देश का सवाल: security या स्वार्थ?

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किसी भी देश, समुदाय या क़बीले के लिए बनाये जाने वाले क़ानून उस देश, समुदाय और क़बीले में रहने वाले लोगों के प्रति समान सम्मान और रक्षा एवं सुरक्षा के द्रष्टि कोण से होता है। ताकि कोई एक दुसरे पर अपने बल का दुरुपयोग कर दुसरे का शोषण न कर सके। पैसे और पॉवर का गलत इस्तेमाल कर के कमज़ोर लोगों को सताया न जाये। एक दूसरे के अधिकार न छीने जाएँ। सब का एक साथ विकास हो। यही वजह है कि कानून या संविधान को इतना ज़्यादा महत्व दिया जाता है। किसी भी कीमत पर संविधान और कानून की हिफ़ाज़त की जाती है। चूँकि संविधान में हर तरह का लिहाज़ रखा जाता है इसलिए उस के बीच न कोई मज़हब आता है और न ही कोई रीती रिवाज या परम्परा का किसी तरह से टकराव होता है। हर वर्ग, समाज, समुदाय और धर्म को लोग उस की रक्षा एवं सुरक्षा के प्रति वचन वद्ध होते हैं। चाह कर भी कोई उस के विरुद्ध नहीं जा सकता। ऐसा करने उस संविधान में यकीन रखने वाले सभी लोग एक जुट हो कर किसी धर्म या समाज की परवाह किये बगैर उस का सामना करते हैं। हर उस ताक़त के विरुद्ध खड़े होते हैं जो संविधान में अपनी निजी सोंच को सम्मिलित करने की अवैध कोशिश करता है। यानी कानून में ग़ैर क़ानूनी दखल अंदाजी करता है। हमारा देश भारत संविधान के प्रति अखंडता के लिए सम्पूर्ण विश्व में विख्यात है।

2014 के लोक सभा चुनाव और 2017 के उ.प्र. के विधान सभा चुनाव के बाद जिस तरह की क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं उस में एक बात तो निश्चित है कि यह सामाजिक सौहार्द के बिलकुल विपरीत हो रहा है। साम्प्रदायिकता के चक्रव्यूह में फँसी देश की राजनीति देश को दिशा हीन करने में कामयाब होती नज़र आ रही है। हमारे देश की मुख्य समस्याएँ भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, कानून व्यस्था और महिलाओं के शोषण हैं। हर दिन बढ़ती छेड़ छाड़ और बलात्कार की घटनाओं से देश के सम्मान का शीर्ष झुकता जा रहा है। बढ़ती बेरोज़गारी नए नए मुजरिम पैदा कर रही है। बे लगाम भ्रष्टाचार देश के विकास में निरंतर बाधाएं डाल रही है। देश विकाश शील देशों की सूची से भी निकलता नज़र आ रहा है। राज्य सरकारें हो या सेंट्रल, सभी को मिलकर इस बारे में सोचने की ज़रूरत है। यही सच्ची देश भक्ति और देश सेवा है।

लेकिन अफ़सोस हमारी सरकारों की चिंता का विषय आज यह है देश का कौन नागरिक क्या खाए और क्या पहने। कब घर में रहना है और कब घर से बाहर निकलना है। कौन से कपडे पहन सकते हैं और कौन नहीं पहनने हैं। कितने कपडे पहनने हैं। किस के साथ घर से बाहर निकलना और कब तक बाहर रह सकते हो। कितने बच्चे पैदा करने हैं। देश के संविधान को घर के ताक पर रख कर देश भक्ति की सिक्षाएं दी जाती हैं। बलात्कारी और मुजरिम देश का क़ानून समझा रहे हैं। देश की अखंडता में विश्वास न रखने वाले देश भक्ति और सच्ची देश सेवा का प्रमाण पत्र बाँट रहे हैं। इस से बड़ी विडंबना यह है कि यह सब सरकारी छात्र छाया में हो रहा। देश की सीमा पर अपनी जान को खाते में डाल कर देश को सुकून की नींद देने वाले सिपाहियों का राजनैतिक इस्तेमाल इस देश का सब से बड़ा दुर्भाग्य है।

उ.प्र. सरकार समेत राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ इत्यादि भारतीय जनता पार्टी की सरकारों ने गौ हत्या के प्रति फांसी या उम्र क़ैद की सज़ा के बारे में सहमती जताई है या उस पर अंतिम विचार कर रही हैं। अगर गौ रक्षा इस देश की आन्तरिक सुरक्षा का अहम विषय है और इस से देश का भला होगा तो यह कानून सराहनीय है इस का स्वागत किया जाना चाहिए बल्कि देश भर में इसे लागु करने पर जोर दिया जाना चाहिए। गौ हत्या के लिए सुनिश्चित किया जाने वाला क़ानून अगर गौ रक्षा का पूरक है और इस से गायों की रक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा तो निश्चित रूप से यह क़ानून बनना चाहिए। चूँकि गाय की पूजा होती है। इसे धार्मिक स्थान प्राप्त है। धार्मिक आस्थाएं आहत होती हैं। और किसी को भी यह हक नहीं है कि वो किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाए। प्रश्न यह है कि क्या यह पाबन्दी वाक़ई गौ रक्षा के लिए है? या देश के किसी भी नागरिक की धार्मिक आस्था को चोट न लगे इस के लिए यह साहसी क़दम उठाया गया है। क्यूंकि हमारा संविधान देश के हर नागरिक को धार्मिक आज़ादी देता है। तो क्या ऐसा ही कानून हर धर्म और समाज के लोगों के लिए है कि अगर उनकी धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाई गई तो उन के विरुद्ध कड़ी करवाई की जाएगी। फांसी या उम्र क़ैद जैसी सज़ा दी जाएगी? जानवरों की सुरक्षा को देखते हुए अगर यह फैसला लिया गया है तो क्या जार हर वैध एवं अवैध बूचड़ खाने बंद कर दिया जायेंगे? भारत विश्व भर में मांस को निर्यात करने वाले देशो की टॉप सूची में है। अगर यह कुछ लोगों को खुश कर के कुछ लोगों में भय और डर पैदा करने के लिए है तो इतिहास साक्षी है झूट और फरेब पर कड़ी की गई इमारत ज्यादा देर तक टिकने वाली नहीं है। डर की भी सीमा होती है। उस के बाद डर से डर नहीं लगता।

यह एक सामाजिक समस्या है। इस का समाधान भी सामाजिक होना चाहिए। हर उस चीज़ से बचना चाहिए जो दूसरों को तकलीफ देती हो और तुम्हारे लिए ज़रूरी न हो। राजनीति का धर्म और धर्मानुसार राजनीति करने की आवश्यकता है। दोनों को एक दुसरे के विरुद्ध करना धार्मिक और राजनैतिक अपराध है।

जब तक देश बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं होता इसी तरह की आन्तरिक अनावश्यक गतिविधियों में सारा दिमाग और सारी ताक़त लगाई जाती रहेगी। देश के आगे बढ़ने की रहें हमारे ही हाथों ख़त्म होती रहेंगी। अगर देश की ताक़त और बुद्धि साम्प्रदायिकता और फिरका परस्ती की जगा देश के विकाश और देश को भ्रष्टाचार एवं बेरोज़गारी से मुक्त करें में लगायी जाती तो देश विकाश शील देशों की सूची से बाहर नहीं बल्कि विकसित देशो की आँखों में ऑंखें दाल कर बात कर रहा होता।

आज देश अपने हर भक्त से प्रश्न करता है तुम्हारे लिए सर्वोपरि क्या है? तुम्हारा खुद का इगो, पारिवारिक समस्या, एक दूसरे को नीचा दिखने की होड़ या फ़िर देश के गौरव और सम्मान की सुरक्षा?

Abdul-moid

अब्दुल मोइद अज़हरी

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