पहाड़ों की यातनाएं हमारे पीछे हैं, मैदानों की हमारे आगे

‘पहाड़ों की यातनाएं हमारे पीछे हैं, मैदानों की हमारे आगे.’ जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की यह काव्य पंक्ति मंगलेश डबराल को बहुत प्रिय थी और अक्सर वे इसे दोहराया करते थे.
ऐसा लगता था जैसे पहाड़ों पर न रह पाने और मैदानों को न सह पाने का जो अनकहा दुख है, उसमें ये पंक्तियां उन्हें कोई दिलासा देती हों.
लेकिन अगर दुख था तो वह उनके भीतर था. वे उसे जीवन के कार्य-व्यापार में बाहर नहीं आने देते थे. कातर पड़ना जैसे उन्हें गवारा नहीं था. एक रात साढ़े तीन बजे गाज़ियाबाद के वसुंधरा के एक निजी अस्पताल में भर्ती होने से पहले जिस जनसत्ता सोसाइटी में वे मेरे पड़ोसी थे, वहां हर रोज़ सुबह मैं उन्हें एक झोला लेकर निकलते देखा करता था.
इन दिनों हमारी लगभग रोज़ बात हो रही थी. मुझे मालूम था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है. उनको भी बुखार था और उनकी पत्नी और बेटी को भी. उन्होंने बेटी की कोविड जांच कराई और जब पता चला कि उसे कोविड नहीं है तो मान लिया कि उनको भी नहीं होगा.
यह वह ज़िद थी, ख़ुद को कमज़ोर और बीमार न मानने की, जो अंतिम समय में उनके लिए आत्महंता लापरवाही में बदल गई. वसुंधरा के अस्पताल में वे क़रीब दस दिन लड़ते रहे, उसके बाद उन्हें उनके आग्रह पर एम्स ले जाया गया. लेकिन सिगरेट से पहले से छलनी उनके फेफड़ों पर कोरोना का हमला सांघातिक साबित हुआ.
फिर उनकी किडनी ने उनका साथ देना बंद किया. बुधवार की शाम डायलिसिस की कोशिश हुई, लेकिन इस बार हृदय इसे झेल न पाया. दो दिल के दौरों के साथ वह कहानी ख़त्म हो गई जो एक पहाड़ से चली, कई पहाड़ों और समंदरों के पार गई और अंततः सबको रुला गई.
लेकिन जिस आत्मघाती ज़िद ने उनकी जान ली, शायद यही वह चीज़ थी जिसे लेकर वे उत्तराखंड के गढ़वाल के काफलपानी से कभी उतरे थे और जिसे झोले की तरह लिए जैसे उम्र भर चलते रहे.
विरोध की मार्मिक आवाज़
सत्तर और अस्सी के दशकों में नक्सल आंदोलन से प्रेरित-प्रभावित हिंदी कविता को उन्होंने ‘पहाड़ पर लालटेन’ जैसा अद्भुत संग्रह दिया और बताया कि बहुत तीखे क्रोध और विरोध को कैसे मार्मिक और मद्धिम आवाज़ में भी पूरी तीव्रता से व्यक्त किया जा सकता है, बल्कि उसमें सुलगते-कौंधते रूपकों और बिंबों की मार्फ़त कैसे अर्थों की नई तहें पैदा की जा सकती हैं. उन अर्थों की, जो एक बहुत संवेदनशील जीवन की जुगनू जैसी ख़ुशियों और असमाप्त होते दुखों के बीच बनते थे.
अब वे हिंदी के कवि थे. दिल्ली से लेकर इलाहाबाद तक मैदानों में अपना ठिकाना तलाश रहे थे. अलग-अलग अख़बारों में काम करते हुए और अंततः ‘जनसत्ता’ और दिल्ली को अपना डेरा बनाते हुए.
लेकिन ‘घर का रास्ता’ उन्हें जैसे हमेशा पुकारता रहा. यह उनका दूसरा संग्रह था जिसे उनके पिता ने देखा तो कहा कि तूने घर का रास्ता तो लिखा, लेकिन घर का रास्ता भूल गया. इस उलाहने में जो उदासी शामिल थी, वह बेशक दूसरी तरफ़ ज़्यादा गाढ़ी थी.
लेकिन मंगलेश डबराल के निजी और सार्वजनिक जीवन की यातनाएं और परीक्षाएं और भी थीं. नब्बे के दशक की सोवियतविहीन एकध्रुवीय होती दुनिया में जब पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के नाख़ून लगातार लंबे और तीखे हो रहे थे तो मंगलेश जी फिर अपनी कविता में इनके ख़िलाफ़ खड्गहस्त थे. वे स्मृतियों की मानवीयता के सहारे जैसे एक युद्ध लड़ने की तैयारी में थे.
‘आवाज़ भी एक जगह है’ की कविताएं पिछले संग्रहों से काफ़ी अलग थीं और बहुत सारी पुरानी आवाज़ों, पुराने दृश्यों को समेटने वाली थीं- उन्हें पुराने संगतकार याद आ रहे थे, लोकगायक याद आ रहे थे और वह बहुत कुछ याद आ रहा था जिसने उन्हें मनुष्य बनाया था. ‘नए युग में शत्रु’ तक आते-आते उनका पुराना तीखा स्वर फिर लौटता दिखता है और वे बाज़ार के आकृतिविहीन-मायावी आक्रमण की जैसे एक-एक रग को उजागर करने पर तुले हैं.
जीवनकाल का आख़िरी संग्रह
इस बीच अंतर्राष्ट्रीय पटल और भारतीय परिदृश्य पर सांप्रदायिकता का ऐसा दौर शुरू हो चुका था जिसकी एक परिणति 2002 की गुजरात हिंसा के रूप में सामने आई थी. उस विह्वल-व्यथित कर देने वाली परिघटना पर हिंदी के बहुत सारे कवियों ने कविताएं लिखीं, लेकिन जो मंगलेश डबराल ने लिखा- ‘गुजरात के एक मृतक का बयान’- वह जैसे हमारे भीतर एक सिहरन पैदा करने वाला था. कविता की बीच की पंक्तियां हैं-
‘मेरे जीवित होने का कोई बड़ा मक़़सद नहीं था/और मुझे मारा गया इस तरह जैसे मुझे मारना कोई बड़ा मक़़सद हो/और जब मुझसे पूछा गया तुम कौन हो?/क्या छिपाए हुए हो अपने भीतर एक दुश्मन का नाम/कोई मज़़हब कोई तावीज़/मैं कुछ कह नहीं पाया मेरे भीतर कुछ नहीं था/सिर्फ़ एक रंगरेज एक मिस्त्री एक कारीगर एक कलाकार एक मजूर था/जब मैं अपने भीतर मरम्मत कर रहा था किसी टूटी हुई चीज़ की/जब मेरे भीतर दौड़ रहे थे एल्युमीनियम के तारों की/साइकिल के/नन्हे पहिये/तभी मुझ पर गिरी एक आग बरसे पत्थर/और जब मैंने आख़िरी इबादत में अपने हाथ फैलाये/तब तक मुझे पता नहीं था बन्दगी का कोई जवाब नहीं आता.’
फरवरी 2020 में मंगलेश डबराल का वह संग्रह आया जो उनके जीवनकाल का आख़िरी संग्रह साबित हुआ. ‘स्मृति एक दूसरा समय है.’ अपने पिछले संग्रह ‘नये युग में शत्रु’ में मंगलेश डबराल ने बाज़ार के जिस मायावी संसार को अचूक ढंग से पहचाना था, उसके प्रतिनिधियों की शिनाख़्त इस संग्रह में भी खूब है- ‘वे गले में सोने की मोटी ज़ंजीर पहनते हैं/कमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैं/और मोबाइलों पर बात करते हैं/वे एक आधे अंधेरे और आधे उजले रेस्तरां में घुसते हैं/और खाने और पीने का ऑर्डर देते हैं/वे आपस में जाम टकराते हैं/और मोबाइलों पर बात करते हैं’.
हिंदी कविता की परंपरा में मंगलेश डबराल का मोल इन संक्षिप्त उल्लेखों से नहीं समझा जा सकता. वे असंदिग्ध तौर पर राजनीतिक कवि थे, बाज़ार, पूंजीवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध थे, लेकिन उनमें एक अजब सी मानवीय ऊष्मा थी- अंग्रेज़ी में जिसे ग्रैंड ह्यूमैनिटी बोलते हैं- कुछ वैसी चीज़ जो अचानक इन कविताओं को एक सभ्यतामूलक विमर्श का माध्यम बना डालती थी.
हम पाते थे कि मंगलेश जी की कविताएं जितने राजनीतिक आशय दे रही हैं, उतने ही सांस्कृतिक, पारिवारिक, प्रेमिल और मानवीय अभिप्राय भी- ये विराट विमर्शों वाली नहीं, सूक्ष्म व्यंजनाओं वाली कविताएं हैं जो हमें चुपचाप बदल रही हैं.
मंगलेश गद्यकार भी उतने ही कमाल के थे. ‘एक बार आयोवा’, ‘लेखक की रोटी’ और ऐसी ही ढेर सारी कृतियों का विलक्षण गद्य बताता है कि हम भाषा को इस तरह कैसे बरतें कि वह हमेशा एकाधिक अर्थ प्रकाशित करती हुई सरल रेखा में बनी रहे.
उनके यात्रा संस्मरणों की हाल में आई किताब ‘एक सड़क एक जगह’ को पढ़ना शहरों को, देशों को, दुनिया को एक नई आंख से देखना है- ऐसी पारदर्शी नज़र से जिसमें शहरों की कायाएं ही नहीं, आत्माएं भी साफ-साफ़ दिखने लगती हैं. पेरिस के बारे में वे कुछ इस तरह लिखते हैं-
‘शायद पेरिस के भीतर जितना पेरिस है उससे कहीं ज़्यादा बाहर है. पूरी दुनिया में उसकी जगहें, वस्तुएं, उसके लोग और विचार फेले हुए हैं और पेरिस उन सभी चीज़ों के भीतर फैला हुआ है. वह प्रतीकों की भाषा में बात करता है. घटनाएं, चीज़ें, जगहें, संस्कृति, रहन-सहन सबकुछ. यहां तक कि लोग और विचार भी पेरिस के ब्रांड हैं.’
संपादक और अनुवादक के रूप में
वैसे उनका कोई भी परिचय तब तक अधूरा रह जाएगा जब तक उनके संपादक और अनुवादक रूप की चर्चा न हो. वे बहुत अच्छे अनुवादक थे.
दुनिया के कई बड़े कवियों की कविताओं का उन्होंने बिल्कुल मर्म पकड़ने वाला अनुवाद किया. कुछ साल पहले अरुंधती राय के दूसरे उपन्यास ‘मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ का उनका अनुवाद भी खूब सराहा गया.
पत्रकार और संपादक भी वे विलक्षण थे. बहुत तेज़ी से कॉपी पढ़ते थे और उससे भी तेज़ी से संपादित करते थे. उनके शीर्षकों, उनकी सामग्री- सबमें एक सुचिंतित चयन दिखता. ‘जनसत्ता’ के बेहतरीन दिनों में जो ‘रविवारी जनसत्ता’ उन्होंने निकाला, उसका कोई जवाब नहीं था. बाद में ‘सहारा समय’ का संपादन करते हुए भी उन्होंने कई संग्रहणीय अंक निकाले.
मेरा सौभाग्य था कि वे मेरे पड़ोसी भी रहे और एक दौर के वरिष्ठ सहकर्मी भी. एक मनुष्य के रूप में, एक लेखक के रूप में और एक पत्रकार के रूप में उनको देखने के बहुत सारे अवसर मिले.
वे संवादरत रहते थे और अपने बाद की पीढ़ी के लेखकों-कवियों से उनका संवाद संभवतः दूसरे लेखकों-कवियों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा था. बेशक, उनमें कमज़ोरियां थीं जो हम सबमें होंगी, लेकिन अपने सर्वोत्तम क्षणों में उन जैसी मानवीय आभा वाला मनुष्य मिलना मुश्किल था.
इस साल कोविड ने बहुत दुख दिए, कई तरह से व्यक्ति और समाज के रूप में हमें तार-तार कर गया, लेकिन जाते-जाते इस मानवीय आभा से वंचित कर उसने ऐसा वार किया है जिससे बना ज़ख़्म कभी नहीं जाएगा.
वे जीवन के ख़ाली और खोखले होते जाने को भी पहचानते थे. अपने अंतिम कविता संग्रह की एक कविता ‘समय नहीं है’ में वे लिखते हैं- ‘मैं देखता हूं तुम्हारे भीतर पानी सूख रहा है/तुम्हारे भीतर हवा ख़त्म हो रही है/और तुम्हारे समय पर कोई और क़ब्ज़ा कर रहा है.’
-प्रियदर्शन

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