उत्तर कोरिया को वहां के भारतीय राजदूत अतुल कैसे देखते हैं?

अतुल गोत्सुर्वे को उत्तर कोरिया में भारत का नया राजदूत बनाया गया है. अतुल भारतीय विदेश सेवा के 2004 के अधिकारी हैं. इससे पहले राजदूत के तौर पर उत्तर कोरिया में कोई भारतीय विदेश सेवा का अधिकारी नहीं था.
भारतीय दूतावास की ज़िम्मेदारी अतुल से पहले चीनी अनुवादक जसमिंदर कस्तुरिया के पास थी.
बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में अतुल गोत्सुर्वे ने कहा है कि उत्तर कोरिया में भारतीयों की संख्या बहुत कम है.
पढ़िए, उनका पूरा इंटरव्यू
महाराष्ट्र के सोलापुर से उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग तक का सफ़र कैसा रहा?
मैं महाराष्ट्र में सोलापुर ज़िले के चपलगाँव से हूं. मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे इसलिए उनके तबादले के कारण हमलोग पुणे में शिफ़्ट हो गए. मैं हमेशा से सिविल सेवा में जाना चाहता था. 2004 में मैंने भारतीय विदेश सेवा ज्वाइन किया. मैं मेक्सिको और क्यूबा में काम कर चुका हूं. ऐसे में मुझे पूरब के देश उत्तर कोरिया में काम करने का मौक़ा मिला तो मैंने स्वीकार कर लिया.
उत्तर कोरिया में काम करना अपने-आप में चुनौतीपूर्ण है. वहां लोकतंत्र नहीं है. परमाणु हथियारों को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है. ऐसे में क्या आपको उत्तर कोरिया को लेकर कोई पसोपेश की स्थिति का सामना करना पड़ा?
ऐसा कुछ भी नहीं है. जब आप भारत के राजदूत के तौर पर काम करते हैं तो सवा अरब लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे होते है. यह मेरे लिए सम्मान की बात है. मेरा मानना है कि राजनयिक देश के सैनिक की तरह होते हैं.
मुझे जो ज़िम्मेदारी दी गई है वही मेरा लक्ष्य है और मुझे उसे ही हासिल करना है. मुझे सरकार ने यह ज़िम्मेदारी दी तो गर्व का अहसास हुआ.
आप एक महीना प्योंगयांग में रह चुके हैं. ऐसे में उत्तर कोरिया को लेकर आपका एक नज़रिया होगा. उत्तर कोरिया के बारे में आप क्या सोचते हैं?
हर देश अपने-आप में ख़ास होता है. हर देश की अपनी संस्कृति होती है. जब मैं प्योंगयांग आया तो यहां की साफ़-सफ़ाई ने सबसे पहले मेरा ध्यान खींचा.
प्योंगयांग दीदोंग नदी के तट पर है. नदी भी बिल्कुल साफ़. हम पूरे शहर में ट्राम से घूम सकते हैं. यहां के लोग काफ़ी मेहनती और अनुशासित हैं. महिलाएं भी पुरुषों के बराबर ही काम करती हैं.
यहां लोग कामचोरी नहीं करते. यह काफ़ी व्यस्त शहर है. पूरब के देश होने के कारण सूर्योदय बहुत जल्दी हो जाता है और सूर्यास्त काफ़ी देरी से होता है. अभी वहां पतझड़ के दिन हैं. मैं फिलहाल भारत आया हुआ हूं और मैंने सुना है कि वहां सर्दी असहनीय होती है.
उत्तर कोरिया के लोगों से अपनी मुलाक़ातों के बारे में बताएं
मेरी मुलाक़ात वहां के सुप्रीम पीपल्स असेंबली के अध्यक्ष किम योंग-नम से हुई थी. जब भारत के विदेश राज्य मंत्री पिछले महीने उत्तर कोरिया आए थे तभी किम योंग-नम से मेरी मुलाक़ात हुई थी.
भारत और उत्तर कोरिया भौगोलिक रूप से क़रीब के देश हैं. दोनों देशों के बीच 1973 में राजनयिक संबंध स्थापित हुए थे. इस साल दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध के 45 साल हो गए. हम लोग इस मौक़े पर कई कार्यक्रमों के ज़रिए उत्सव मनाएंगे.
क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर कोरिया जाएंगे?
अभी तो उत्तर कोरिया जाने की उनकी ऐसी कोई योजना नहीं है.
भारत, डोनल्ड ट्रंप और किम जोंग-उन की मुलाक़ात को कैसे देख रहा है?
पूरी दुनिया इस मुलाक़ात को लेकर उत्सुक है. भारत शुरू से ही कोरियाई प्रायद्वीप में शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक रहा है.
भारत का मानना है कि शांति की स्थापना में पूरी दुनिया के लिए यह मुलाक़ात अहम है.
उत्तर कोरिया के लोग भारत के बारे में क्या सोचते हैं?
उत्तर कोरिया के लोगों को लगता है कि भारत एक विकसित देश है. यहां के लोग भारतीय जीवन शैली, तकनीक, संस्कृति और बॉलीवुड के बारे में जानना चाहते हैं. यहां भी परिवारों की संरचना भारत की तरह ही है.
मुझसे कई लोगों ने अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘बाग़बान’ के बारे में पूछा. ‘दंगल’ और ‘बाहुबली’ भी यहां काफ़ी लोकप्रिय है.
उत्तर कोरिया में भारतीयों की संख्या कितनी होगी?
दक्षिण कोरिया में तो बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं लेकिन उत्तर कोरिया में ऐसा नहीं है.
उत्तर कोरिया के लोग बाक़ी दुनिया से किस तरह जुड़े हुए हैं?
उत्तर कोरिया की एक सीमा चीन से लगती है जबकि दूसरी तरफ़ 15 किलोमीटर की सीमा रूस से लगती है. व्यावसायिक स्तर पर चीन, रूस और उत्तर कोरिया जुड़े हुए हैं.
अभी उत्तर कोरिया कई प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. ऐसे में रूस और चीन से भी आयात-निर्यात स्थगित है, लेकिन चीन से सबसे ज़्यादा जुड़ाव है.
-BBC

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