सतनाम-पंथ की सामूहिक अराधना है छत्तीसगढ़ का पंथी नृत्य

पंथी नृत्य सतनाम-पंथ का एक आध्यात्मिक और धार्मिक नृत्य होने के साथ-साथ एक अनुष्ठान भी है, सामूहिक अराधना है, यह वाह्य-स्वरूप में मनोरंजन एवं अन्तःस्वरूप में आध्यात्मिक साधना है। आरंभ में यह भावातिरेक में निमग्न भक्तजनों का आनंदोत्सव में झूमने और थिरकने की क्रिया रही है जो क्रमशः विकसित होकर नृत्य में परिवर्तित हो गई।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने 12 डांसर्स की टीम करेगी पंथी नृत्य 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दो दिवसीय दौरे पर भारत आ रहे हैं। 24 फरवरी को वह अहमदाबाद पहुंचेंगे। ट्रम्प के स्वागत में कई राज्यों के कलाकार लोक कला की प्रस्तुति देंगे। इनमें छत्तीसगढ़ अंतरराष्ट्रीय जय सतनाम पंथी नृत्य दल का नाम भी शामिल है। ग्रुप के सुकदेव दास बंजारे के नेतृत्व में 12 डांसर्स की टीम पंथी नृत्य करेगी। सुकदेव और उनकी टीम 33 सालों से पंथी नृत्य कर रही है। सुकदेव ने बताया कि पहली बार 1987 में भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में गणतंत्र दिवस की झांकी में परफाॅर्मेंस देने का मौका मिला था। तब से अब तक 1 हजार से ज्यादा प्रस्तुति दे चुके हैं। विभिन्न राज्यों के अलावा साउथ अफ्रीका, इजिप्ट, तुर्की, रूस समेत 4 देशों में हमने पंथी नृत्य किया है।

सतनाम-पंथ का प्रवर्तन गुरु घासीदास ने 19वीं सदी में किया

छत्तीसगढ़ में सतनाम-पंथ का प्रवर्तन गुरु घासीदास ने 19वीं सदी में किया। उन्होंने समकालीन समय में धर्म-कर्म और समाज में व्याप्त अंधविश्वास, पांखड एवं कुरीतियों के विरुद्ध सदाचार और परस्पर भाईचारे के रूप में सतनाम-पंथ का प्रवर्तन किया। व्यवहारिक स्वरूप में व्यक्तिगत व सामूहिक आचरण के तहत इसे निभाने के लिए उन्होंने नित्य शाम को संध्या आरती, पंगत, संगत और अंगत का आयोजन गांव-गांव रामत, रावटी लगाकर किया। समाज में निरंतर इस व्यवस्था को कायम रखने के लिए साटीदार सूचना संवाहक अधिकारी और भंडारी चंदा-धन एवं अन्य सामग्री के प्रभारी अधिकारी के रूप में नियुक्त किया एवं महंत जो संत-स्वरूप और प्रज्ञावान थे, की नियुक्ति कर अपने सतनाम सप्त सिद्धांत और अनगिनत उपदेशों व अमृतवाणियों का प्रचार-प्रसार करते भारतीय संस्कृति में युगान्तरकारी महाप्रवर्तन किया।

कालांतर में उनका यह महती अभियान सतनाम पंथ के रूप में रेखांकित हुआ, जो कि अवतार वाद एवं जन्म से ऊंच-नीच, जाति वर्ण से पूर्णतः पृथक है। इसलिए इसे धर्म की संज्ञा भी दी जाती है। इस पंथ में गाए जाने वाले गीत पंथी गीत और उन गीतों के धुनों पर भावप्रवण नृत्य पंथी नृत्य के रूप में लोकप्रिय हुए।

पंथी नृत्य का उद्भव व विकास

पंथ से संबंधित होने के कारण अनुयायियों के द्वारा किए जाने वाले नृत्य पंथी नृत्य के रूप में प्रचलित हुए। साथ ही इस नृत्य में प्रयुक्त होने वाले गीतों को पंथी गीत के रूप में प्रतिष्ठा हासिल हुई।

पथ का अर्थ मार्ग या रास्ता है, जिस पर चलकर अभिष्ट स्थल तक पहुंच सकें। इसी पथ पर अनुस्वार लगने से वह पंथ हो जाता है। इसका अर्थ हुआ विशिष्ट मार्ग। इस पर व्यक्ति का मन, मत और विचार चलता है और धीरे-धीरे वह परंपरा और विरासत में परिणत होकर संस्कृति के रूप में स्थापित हो जाता है। इसी सतनाम-पंथ की धार्मिक क्रिया व नृत्य ही पंथी नृत्य है।

पंथी नृत्य प्रायः सामूहिक होते हैं। इनकी आदर्श संख्या 15 होती है, जिसमें वादक भी सम्मलित होते हैं। पंथी नृत्य में गायक, मादंरवादक, झांझ वादक, झुमका वादक रहते हैं। स्वतंत्र रूप से 10 नर्तक, 3 वादक, एक गायक व एक नृत्य निर्देशक सीटी मास्टर। इस तरह 15 सदस्य आदर्श माने जाते हैं।

पंथी नृत्य पुरुष प्रधान नृत्य है। यह सतनामियों में बारहों माह प्रतिदिन सायंकालीन जैतखाम व गुरुगद्दी गुड़ी के समक्ष किया जाने वाला अनुष्ठानिक नृत्य है। इसके द्वारा आध्यात्मिक उत्कर्ष और सामूहिक साधना द्वारा परमानंद की प्राप्ति होती है।

नृत्य करते-करते अपनी अंतिम तीव्रावस्था में नर्तक आत्मलीन हो जाते हैं और नृत्य की समाप्ति पर शांत-चित्त मंडप में ही बैठकर या लेटकर भाव समाधि में आबद्ध हो जाते हैं। गुरुप्रसाद व अमृत जल पाकर कृतार्थ हो जाते हैं।

मांदर की ध्वनी और झांझ, झुमका, मंजीरे की की आवाज उन्हें शीघ्र भाव समाधि की तरफ ले जाते हैं। कहीं-कहीं दर्शक पर देवता चढ़ जाते हैं। इसे सतपुरुष बिराजना कहते हैं। इसे स्थानीय जन देवता चढ़ना भी कहते हैं। जैसे जंवारा और गौरा पूजा में लोग चढ़ जाते हैं और झूमने लगते हैं। पंथी में सतपुरुष बिराजने पर वे जमीन पर लहरा लेते हुए लोटने लगते हैं। भंडारी, महंत उन्हें जैतखाम के समीप ले जाकर अमृतजल देकर नारियल फोड़कर शांति कराते हैं।

आजकल पंथी नृत्य में एकल प्रस्तुतियां भी देखने को मिलती हैं।

पंथी नृत्य का स्वरूप

पंथी नृत्य के अनेक प्रकार हैं। भावगत व क्षेत्रगत विभिन्नताओं के कारण इनका सहज निर्धारण किया जा सकता है।

भावगतः पंथी गीत की रचना अनेक भावों को लेकर की गई है। इनमें प्रमुखतः आध्यात्म, धर्मोपदेश, लोकाचार, शौर्य पराक्रम एवं चरित-कथा गायन के आधार पर भाव व्यक्त करते हुए नृत्य प्रदर्शन शामिल है।

क्षेत्रगतः अलग-अलग परिक्षेत्र में प्रचलित वेशभूषा, भाषा-शैली एवं संगीत वाद्ययंत्रों से प्रदर्शन।

प्रमुख पंथी नर्तक दल

पंथी नृत्य दल प्रायः सभी सतनामी ग्रामों में गठित हैं। अनुयायी आरंभ में प्रतिदिन सायंकालीन जैतखाम या सतनाम भवन के समीप एकत्र होकर पंथी नृत्य करते रहे हैं। ख्यातिनाम पंथी नर्तकों में देवदास बंजारे, पुरानिक चेलक, दिलीप बंजारे, करमचंद कोसरिया, प्रेमदास भतपहरी, कनकदास भतपहरी, सी.एल रात्रे, हीराधर बंजारे मालख्रौदा, मनहरण ज्वाले कोरबा, श्रवण कुमार चौकसे कोरबा, रामनाथ रात्रे अकलतरा, सूरज दिवाकर गिधौरी, दिनेश जांगडे़ रायपुर, सुखदेव बंजारे, मिलापदास बंजारे, डॉ. एस.एल. बारले, अमृता बारले भिलाई सहित अनेक नाम हैं जो राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हैं और अनवरत पंथी नृत्य को साध रहे हैं।

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