नेताओं के कफ़न में जेब भी होती है जनाब, यकीन न हो तो उदाहरण सामने है

कहते हैं कि कफ़न में जेब नहीं होती, यदि कफ़न में भी जेब होती तो लोग अपने साथ क्‍या-क्‍या नहीं ले जाते।
पता नहीं यह फिलॉसफी किसकी थी और किन परिस्‍थितियों में गढ़ी गई लेकिन सच्‍चाई के धरातल पर देखा जाए तो इसमें संदेह ही संदेह नजर आते हैं।
तमिलनाडु के पूर्व मुख्‍यमंत्री और दिवंगत डीएमके नेता एम. करुणानिधि का ताजा-ताजा उदाहरण सामने है।
यूं तो इस देश में कोई भी नेता अपने लिए कभी खुद कुछ नहीं चाहता। वह जो कुछ चाहता है अपने समर्थकों, शुभचिंतकों, जनता जनार्दन और देश की भलाई के लिए चाहता है किंतु कौन नहीं जानता कि इस सबकी आड़ में वह अपनी चाहतें पूरी करता है। जो चाहत जीते-जी पूरी नहीं हो सकती, उसे भी मरने के बाद पूरी करने की व्‍यवस्‍था कर लेता है।
ऐसी ही दो चाहतें करुणानिधि की भी थीं। करुणानिधि चाहते थे कि उन्‍हें न सिर्फ मरीना बीच पर दफनाया जाए बल्‍कि उनकी समाधि भी वहीं अपने राजनीतिक गुरू सी एन अन्नादुरई के बगल में बनाई जाए। साम, दाम, दण्‍ड या भेद…जैसे भी हो…करनी तो मनमानी ही है इसलिए जब राज्‍य सरकार ने चाहत पूरी कराने में असमर्थता जाहिर की तो रात में ही मद्रास हाई कोर्ट खुलवा लिया गया। सुबह कोर्ट में सुनवाई हुई और कोर्ट ने दिवंगत करुणानिधि को अन्नादुरई के बगल में दफनाने की मांग स्‍वीकार करके उनकी समाधि बनाने का मार्ग भी प्रशस्‍त कर दिया। अब करुणानिधि समुद्र की लहरों के सामने मृत्‍यु के बाद भी उस जमीन के टुकड़े पर अनंतकाल तक काबिज़ रहेंगे जिस पर उनकी समाधि बनाई जाएगी।
दरसअल जे जयललिता, एम जी रामचंद्रन और अन्नादुरई…तीनों का अंतिम संस्कार मरीना बीच पर किया गया। करुणानिधि के समर्थक उनका समाधि स्थल यहीं बनाना चाहते थे।
इसके अलावा मरीना बीच चेन्नई शहर में बना समंदर का कुदरती किनारा है। ये उत्तर में फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज से शुरू होता है और दक्षिण में फ़ोरशोर एस्टेट तक जाता है। ये क़रीब छह किलोमीटर में फैला है, जो इसे देश का सबसे लंबा कुदरती शहरी बीच बनाता है।
और ये जगह कई वजह से ऐतिहासिक है। साल 1884 में यहां प्रोमेनेड बना। साल 1909 में यहां देश का पहला एक्वेरियम बना।
आज़ादी के बाद यहां ट्रायंफ़ ऑफ़ लेबर और गांधी की ‘दांडी यात्रा’ वाली प्रतिमा लगाई गई।
साल 1968 में पहली वर्ल्ड तमिल कॉन्फ़्रेंस के समय तमिल साहित्य के कई दिग्गजों की प्रतिमाओं को यहां जगह दी गई।
साल 1970 में यहां अन्नादुरै का मेमोरियल बनाया गया और 1988 में एमजीआर का स्मारक बना।
इसके बाद कामराज और शिवाजी गणेशन का मेमोरियल बनाया गया और हाल में जयललिता का अंतिम संस्कार यहां किया गया था। कुछ समय में उनका स्मारक यहां बन सकता है। बन सकता है क्‍या, बन ही जाएगा।
चेन्नई में मरीना बीच पर्यटकों का पसंदीदा स्थल है। यहां लोग मेमोरियल और प्रतिमाएं, मॉर्निंग वॉक, जॉगर्स ट्रैक, लवर्स स्पॉट, एक्वेरियम देखने पहुंचते हैं। यहां दो स्वीमिंग पूल भी हैं, जिनमें से एक अन्ना स्वीमिंग पूल है।
जिस देश में कोई आम आदमी ताजिंदगी अपने सिर पर एक अदद छत का सपना पूरा करने में सफल नहीं हो पाता, उस देश में नेताओं की फौज एक ओर जहां अपनी सात-सात पीढ़ियों के लिए ऐशो-आराम का मुकम्‍मल बंदोबस्‍त कर जाती हैं वहीं दूसरी ओर अपनी मौत के बाद भी जमीन घेरने में सफल रहती हैं।
करुणानिधि तो एक उदाहरण हैं जिन्‍होंने लड़-मरकर कोर्ट के आदेश से अपनी समाधि का इंतजाम कर लिया अन्‍यथा देश का हर वो नेता जो कभी किसी अच्‍छे पद पर रहा है, मौत के बाद भी जमीन कब्‍जाए हुए है।
वह अपने जीतेजी जनमानस के दिलों पर कभी कब्‍जा कर पाया हो या न कर पाया हो लेकिन मरने के बाद जमीन पर कब्‍जा जरूर कर गया। यही कारण है कि जिन शहरों में लाखों लोग झुग्‍गी-झोंपड़ियों के अंदर पीढ़ी-दर-पीढ़ी नारकीय जीवन जीने को अभिशप्‍त हैं, उन्‍हीं शहरों की सबसे महंगी जमीनों पर दिवंगत नेता कब्‍जा किए हुए हैं।
कितने आश्‍चर्य की बात है कि आम आदमी के लिए आजतक न तो कभी कोई कोर्ट उसकी जरूरत के हिसाब से खुली और न किसी कोर्ट ने उसके सिर पर एक छत जरूरी होने का आदेश पारित किया किंतु नेताओं के लिए आधी रात में कोर्ट खुलती भी हैं और चंद घंटों के अंदर ऑर्डर-आर्डर-ऑर्डर बोलकर न्‍याय होने और न्‍याय दिखने की भी रस्‍म अदायगी करती हैं।
कोर्ट कभी उनके बारे में भी नहीं सोचतीं जो संज्ञेय अपराधों के तहत भी देश की विभिन्‍न जेलों में बंद हैं और उन जेलों में उनके मानवाधिकारों की खुलेआम धज्‍जियां उड़ाई जाती हैं। उन्‍हें जानवरों की तरह ठूंसकर इसलिए दड़बों सरीखी बैरकों में रखा जाता है क्‍योंकि जेलें ओवर क्राउडेड हैं। वो सिर्फ इसलिए उन बैरकों में ठुंसे हैं क्‍योंकि उनकी जमानत देने वाला कोई नहीं। उनकी अपनी हैसियत कोई नहीं। वह किसी नेता या किसी अधिकारी की औलाद नहीं।
एक ओर करोड़ों की तादाद में जिंदा लाशें और दूसरी ओर उंगलियों में गिने जाने लायक माननीय। मानव वो भी हैं और मानव ये भी हैं। वो जैसे तैसे रेंग रहे हैं और ये मरने के बाद भी जमीन कब्‍जा रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना क्‍या कोई और हो सकती है।
सवाल ये नहीं है कि करुणानिधि को मरीना बीच पर दफनाने की अनुमति क्‍यों मिली, सवाल ये है कि कफन में जेब बनाने का सिलसिला कहां जाकर रुकेगा।
आज भी देश की बड़ी आबादी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी अपनी मूलभूत जरूरतें पूरी करने में पूरी जिंदगी खपा देती है। आज भी आम आदमी अपनी उम्र का एक बड़ा हिस्‍सा न्‍याय की उम्‍मीद में जाया कर देता है किंतु उसकी सुनवाई कहीं नहीं होती लेकिन यदि 94 साल का जीवन जीकर, तीन शादियां करने वाला एक शख्‍स भरा-पूरा परिवार तथा उसके लिए अच्‍छी-खासी दौलत छोड़कर मरता है तो उसके लिए सिर्फ इसलिए भी रातों-रात सुनवाई होती है क्‍योंकि उसके कफन में जेब है। क्‍योंकि वह नेता है।
सुना है कि संविधान ने सबको बराबर का हक दिया है, क्‍योंकि संविधान के रचयिता बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर उस वंचित व दलित तबके से आते थे जिन्‍होंने गरीबी भोगी थी। गरीबी को जिया था।
क्‍या यही है बराबरी, क्‍या यही है संविधान से प्राप्‍त बराबरी का हक।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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