दुनिया की नज़रें इस समय मोदी और जिनपिंग पर

ऐसा कम ही देखने में आता है कि एक ही समय में दुनिया के दो अलग-अलग हिस्सों में अहम गतिविधियां हो रही हों और वो भी ऐसी जो सारी दुनिया पर असर डालने का माद्दा रखती हों.
एक तरफ़ जहाँ कनाडा के क्यूबेक में दुनिया की आर्थिक महाशक्तियों में शुमार किए जाने वाले सात देशों के समूह का शिखर सम्मेलन चल रहा है, वहीं चीन के क़िंगडाओ में शंघाई सहयोग सम्मेलन यानी एससीओ की बैठक भी चल रही है.
पहली नज़र में ये लग सकता है कि कहाँ विकसित देशों के समूह के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक और कहाँ भारत, चीन जैसे देशों का समूह. लेकिन दुनिया की अर्थव्यवस्था पर करीबी नज़र रखने वालों का मानना है कि जी-7 देश जहाँ ट्रेड वार के मुद्दे को सुलझाने में व्यस्त रहेंगे, वहीं उनके सामने समस्या अपने सामान को उन उभरते बाज़ारों तक पहुँचाने की है जो कच्चे तेल के बढ़ते दामों से परेशान हैं.
ये देश कोई और नहीं बल्कि दुनिया के अर्थतंत्र पर तेज़ी से उभर रहे देश चीन और भारत हैं.
क़िंगडाओ में शनिवार से शुरू हुई दो दिवसीय शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की बैठक में भारत पहली बार पूर्ण सदस्य के रूप में शिरकत कर रहा है. ये सही है कि शुरुआत में एससीओ में शामिल चीन, भारत, रूस और पाकिस्तान समेत चार मध्य एशियाई देशों का समूह क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दे को लेकर गठित हुआ था, लेकिन बदली परिस्थितियों में इसका मक़सद भी बदला है और अब एससीओ की प्राथमिकता सुरक्षा नहीं बल्कि व्यापार है.
आर्थिक ताक़त
जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन और भारत का बोलबाला रहेगा और सिंगापुर और मलेशिया जैसे देश भी इसमें अहम भूमिका निभाते नज़र आएंगे.
डेस्टिमनी सिक्योरिटीज़ के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुदीप बंदोपाध्याय ने बीबीसी से कहा, “एससीओ की अहमियत काफ़ी बढ़ गई है. वैश्विक ग्रोथ में एशिया प्रशांत क्षेत्र आर्थिक शक्ति के रूप में अहम होता जा रहा है. या यूं कहें कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था का पावरहाउस बनता जा रहा है.”
दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज़ फर्म में आर्थिक विश्लेषक आसिफ़ इकब़ाल भी मानते हैं कि आर्थिक ग्रोथ के मोर्चे पर मौजूदा हालात में चीन और भारत की अनदेखी नहीं की जा सकती.
आसिफ़ कहते हैं, “अगले एक दशक में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अकेले चीन की भागीदारी तकरीबन 30 फ़ीसदी हो जाएगी और भारत का हिस्सा इसमें 10 फ़ीसदी तक पहुँच जाएगा. जहां तक एशिया प्रशांत क्षेत्र की भागीदारी का सवाल है तो अगले पाँच साल में वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसका हिस्सा 40 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है.”
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़े भी आसिफ़ इक़बाल के दावों को सही ठहराते नज़र आते हैं. आईएमएफ़ की हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2023 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में एशिया प्रशांत क्षेत्र की भागीदारी 39 प्रतिशत तक रहने का अनुमान है, जबकि उत्तर अमरीका का शेयर 25 प्रतिशत तक गिर सकता है.
सुदीप बंदोपाध्याय का कहना है कि भारत और चीन की संयुक्त आबादी 260 करोड़ से अधिक है और अमरीका समेत दुनिया की कोई भी आर्थिक महाशक्ति इन दोनों देशों की अनदेखी करने का जोखिम नहीं उठा सकती.
शायद यही वजह है कि पिछले दिनों वॉलमार्ट ने फ्लिपकार्ट के ज़रिये भारत के रिटेल बाज़ार में प्रवेश किया है और अब तक की अपनी सबसे बड़ी डील करते हुए फ्लिपकार्ट में 77 फ़ीसदी हिस्सा ख़रीदा. इसके लिए वॉलमार्ट करीब 1600 करोड़ डॉलर यानी एक लाख 7 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक चुकाएगी.
एससीओ की अहमियत
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप रूस को फिर से जी-7 देशों में शामिल करने की पुरज़ोर वक़ालत कर चुके हैं, लेकिन फिलहाल रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन क़िंगडाओ में हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों पर अपनी चिंता जता चुके हैं और उन्होंने तेल उत्पादक देशों से कच्चे तेल की कीमतों को तर्कसंगत बनाने की अपील भी की है.
एससीओ सम्मेलन में रूस और ईरान भी हिस्सा ले रहे हैं जो कि कुल तेल उत्पादन में अहम हिस्सा रखते हैं.
चीनी राष्ट्रपति और मोदी की पिछले डेढ़ महीने में ये दूसरी मुलाक़ात है. दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने पर ज़ोर दिया है और वर्ष 2020 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर पहुँचाने का लक्ष्य रखा है.
चीन के सीमा शुल्क प्रशासन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2018 तक भारत और चीन का द्विपक्षीय व्यापार 84.44 अरब डॉलर था. यही नहीं, द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूती देते हुए चीन अपने सरकारी बैंक (बैंक ऑफ़ चाइना) की एक शाखा मुंबई में भी खोलेगा.
एससीओ बनाम जी-7
ये सही है कि चीन के क़िंगडाओ में एससीओ सम्मेलन में हिस्सा ले रही आर्थिक शक्तियों में बहुत अच्छा तालमेल नहीं है, लेकिन जी-7 देशों की आपसी समस्याएं इतनी हैं कि वो इनमें ही उलझे हुए हैं.
हाल ही में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने स्टील और एल्यूमीनियम पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी है और इसका सबसे ज़्यादा असर कनाडा, जापान, जर्मनी जैसे देशों पर होगा जो कि जी-7 में उसके सहयोगी हैं.
ट्रंप के इस फ़ैसले से सहयोगी देश काफ़ी ख़फा हैं. कनाडा ने तो अमरीका को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वो “जैसा को तैसा” वाली रणनीति पर चलेगा.
जी-7 दुनिया के औद्योगिक देशों का समहू है, लेकिन इन देशों में से अधिकतर अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था के मुक़ाबले वैश्विक अर्थव्यवस्था में बहुत कम भागीदारी कर रहे हैं. अमरीका में जीडीपी की रफ़्तार 2.3 प्रतिशत के करीब है तो जी-7 में हिस्सा ले रहे चार यूरोपीय देशों की आर्थिक ग्रोथ 2.5 प्रतिशत के आसपास है. साल 2017 में जापान की अर्थव्यवस्था 1.6 प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ी और अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल इसमें और सुस्ती आ सकती है.
दूसरी तरफ़ भारत और चीन में तमाम दिक्कतों के बावजूद अर्थव्यवस्था की रफ्तार कहीँ ज़्यादा है. ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक चीन की आर्थिक ग्रोथ 7.7 प्रतिशत और भारत की आर्थिक ग्रोथ 6.8 प्रतिशत की तेज़ी से बढ़ रही है.
सुदीप बंदोपाध्याय कहते हैं, “चीन और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अलावा विकासशील देशों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी अहम होती जा रही है. ऐसे में एससीओ सम्मेलन विकासशील देशों के बीच द्वीपक्षीय सहयोग को बढ़ाने का बेहतर मंच साबित हो सकता है.”
एससीओ की अहमियत पर सुदीप कहते हैं कि भारत और चीन अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी ये संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि 21वीं सदी एशिया के नाम रहेगी. कम से मौजूदा हालात में तो यही सही साबित होता दिख रहा है.
आर्थिक मामलों के जानकार आसिफ़ कहते हैं, “इससे बड़ी मिसाल और क्या लेंगे कि राष्ट्रपति ट्रंप भी जी-7 क्यूबेक सम्मेलन को बीच में ही छोड़कर सिंगापुर के लिए रवाना हो रहे हैं. यानी उनके लिए भी इस सम्मेलन से बढ़कर उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन से होने वाली उनकी मुलाक़ात है.”
आसिफ़ का कहना है कि मामला एकदम साफ़ है दुनिया भर की नज़रें इस समय एशिया पर हैं न कि पश्चिमी के अमीर देशों के क्लब पर.
-दिनेश उप्रेती

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