिंट मीडिया सबसे विश्‍वसनीय माना जाता है परंतु सर्क्‍युलेशन और संस्‍करणों के लिए गलत तरीके अपनाना उसने दो दशक पहले ही शुरू कर दिया था।
अखबारों की प्रसार संख्‍या को वास्‍तविक प्रसार संख्‍या से काफी अधिक दर्शाने के लिए प्रिंट मीडिया जहां एक ओर बड़ी चालाकी के साथ सर्क्‍युलेशन को ‘रीडरशिप’ में तब्‍दील कर लेता है, वहीं संस्‍करणों की बढ़त के लिए भी गलत हथकंडे अपनाता है।
उदाहरण के लिए यदि किसी डेली पेपर की किसी दिन 10 हज़ार प्रतियों छपती हैं तो वह उसकी वास्तव‍िक प्रसार संख्‍या अर्थात सर्क्‍युलेशन माना जाएगा। किंतु अखबार दावा करते हैं कि किसी परिवार में यदि पांच या सात सदस्‍य हैं तो वो सभी उसके पाठक हुए और इस तरह उसका सर्क्‍युलेशन पचास से सत्तर हज़ार प्रतिदिन होता है जबकि ऐसा है नहीं।
प्रथम तो अनेक परिवारों में एक से अधिक अखबार आते हैं क्‍योंकि परिवार के सदस्‍य अपनी-अपनी रुचि तथा ज़रूरत के अनुसार अखबार मंगवाते हैं। दूसरे कई परिवारों में हिंदी अखबार के पाठक अलग होते हैं और अंग्रेज़ी अखबार के अलग। अंग्रेज़ी अखबार के पाठक अमूमन हिंदी अखबार पढ़ना पसंद नहीं करते। इस तरह पांच से सात सदस्‍यों वाले परिवार में यदि एक हिंदी और एक अंग्रेज़ी अखबार आता है तो हिंदी अखबार का यह दावा झूठा हो जाता है कि परिवार के सभी सदस्‍य उसके पाठक हैं।
ठीक इसी प्रकार किसी अखबार के कितने संस्‍करण हैं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी अपनी प्रिंन्‍टिंग प्रेस कितनी जगह हैं जहां वह अखबार छापता है, न कि वह अखबार कहां-कहां भेजा जाता है।
अब हो क्‍या रहा है कि जहां अखबारों की अपनी प्रिंन्‍टिंग प्रेस नहीं हैं और जहां सिर्फ अखबार प्रसारित होता है, उन जगहों को भी अलग संस्‍करण (पब्‍लिकेशन) में शामिल करके सरकारी एवं गैर सरकारी क्षेत्रों से ऊंची विज्ञापन दरें वसूल की जाती हैं जो सीधे-सीधे धोखाधड़ी है।
यहां यह जान लेना आवश्‍यक है कि चाहे सरकारी विज्ञापन की दरें हों या कॉमर्शियल विज्ञापनों की, सबका निर्धारण किसी अखबार के सर्क्‍युलेशन एवं संस्‍करणों से तय होता है। इसी दर में हेराफेरी करने के लिए अखबारों का सर्क्‍युलेशन और संस्‍करण गलत हथकंडे अपनाकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं।
प्रिंट मीडिया को सरकारी विज्ञापन देने के लिए अधिकृत केंद्र सरकार की संस्‍था DAVP से भी किसी अखबार के लिए विज्ञापन की दरें इसी आधार पर तय होती हैं लिहाज़ा तमाम कथित बड़े अखबार इसमें हेराफेरी करके सरकार को प्रतिवर्ष ”हज़ारों करोड़ रुपए” का चूना लगा देते हैं।
वेब मीडिया में भी घपला
जहां तक सवाल वेब मीडिया का है तो उसमें व्‍यूअर्स की संख्‍या बढ़ाने के लिए एक ओर जहां एक ही खबर को कई-कई पन्‍नों पर तीन-चार लाइन वाले कैप्‍शन को फोटो के साथ लगा दिया जाता है ताकि मात्र 40 लाइनों वाली खबर पढ़ने के लिए व्‍यूअर्स मजबूरीवश दस-बारह पेज क्‍लिक करे वहीं दूसरी ओर तकनीक के ज़रिए भी इसमें इज़ाफा कराया जाता है।
तकनीक के ज़रिए फेक व्‍यूअर्स बढ़ाने वाले लोग अपने काम में एक्‍सपर्ट होते हैं। बड़े मीडिया हाउसेस इन्‍हें इस काम के लिए अपने यहां बाकायदा वेतनभोगी बनाकर रखते हैं।
यहां भी ये सारे हथकंडे ऊंची दरों पर विज्ञापन हथियाने और प्रति ‘क्‍लिक’ की संख्‍या बढ़ाने के लिए किया व कराया जाता है।
सोशल मीडिया बना जालसाजी का अड्डा
सोशल मीडिया मसलन फेसबुक, ट्विटर, इंस्‍टाग्राम आदि पर अपने फेक फॉलोअर्स की संख्‍या बढ़ाने के लिए भी लोग इस काम में माहिर संस्‍थाओं की सेवा लेते हैं। इस काम में सबसे आगे रहते हैं विभिन्‍न राजनीतिक दलों के लोग, समाजसेवा के नाम पर प्रोपगंडा खड़ा करने वाले सो-कॉल्‍ड सोशल एक्‍टिविस्‍ट और फिल्‍म तथा खेल जगत के सितारे।
इनमें से कुछ लोग इसका इस्‍तेमाल प्रसिद्धि पाने के लिए करते हैं तो कुछ ‘दाम’ के लिए। कुछ का मकसद शौहरत से सीरत को छिपाना होता है तो कुछ का सस्‍ती शौहरत पाना।
इसके अलावा हैश टैग को ट्रेंड कराने का प्रमुख मकसद सरकारों के काम-काज को अपने-अपने तरीकों से परिभाषित करने और उसके अनुसार माहौल बनाने में बखूबी किया जाने लगा है।
इस काम के लिए पहले किसी अकाउंट से ट्रेंड अलर्ट आता है, फिर पहले से तैयार ‘बोट्स अकांउट्स’ उसे ले उड़ते हैं। वो हैश टैग में शामिल होते हैं और देखते-देखते अधिकतम वायरल करने में सफल रहते हैं। यह सबकुछ बाकायदा पैसे देकर कराया जाता है और यह कराने वाले अपना पूरा टारगेट फिक्‍स करके रखते हैं।
दूसरी ओर प्रसिद्धि प्राप्‍त लोग जिनमें खेल जगत और फिल्‍मी दुनिया के सितारे प्रमुख रूप से शामिल होते हैं, उन्‍हें उनके हर ट्वीट, फोटो, री-ट्वीट आदि के लिए सोशल मीडिया कंपनियां अच्‍छी-खासी रकम देती हैं इसलिए वो अपने अपने फेक फॉलोअर्स बढ़वाते हैं।
पिछले दिनों इसका खुलासा हुआ था जिसमें शामिल कुछ नामचीन हस्‍तियों को मुंबई पुलिस ने समन भी किया। फिलहाल यह मामला अंडर इंवेस्टीगेशन है और प्रसिद्ध पंजाबी रैपर बादशाह से पुलिस पूछताछ भी कर चुकी है।
मुंबई पुलिस के सामने बादशाह ने यह स्वीकार किया है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर व्यूज और लाइक्स बढ़ाने के लिए 72 लाख रुपये की भारी-भरकम रकम खर्च की थी। मुंबई पुलिस की क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट के अधिकारियों ने बताया कि बादशाह ने 7.2 करोड़ व्यूज सोशल मीडिया पर खरीदने के लिए 72 लाख रुपये खर्च किए थे। यह व्यूज बादशाह के मशहूर गाने ‘पागल है’ के लिए खरीदे गए थे ताकि उसे वर्ल्ड रेकॉर्ड में शामिल किया जा सके। पिछले साल बादशाह ने दावा भी किया था कि 24 घंटे के अंदर उनके गाने पर 75 मिलियन व्यूज आए हैं।
गौरतलब है कि 15 जुलाई को एक इंटरनेशनल रैकेट की बात सामने आई थी जो पैसे लेकर सोशल मीडिया पर व्यूज, फॉलोअर्स और लाइक्स बेचता है। यह मामला तब सामने आया जब सिंगर भूमि त्रिवेदी ने शिकायत की थी कि किसी ने उनके नाम से इंस्टाग्राम प्रोफाइल बनाई है और उसका गलत इस्तेमाल कर रहा है।
जो भी हो, कुल मिलाकर जिस तरह सुशांत सिंह केस से बॉलीवुड में ड्रग्‍स रैकेट की घुसपैठ का पता लगा है उसी तरह मीडिया में फेक TRP, सर्क्‍युलेशन, संस्‍करण और फेक व्‍यूअर्स का मामला भी सामने आ सकता है। ज़रूरत है तो बस इस बात की कि फेक TRP से शुरू हुई इस मुहिम को आगे तक ले जाया जाए।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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