जिस शख्स ने तालिबान को गली-कूचों से निकाल कर सत्ता के शीर्ष पर बिठाया, सरकार बनी तो गोलियां दागकर की गई लात-घूंसों से पटाई

काबुल। अफगानिस्तान में 20 सालों तक नाटो सैन्य बल तैनात था। इस दौरान तालिबान बिखर गया और कमजोर पड़ गया। अमेरिका के साथ तालिबान की शांति वार्ता और समझौते के बाद सैनिकों की वापसी संभव हो पाई। तालिबान के लिहाज से देखें तो सत्ता में वापसी के दरवाजे उनके लिए उसी दिन खुल गए थे जब वह शांति वार्ता के लिए टेबल पर बैठे थे। इससे आतंकी समूह को एक शासन व्यवस्थापक के रूप में अनऔपचारिक मान्यता मिल गई। इन सब में तालिबान का प्रमुख चेहरा था मुल्ला अब्दुल गनी बरादर, जिसने समूह की ओर से अमेरिका के साथ बात की थी। जिस शख्स ने तालिबान को पर्दे के पीछे और गली-कूचों से निकाल कर सत्ता के शीर्ष पर बिठाया उसी को आज समूह दरकिनार कर चुका है।
हिंसक झड़प में बरादर की मौत का दावा
अमेरिका और कई देशों को उम्मीद थी कि देश की कमान उन्हीं के हाथ में सौंपी जाएगी लेकिन ऐसा हो न सका। आखिकार मुल्ला मोहम्मद हसन अखुंद को अफगानिस्तान का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया। तर्क दिया गया कि मुल्ला बरादर अमेरिका के दबाव में आ सकते हैं और आने वाले समय में यह समूह के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। सितंबर की शुरुआत में तालिबान के भीतर आंतरिक फूट की खबरें आईं और काबुल से हिंसक झड़प और गोलीबारी तक का दावा किया गया। कहा यह भी गया कि मुल्ला बरादर घायल हो गए हैं और काबुल छोड़कर ‘भाग’ गए हैं तो कई जगहों से उनकी मौत के दावे आए।
टीवी पर सामने आकर खारिज की अफवाहें
बरादर ने गुरुवार को सरकारी टीवी पर अपनी मौत या घायल होने की अफवाहों का खंडन किया। वह 12 सितंबर को कतर के विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल-थानी के स्वागत के लिए मौजूद नहीं थे। वह इस हफ्ते तालिबान की पहली कैबिनेट बैठक से भी नदारद रहे, जिसके बाद अफवाहों का बाजार गर्म हो गया। बरादर ने कहा, ‘मैं सुरक्षित और स्वस्थ हूं।’ उन्होंने तालिबान के भीतर आंतरिक कलह की खबरों को भी धता बताया। इस बीच सोमवार को बरादार के नाम पर एक ऑडियो टेप जारी किया गया, जिसमें वह कह रहे हैं कि मैं यात्राओं की वजह से बाहर हूं और इस वक्त जहां भी हूं, ठीक हूं। इस ऑडियो टेप को तालिबान की कई आधिकारिक वेबसाइटों पर पोस्ट किया गया है, लेकिन इसकी सत्यता की निष्पक्ष रूप से पुष्टि नहीं हो पाई।
तालिबान ने मुल्ला बरादर को किया साइडलाइन
अमेरिका और उसके सहयोगियों को उम्मीद थी कि मुल्ला अब्दुल गनी बरादर अफगानिस्तान में तालिबान सरकार की आवाज होंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ और मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक मुल्ला बरादर को काबुल में राष्ट्रपति भवन पर हमले के बाद साइडलाइन कर दिया गया है। कुछ समय पहले तक मुल्ला बरादर ही तालिबान का सार्वजनिक चेहरा थे। सितंबर की शुरुआत में खबर आई थी कि हक्कानी नेटवर्क के एक नेता ने मुल्ला बरादर पर हमला कर दिया। यह झगड़ा काबुल के राष्ट्रपति भवन में कैबिनेट के गठन को लेकर बैठक में शुरू हुई बहस के बाद हुई थी।
हक्कानी नेता ने बरादर पर बरसाए घूंसे
सूत्रों के मुताबिक बरादर ने एक ऐसे कैबिनेट पर जोर दिया था जिसमें गैर-तालिबान नेता और जातीय अल्पसंख्यक शामिल थे, जिन्हें दुनिया ज्यादा स्वीकार करती। काबुल में बैठक के दौरान खलील उल रहमान हक्कानी अपनी कुर्सी से उठे और तालिबान नेता को घूंसा मारने लगे। मीडिया रिपोर्ट्स दावा करती हैं कि दोनों के बॉडीगार्ड्स ने एक-दूसरे पर गोलियां बरसाईं, जिसमें कई लोग घायल हो गए और मारे गए। इसमें मुल्ला बरादर घायल नहीं हुए और वह तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा से बात करने के लिए काबुल छोड़कर कंधार चले गए।
आखिर बरादर को नहीं मिली कमान
तालिबान ने 7 सितंबर को अपने कैबिनेट की घोषणा की। इसमें कोई भी बाहरी शामिल नहीं था। हक्कानी परिवार के चार लोगों को अहम पद दिए गए। सिराजुद्दीन हक्कानी, जो आतंकवाद के लिए एफबीआई की मोस्ट वांटेड सूची में हैं, को कार्यवाहक आंतरिक मंत्री यानी गृह मंत्री बनाया गया। बरादर को दो उप प्रधानमंत्रियों में से एक के तौर पर नामित किया गया। 2016 के आसपास तालिबान और हक्कानी समूहों का विलय हो गया था। कुछ खबरों में दावा किया गया कि पाकिस्तान ने भी इस कैबिनेट के गठन में अहम भूमिका निभाई है और इसी वजह से मुल्ला बरादर प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।
-एजेंसियां

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