श्रीलंका के पीएम ने स्‍वीकार किया, सरकार की प्रतिष्ठा पर दाग लगा है

कोलंबो। श्रीलंका में ईस्टर के दिन हुए धमाकों को लेकर सरकार और प्रशासन भी कठघरे में है। इंटेलिजेंस इनपुट होने के बाद भी इन धमाकों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, इसके कारण नागरिक गुस्से में हैं। भारत के एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में श्रीलंका के पीएम रानिल विक्रमसिंघे ने माना कि सरकार की प्रतिष्ठा पर दाग लगा है और इसे मिटाना होगा।
क्या आप मानते हैं कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच संवाद की कमी का खामियाजा इतने बड़े स्तर पर भुगतना पड़ा?
यह एक मिली-जुली सरकार है और इस सरकार पर कई बड़े दाग लग चुके हैं। अगर रक्षा मंत्रालय को मिली सूचना को विभागों तक पहुंचाया जाता तो भी इस धमाके को रोका जा सकता था।
पुलिस और कुछ दूसरी एजेंसियां सूचना के आधार पर काम कर सकती थी… अगर वह सब हुआ होता तो शायद मुझे नहीं भी पता होता, तब भी यह रोका जा सकता था इसलिए सवाल मुझ पर नहीं है, सवाल यह है कि सिस्टम ने ठीक तरह से काम नहीं किया।
तो क्या यह मान लें कि इंटेलिजेंस स्तर पर सूचना पहुंचाने में चूक हुई है?
नहीं, ऐसा नहीं है। यह मामला रक्षा मंत्रालय से जुड़ा हुआ है। प्रेसीडेंट ने इसे देखने के लिए कमेटी का गठन किया है, लेकिन उन्होंने सूचना पर कार्यवाही की होती और मुझे इसकी जानकारी होती तो क्या होता जैसे सवाल अब बेमानी हैं।
आप जनता के बीच जाकर कह रहे हैं इंटेलिजेंस रिपोर्ट आपको नहीं दी गई थी, खुद प्रेसीडेंट भी यही कह रहे हैं। क्या यह सरकार के खराब प्रदर्शन को नहीं दिखाता?
हां, मैंने कहा कि मुझे इंटेलिजेंस रिपोर्ट नहीं दी गई, अब हमें मिलकर यह सोचना होगा कि ऐसा आखिर हुआ क्यों।
क्या आपको अब इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिल रही हैं?
हां, मुझे ब्रीफिंग दी जाती है।
क्या आप और राष्ट्रपति देश के मौजूदा हालात और सुरक्षा पर चर्चा के लिए मुलाकात करते हैं?
हम कैबिनेट मीटिंग और सुरक्षा काउंसिल की मीटिंग में अक्सर मिलते हैं।
अगर आपके और राष्ट्रपति के बीच बेहतर तालमेल होता और सबसे जरूरी भरोसा होता तो क्या इन आतंकी हमलों को रोका जा सकता था?
सवाल यह है कि सूचना के बाद भी कार्यवाही क्यों नहीं हुई। चलिए एक बार के लिए मान लेते हैं कि मेरे पास सूचना होती और मैं मानकर चल रहा होता कि पुलिस ने ऐक्शन लिया है लेकिन असल में कुछ नहीं किया जाता तो तब भी परिणाम यही होते। शीर्ष पर बैठे वो कौन लोग हैं जिन्होंने अपना काम नहीं किया? जहां तक कि मेरा सवाल है मैं शीर्ष पद पर हूं। मुझे सूचना दी जा सकती थी और मैं मानकर चल रहा होता कि सभी स्तर पर जरूरी उपाय किए जा रहे हैं, तब भी शायद परिणाम ऐसे ही होते। मेरी जानकारी में कुछ नहीं था यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है कि इसे रोकने के लिए कुछ कार्यवाही नहीं की गई।
लोगों के बीच में बहुत गुस्सा है। क्या सरकार को सारा दोष लेना चाहिए?
जिन सरकारी अंगों ने काम नहीं किया उन्हें तो इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी। लोगों का गुस्सा समझ में आता है।
देश में ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यक डरे हुए हैं। दो अल्पसंख्यक समुदाय का भरोसा जीतने के लिए आप क्या कर रहे हैं?
ईसाई समुदाय का डर हम समझ रहे हैं। मैंने उनके साथ काफी वक्त बिताया है, 3 घंटे तक मैं ईसाई पादरी और अन्य लोगों के साथ रहा। मुस्लिमों को भी डर है कि कहीं प्रतिक्रिया में उन्हें चोट न पहुंचाया जाए। कुछ छोटी-मोटी घटनाएं हुईं हैं, लेकिन इन्हें धार्मिक संघर्ष का नाम नहीं दिया जा सकता।
-एजेंसियां

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