राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों पर राजनीतिक क्षत्रपों का राज

ग्वालियर। हमेशा की तरह इस बार भी राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों पर राजनीतिज्ञों की दखलंदाजी पर्दे के पीछे जारी रही। केन्द्रीय सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी के कई दिग्गज राजनीतिज्ञ इस बार अपने-अपने नुमाइंदों को अर्जुन, द्रोणाचार्य और ध्यानचंद पुरस्कार दिलाने में कामयाब रहे हैं। कहने को खेल मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के लिए हर साल की तरह इस बार भी 12 सदस्यीय टीम का गठन किया गया था लेकिन अनुशंसित नामों की लिस्ट देखकर तो यही लगता है कि इस टीम द्वारा नियम-कायदों की जगह राजनीतिज्ञों के रसूख और उनके मंसूबों को ही अधिक तवज्जो दी गई है।

खेल मंत्रालय द्वारा इस बार राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के लिए दी गई आनलाइन छूट के चलते बेशक लोगों ने अपने-अपने नामांकन करने में चैन की सांस ली हो लेकिन 17 और 18 अगस्त को नई दिल्ली में जो हुआ उससे 444 लोगों को निराशा हाथ लगी है। इस बार विभिन्न राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के लिए 506 लोगों ने नामांकन किए थे जिनमें चयन समिति द्वारा खेल मंत्रालय को 62 नामों की अनुशंसा की गई है। इन 62 लोगों में लगभग एक दर्जन सिफारिशी खिलाड़ी और प्रशिक्षक शामिल हैं। राजीव गांधी खेल रत्न की बात करें तो ओलम्पिक में पदक की उम्मीद एथलीट नीरज चोपड़ा को नजरअंदाज किया जाना चौंकाने वाला फैसला ही कहा जाएगा। इसी तरह द्रोणाचार्य अवार्ड के सुपात्र लोगों में शुमार परमजीत सिंह बरार, प्रेमशंकर शुक्ला, सुजीत मान जैसे लोगों की उपेक्षा भी पशोपेश में डालती है।

देखा जाए तो गुरु हनुमान अखाड़े के जाने-माने कोच सुजीत मान पहले ही सक्रिय मौजूदा कोचों के नाम की द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए सिफारिश नहीं किये जाने पर अपनी नाराजगी जता चुके हैं। हाकी में जूड फेलिक्स और रोमेश पठानिया का द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए चयन राजनीतिक दखलंदाजी का ही जीता-जागता उदाहरण है। वैसे तो द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए एक गाइड लाइन है जिसमें प्रशिक्षण की अवधि 20 साल से अधिक होने का हवाला है लेकिन चयन समिति ने जिन 13 नामों को अनुशंसित किया है उनमें कुछ लोग तो 40 साल से भी कम उम्र के हैं।

देखा जाए तो देश के सभी खेल संगठन भारतीय खेल मंत्रालय के अधीन हैं लेकिन आजादी के 73 साल बाद भी हमारा मंत्रालय ऐसा सिस्टम ईजाद नहीं कर सका जिसमें हर खिलाड़ी के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन का डाटा संकलित हो सके। खेल मंत्रालय को इस दिशा पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यदि ऐसी व्यवस्था मूर्तरूप ले ले तो इससे हर साल खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को नामांकन करने की माथापच्ची करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लाइफ टाइम द्रोणाचार्य पुरस्कार का मतलब ही जीवन भर खेलों को दी गई सेवाओं का प्रतिफल है, ऐसे में नियमित द्रोणाचार्य पुरस्कार के कोई मायने नहीं रह जाते। दरअसल, आज किसी भी खिलाड़ी के सामने सबसे मुश्किल काम है अपने प्रशिक्षक का नाम लेना। कुश्ती में लाइफ टाइम द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए अनुशंसित ओमप्रकाश दहिया के नाम पर किसी को एतराज हो या नहीं जो प्रशिक्षक अपनी काबिलियत से देश को लगातार अंतरराष्ट्रीय पहलवान दे रहे हैं, उनकी नाराजगी बिल्कुल जायज है।

देखा जाए तो खेलों में राजनीतिज्ञों की दखलंदाजी नई बात नहीं है। इसकी मुख्य वजह अधिकांश राष्ट्रीय खेल संगठनों में राजनीतिज्ञों का लम्बे समय से काबिज रहना है। अधिकांश खेल संगठनों में राजनीतिज्ञों के रहने से राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों पर भी हर साल असर पड़ता है। इस साल के पुरस्कारों में भी राजनीतिज्ञों का राज्यवाद, परिवारवाद और परिचितवाद जिन्दाबाद रहा। मध्य प्रदेश को लेकर तो अपना बस यही कहना है कि उसे भी समय के साथ कदमताल मिलाना चाहिए क्योंकि लोगों की आंखों का पानी मर चुका है, ऐसे में सिर्फ ईमानदारी की राह चलने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। मेरी भावनाएं मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों के साथ हैं, उन्हें निराश होने की बजाय अपनी तैयारियों को और मुकम्मल कर देना चाहिए।
Shriprakash-shukla

– श्रीप्रकाश शुक्ला,
वर‍िष्ठ खेल पत्रकार

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