NPPA द्वारा स्‍टेंट की कीमत निर्धारित कर देने से कई विशेषज्ञों को क्‍यों होने लगा दर्द ?

The stent price to determine by NPPA why many experts began to pain?
NPPA द्वारा स्‍टेंट की कीमत निर्धारित कर देने से कई विशेषज्ञों को क्‍यों होने लगा दर्द ?

NPPA (नेशनल फॉर्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी) ने मंगलवार को स्टेंट की क़ीमत की सीमा निर्धारित कर दी.
नए आदेश के मुताबिक धातु के स्टेंट की कीमत 7260 रुपए होगी. धातु के स्टेंट का इस्तेमाल अब बेहद कम होता है क्योंकि उसके कारण होने वाली पेचीदगियां ज़्यादा हैं.
डीईएस यानी जिन स्टेंट से दवा रिसती है और धमनियों को साफ़ करने में मदद मिलती है, उनकी कीमत 29600 रुपए होगी. बाज़ार में अभी डीईएस की खपत 80 प्रतिशत है.
एक नए तरह की प्राकृतिक तरीके से घुल जाने वाली या बायोडिग्रेडेबल स्टेंट की कीमत भी 29,600 रुपए तक रखी गई है.
पिछले 10 साल में दिल के ऑपरेशनों की संख्या पांच गुना बढ़ गई है.
2006 में ये संख्या 40,000 थी जबकि 2013 में ये बढ़कर 2 लाख 20 हज़ार पहुंच गई थी.
एक आंकड़े के अनुसार भारत में 3.2 करोड़ लोग हृदय रोगी हैं और हर वर्ष इससे 16 लाख लोगों की मौत होती है.
जनवरी में 42 वर्षीय विकास रंजन को दिल में दर्द महसूस हुआ.
पता चला कि इस कम उम्र में उनके दिल की धमनियों में रुकावट है.
डॉक्टर ने स्टेंट लगाने की सलाह दी. स्टेंट की मदद से दिल की जाम धमनियों को साफ़ किया जाता है.
एक विदेशी कंपनी के स्टेंट का इस्तेमाल किया गया और इसका बिल था एक लाख 28 हज़ार रुपए का.
अस्पताल से छूटने के बाद विकास ने जांच में पाया कि आयातित स्टेंट की कीमत मात्र 23 हज़ार रुपए है.
उन्हें गुस्सा तो बहुत आया लेकिन शांत रहे. विकास कहते हैं, “मैंने पाया कि आपका बिल इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप किस अस्पताल में इलाज करवा रहे हैं. सरकारी अस्पताल में वही स्टेंट 50-60 हज़ार में मिल जाता है.”
भारत में स्टेंट लगवाने की पूरी प्रक्रिया तीन से पांच गुना कम होने के कारण विदेश से भी कई लोग भारत आते हैं.
इस ताज़ा कदम से आम लोगों को फ़ायदा होगा लेकिन कई विशेषज्ञ इससे खुश नहीं हैं.
आइए जानते हैं क्या हैं बहस के मुद्दे:

1. उपलब्ध स्टेंट की क्वालिटी पर असर पड़ेगा: आलोचक कहते हैं कि इस फ़ैसले से भारत में उपलब्ध स्टेंट की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा और कंपनियां अब महंगे अच्छे स्टेंट बाज़ार में उपलब्ध नहीं करवाएंगी. भारत में एंजियोप्लास्टी के पिता कहे जाने वाले डॉक्टर मैथ्यु सैमुएल कलारिकाल के अनुसार इस फ़ैसले से भारत में आने वाले विदेशी रोगियों की संख्या पर असर पड़ सकता है. हालांकि एनपीपीए प्रमुख भूपेंद्र सिंह इस बात से इंकार करते हैं.

2. क्या विदेशी स्टेंट भारतीय स्टेंट से बेहतर हैं? : कई भारतीयों की सोच है कि विदेशी स्टेंट भारतीय स्टेंट से बेहतर हैं. भूपेंद्र सिंह के अनुसार दोनो में कोई फ़र्क नहीं है, चाहे वो 10 हज़ार की हो या 80 हज़ार की.
वो कहते हैं, “सभी एक काम करते हैं और (वो) सुरक्षित हैं.”
डॉक्टर मैथ्यू के मुताबिक कोई भी भारतीय स्टेंट अमरीकी एजेंसी एफ़डीए से मान्यता प्राप्त नहीं हैं और अभी तक ऐसी कोई स्टडी नहीं हुई है जो ये साबित करे कि विदेशी स्टेंट भारतीय स्टेंट से बेहतर हैं. उनके अनुसार इसका कारण ये है कि भारतीय स्टेंट कंपनियों ने कभी खुद को विदेशी स्टेंट के मुकाबले में पेश ही नहीं किया है.
वो कहते हैं अगर भारतीय स्टेंट के कारण कोई पेचीदगी हुई, तो इसकी ज़िम्मेदारी एनपीए और भारतीय सरकार पर होगी.
3. क्या इस कदम से शोध पर असर पड़ेगा? : भारत की सबसे बड़ी स्टेंट बनाने वाली कंपनी मेरिल के प्रेसिडेंट राम शर्मा कहते हैं इस फ़ैसले से ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम पर असर पड़ेगा. उन्हें डीईएस स्टेंट की कीमत पर रोक लगाने से आपत्ति नहीं लेकिन नई तकनीक से बनाई जा रही बायोडिग्रेडबल स्टेंट की कीमत को भी 29600 रुपए तक सीमित रखने पर आपत्ति है.
वो कहते हैं, “भारत में हम पहली कंपनी हैं जिन्होंने ये प्रोडक्ट बनाया है और आविष्कार किया है. इस कदम से हमारी जैसी भारतीय कंपनियों को मारा जा रहा है. हम बहुत सारे नए स्टेंट पर रिसर्च कर रहे हैं लेकिन दाम सीमित करने के बाद ये कौन करेगा. मुझे उन्हें बंद करना पड़ेगा.”
भूपेंद्र सिंह इस आरोप से इंकार करते हैं. वो कहते हैं कि कंपनियां 65 से 70 प्रतिशत के मुनाफ़े पर काम कर रही हैं और दाम कम होने से ज़्यादा लोग स्टेंट का इस्तेमाल कर पाएंगे जिससे कंपनियों का मुनाफ़ा बढ़ेगा.
भूपेंद्र कहते हैं, “अगर कोई कंपनी कहती है कि हमारा प्रोडक्ट बेहतर है और इससे ज़िंदगी एक या दो साल बढ़ जाएगी, या इससे कोई पेचीदगी नहीं होगी, तो वो इस बात को आकर साबित करें और हम उसके लिए ज़्यादा कीमत तय कर सकते हैं.”
भूपेंद्र सिंह कहते हैं कि ज़्यादा दाम से कंपनियों को होने वाला मुनाफ़ा शोध में नहीं लोगों की जेबों में जा रहा था. उधर कंपनियों का कहना है कि वो आठ से 10 प्रतिशत मुनाफ़े पर काम कर रहे हैं और सारा मुनाफ़ा अस्पतालों के पास जा रहा था.
4. क्रियान्वयन पर आपत्ति: राम शर्मा कहते हैं कि वो सरकार के कदम से सहमत हैं लेकिन जिस तरह से आदेश को क्रियान्वयन किया गया वो सही नहीं है. वो कहते हैं कि जिस तरह से कंपनियों को आदेश दिया गया कि वो तुरंत दाम कम करें, नए प्राइसिंग लेबल लगाएं, वो संभव नहीं है. अधिकारी इस आरोप से इंकार करते हैं.
5. स्टेंट के दाम के लिए कौन ज़िम्मेदार?: राम शर्मा, भूपेंद्र सिंह, सभी का इशारा अस्पतालों की ओर है, कि अस्पताल स्टेंट का दाम बढ़ा देते थे. उनका कहना है कि स्टेंट के व्यापार में अस्पताल सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा कमाते थे और उनकी कोई जवाबदेही नहीं थी. कई जगह जहां स्टेंट की ज़रूरत नहीं है वहां भी अस्पताल इसका इस्तेमाल करते थे लेकिन डॉक्टर मैथ्यू सैमुएल कलारिकाल के मुताबिक कुछ अस्पतालों की ग़लती के कारण सभी अस्पतालों को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं. राम शर्मा को डर है कि स्टेंट के दाम गिरने के बाद अस्पताल अब स्टेंट लगाने की डॉक्टरी फ़ीस के अलावा दूसरे दाम बढ़ा सकते हैं.
6. राजनीति: कई लोगों का मानना है कि इसमें राजनीति ज़्यादा है लोगों का ध्यान कम और इस कदम के माध्यम से ये संदेश दे रही है कि उसे लोगों की चिंता है. भूपेंद्र सिंह के अनुसार ये सही नहीं है और इस पर बहुत दिनों से काम चल रहा था.
7. क्या करे उपभोक्ता: डॉक्टर सैमुएल के मुताबिक स्टेंट लगाने से पहले उपभोक्ता स्टेंट के दाम के अलावा विकल्प पर जानकारी ज़रूर हासिल कर लें और जहां भी मन में सवाल उठे, उन्हें अस्पताल के सामने ज़रूर रखें.
-BBC

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