लोकतंत्र की निरर्थकता और हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता !

आज भी आदर्श राज्यकर्ता के रूप में हम छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते हैं । महाराज ने अठारह जातियों को एकत्रित कर हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की थी । इसके विपरीत आज की स्थिति देखें, तो धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र प्रत्येक क्षेत्र में पूर्णतः असफल सिद्ध हुआ है । ऐसे में इस पूरी स्थिति का एकमात्र उपाय है आदर्श राज्य शासन हेतु जनकल्याणकारी हिन्दू राष्ट्र की स्थापना । वर्तमान धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत की दुर्दशा तथा उसे सुधारने के लिए हिन्दू राष्ट्र स्थापना की अनिवार्यता स्पष्ट करनेवाला यह लेख !
1. स्वार्थी शासनकर्ताआें के कारण जाति-जाति में विभाजित हिन्दुआें को एकत्रित करने के लिए हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता !
अंग्रेजों के भारत में आने से पूर्व हिन्दुआें में एकता थी; परंतु अंग्रेजों की फूट डालो, राज करो, की नीति के कारण हिन्दू विविध जातियों में विभाजित हो गए । स्वतंत्रता के पश्‍चात देश के शासनकर्ताआें ने भारत पर आरक्षण का भूत सवार किया । इसलिए समाज में एकता उत्पन्न होने के स्थान पर, जाति-जाति में अनबन उत्पन्न हो गई । निर्वाचन के समय राजनीतिक दल विविध जातियों को आरक्षण का प्रलोभन देकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने लगे । डॉ. बाबासाहेब अंबेडकरजी ने पिछडे वर्ग के विकास हेतु केवल 10 वर्षों के लिए आरक्षण लागू किया था; परंतु देश को स्वतंत्रता मिले 70 वर्ष हो गए, अब भी आरक्षण चल ही रहा है ।
वर्ष 1935 की जनगणना के अनुसार भारत में पिछडी जातियों की संख्या 150 थी । 21 वीं शताब्दी में वह 3 हजार 500 से ऊपर पहुंच चुकी है । वास्तव में पिछडापन समाप्त होना राष्ट्र की उन्नति दर्शाता है; परंतु वर्तमान में अनेक लोग स्वयं के समाज को पिछडा घोषित करने के लिए आंदोलन कर, मोर्चे निकालकर आरक्षण की मांग कर रहे हैं, कानून हाथ में ले रहे हैं । इस आरक्षण के कारण गुणवान लोगों का मनोबल टूटकर क्या राष्ट्र की असीमित हानि नहीं हो रही है ?  संक्षेप में यह कहना अनुचित नहीं है कि नि:स्वार्थी समाज बनाने तथा  सर्वप्रथम राष्ट्र का विचार करने की सीख देने में लोकतंत्र असफल सिद्ध हुआ है, । वसुधैव कुटुम्बकम् ।की सीख देनेवाले हिन्दू राष्ट्र में ही नि:स्वार्थ समाज निर्मिती संभव होगी ।
2. जनता के धन का सदुपयोग राष्ट्रकार्य के लिए करनेवाले सत्यनिष्ठ शासनकर्ता लाने के लिए हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता
प्राचीन काल में जनता धर्माचरणी होने के कारण वह सदाचारी और नीतिमान थी । धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में राष्ट्र का नैतिक बल क्षीण हो गया है । भ्रष्टाचार के कारण समाजव्यवस्था खोखली हो गई है । एक समय सोने की चिडिया कहलानेवाला अपना भारत देश आज निष्क्रिय और भ्रष्ट शासनकर्ताआें के कारण ऋण के नीचे दब गया है । वर्ष 2015 के अंत में देश ने अंतरराष्ट्रीय बैंकों, वित्तीय संस्थाआें, सरकारों से 475.8 अरब डॉलर ऋण लिया है । अरबों रुपयों के नए-नए घोटाले प्रतिदिन उजागर हो रहे हैं । कांग्रेस के समय हुआ आदर्श घोटाला, 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला आदि से देश की आर्थिक स्थिति डूबने की कगार पर है, ऐसे समय अब बैंकों से हजारों करोड रुपयों का ऋण लेकर उसे डुबोनेवाले विविध उद्योगपतियों के घोटाले भी सामने आने लगे हैं ।
किंगफिशर प्रतिष्ठान के मालिक विजय मल्ल्या ने विविध बैंकों से 9 हजार करोड रुपयों का ऋण लेकर तथा हीरों के व्यापारी नीरव मोदी ने पंजाब नेशनल बैंक से 11 हजार 400 करोड रुपयों का ऋण लेकर डुबो दिया । दोनों भारत से भाग गए तथा विदेश में ऐशोआराम का जीवन बिता रहे हैं । इसके विपरीत भारतीय किसानों ने कृषि के लिए बैंकों से केवल 10-20 हजार रुपयों का ऋण लिया तथा उन्हें आत्महत्या करनी पड रही है । यह स्थिति केवल आध्यात्मिक नींववाले आदर्श हिन्दू राष्ट्र से ही परिवर्तित की जा सकती है ।
3. जनता की रक्षा के लिए हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता !
देश के आंतरिक शत्रुआें से जनता की रक्षा का दायित्व पुलिस का होता है; परंतु पुलिसवाले सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय, यह घोषवाक्य भुला बैठे हैं । पुलिस और अपराधियों के मध्य अर्थपूर्ण हितसंबंधों के कारण अपराधियों को पुलिस का भय समाप्त होता जा रहा है । पुलिस थाने में शिकायत लेकर जानेवालों के साथ ही असभ्य व्यवहार किया जाता है । कारागृह के अपराधियों को पुलिस ही सर्व प्रकार से सहायता करती है, यह अनेक बार उजागर हो चुका है तथा कानून की रक्षक पुलिस ही कानून हाथ में लेकर उसकी हत्या कर रही है, ऐसा अनुभव भी अनेकों को हुआ है ।
छत्रपति शिवाजी महाराज के हिन्दवी स्वराज्य में जनता को प्रताडित करनेवालों को पहाड की चोटी से फेंक देने जैसा कठोर दंड दिया जाता था । स्त्रियों की ओर वक्रदृष्टि से देखनेवालों के हाथ-पैर तोड दिए जाते थे । इसलिए अपराधी भयभीत होकर अपराध करने का साहस नहीं करते थे । इसके विपरीत धर्मनिरपेक्ष भारत में जनता की रक्षा के लिए नियुक्त पुलिसवाले ही अपराधियों से मिलकर जनता को प्रताडित कर रहे हैं । यह स्थिति परिवर्तित करने के लिए हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता है ।
4. शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को पुनर्वैभव प्राप्त करवाने के लिए हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता !
ज्ञानदान का कार्य अत्यंत पवित्र माना जाता है । प्राचीन काल में तक्षशिला, नालंदा आदि विश्‍वविद्यालयों में केवल भारत के ही नहीं अपितु यूरोप और एशिया खंड के विद्यार्थियों को भी शिक्षा दी जाती थी; परंतु विद्या के गुरु भारत की शिक्षा प्रणाली ही बेकार सिद्ध हो गई है । प्राथमिक शिक्षा से महाविद्यालयीन शिक्षा तक प्रवेश देने के लिए प्रवेशशुल्क के नाम पर फिरौती मांगी जाती है । जिनकी ओर शिक्षक के रूप में देखा जाता है, वे शिक्षक ही विद्यार्थियों पर अत्याचार करने लगे हैं, इसके अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं । इस स्थिति के लिए मेकाले शिक्षा प्रणाली उत्तरदायी है । आदर्श शिक्षक और आदर्श शिष्य केवल गुरुकुल शिक्षा पद्धति में ही गढ सकते हैं । इसलिए विद्यार्थियों को दिशाहीन बनानेवाली मेकाले शिक्षा पद्धति हटाकर ज्ञानदान जैसे पवित्र क्षेत्र में भारत को गतवैभव प्राप्त करवाने के लिए हिन्दू राष्ट्र की स्थापना आवश्यक है ।
5. भारत के वास्तविक विकास के लिए हिन्दू राष्ट्र ही आवश्यक !
प्राचीन भारत में सनातन वैदिक हिन्दू धर्म को राजाश्रय प्राप्त था । इसलिए यह राष्ट्र व्यावहारिक और आध्यात्मिक दृष्टि से प्रगतिपथ पर था । इसलिए सुसंस्कृत समाज, आदर्श कुटुंबव्यवस्था और राज्यकर्ताआें की निर्मिति हिन्दू धर्माधारित राष्ट्र में हुई थी; परंतु स्वतंत्रता के 7 दशकों के पश्‍चात भी लोकतंत्र की प्रशंसा करनेवाले सर्वपक्षीय शासनकर्ताआें के लिए सुसंस्कृत समाज और समृद्ध राष्ट्र बनाना संभव नहीं हुआ । परिणामस्वरूप राष्ट्र में विविध समस्याएं जटिल बन गई हैं तथा इस कारण राष्ट्र तीव्र गति से विनाश की ओर जा रहा है । इन समस्याआें की तीव्रता देखते हुए धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की निरर्थकता और हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने की आवश्यकता स्पष्ट होती है ।
6. हिन्दू राष्ट्र स्थापना के लिए हिन्दू जनजागृती समिति की ओर से सप्तम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन !
संक्षेप में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के कारण भारत की बडी हानि हो रही है । इसलिए आदर्श हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना आवश्यक हो गया है । इसी पृष्ठभूमि पर वर्ष 2012 में हिन्दू जनजागृति  समिति नेे अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन की अवधारणा प्रस्तुत की तथा मूर्त रूप में साकार भी की ।  एक ही ध्येय से प्रेरित सैकडों छोटे-बडे हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों का हिन्दू अधिवेशन प्रतिवर्ष गोवा में हो रहा है । हिन्दू राष्ट्र की दृष्टि से देश-विदेश के हिन्दुत्वनिष्ठों का संगठन करनेवाला यह एकमात्र अधिवेशन है । इस वर्ष 2 से 12 जून की अवधि में गोवा में सप्तम अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन होनेवाला है । इसमें देशभर के तथा बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका इत्यादि देशों के 250 से अधिक हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के प्रतिनिधि सम्मिलित होनेवाले हैं ।
इस अधिवेशन में केवल हिन्दू नेता ही नहीं अपितु धर्माचार्य, संत, महंत, अधिवक्ता, सेवानिवृत्त न्यायाधीश, विचारक, पत्रकार, डॉक्टर, स्वरक्षा प्रशिक्षण विशेषज्ञों का समावेश होगा । हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए हिन्दुत्वनिष्ठ संगठन और संप्रदायों सहित प्रत्येक क्षेत्र के हिन्दुआें का संगठन करना इस अधिवेशन का प्रमुख उद्देश्य है ।
इस अधिवेशन से प्रेरणा लेकर कार्यतत्पर राष्ट्र और धर्मप्रेमी देश को हिन्दू राष्ट्र के स्वर्ण युग की ओर ले जाने के लिए एक और कदम उठाएंगे । ये भगीरथ प्रयास ही आगे राष्ट्र और धर्म पर लगा हुआ जाला दूर कर अनादि-अनंत हिन्दू धर्म और हिन्दू राष्ट्र की सुनहरी किरण इस भूतल पर लाकर संपूर्ण संसार को चकाचौंध कर देंगे, यह सुनिश्‍चित है ।

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