प्रगतिशील कविताओं के famous poet और लेखक थे गजानन माधव मुक्तिबोध

प्रगतिशील कविताओं के famous poet और लेखक थे गजानन माधव मुक्तिबोध। ‘मेरे शब्द-भाव उनके हैं, मेरे पैर और पथ मेरा, मेरा अंत और अथ मेरा, ऐसे किंतु चाव उनके हैं’. अपने शब्दों और कविताओं के गहरे मतलब को दुनिया में हमारे लिए छोड़े हुए गजानन माधव मुक्तिबोध को आज 50 साल हो गए हैं.

प्रगतिशील कविताओं के मशहूर कवि और लेखक गजानन माधव मुक्तिबोध की आज 50वीं पुण्यतिथि है. रजा फाउंडेशन, शिवनाथ, कृष्णा सोबती, निधि और मुक्तिबोध स्मृति की ओर से आज दोपहर तीन बजे इंडिया एंटरनेशनल सेंटर नई दिल्ली में मुक्तिबोध पर पुनर्विचार कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा. इस कार्यक्रम में अशोक वाजपेयी और रमेश मुक्तिबोध मुख्य अतिथि होंगे.
famous poet गजानन मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर 1917 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ था. 46 वर्ष की उम्र में 11 सितंबर 1964 को मुक्तिबोध ने अंतिम सांस ली. मुक्तिबोध की कुछ प्रमुख कविताओं में ‘अंधेरे में’, ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’, ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ शामिल हैं. दुर्भाग्य से मुक्तिबोध अपने जीवनकाल में अपनी किसी किताब को प्रकाशित होते नहीं देख पाए. मुक्तिबोध की पहली किताब ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ जब प्रकाशित हुई, तब मुक्तिबोध की मौत हो चुकी थी.

यहां पढ़िए मुक्तिबोध की मशहूर कविता ‘अंधेरे में’ के कुछ अंश
बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब…
अंधेरा सब ओर,
निस्तब्ध जल,
पर, भीतर से उभरती है सहसा
सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है
और मुसकाता है,
पहचान बताता है,
किन्तु, मैं हतप्रभ,
नहीं वह समझ में आता.

मुक्तिबोध की कविता ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ के अंश
नगर के बीचों-बीच
आधी रात-अंधेरे की काली स्याह
शिलाओं से बनी हुई
भीतों और अहातों के, कांच-टुकड़े जमे हुए
ऊंचे-ऊंचे कन्धों पर
चांदनी की फैली हुई संवलायी झालरें.
कारखाना-अहाते के उस पार
धूम्र मुख चिमनियों के ऊंचे-ऊंचे
उद्गार-चिह्नाकार-मीनार मीनारों के बीचों-बीच
चांद का है टेढ़ा मुँह!!
भयानक स्याह सन तिरपन का चांद वह !!
गगन में करफ्यू है
धरती पर चुपचाप जहरीली छिः थूः है !!
पीपल के खाली पड़े घोंसलों में पक्षियों के,
पैठे हैं खाली हुए कारतूस.
गंजे-सिर चांद की सँवलायी किरनों के जासूस
साम-सूम नगर में धीरे-धीरे घूम-घाम
नगर के कोनों के तिकोनों में छिपे है !!
चांद की कनखियों की कोण-गामी किरनें पीली-पीली रोशनी की, बिछाती है
अंधेरे में, पट्टियां.
देखती है नगर की जिंदगी का टूटा-फूटा
उदास प्रसार वह.

famous poet गजानन मुक्तिबोध का जन्म 13 नवंबर 1917 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में हुआ था. 46 वर्ष की उम्र में 11 सितंबर 1964 को मुक्तिबोध ने अंतिम सांस ली. मुक्तिबोध की कुछ प्रमुख कविताओं में ‘अंधेरे में’, ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’, ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ शामिल हैं. दुर्भाग्य से मुक्तिबोध अपने जीवनकाल में अपनी किसी किताब को प्रकाशित होते नहीं देख पाए. मुक्तिबोध की पहली किताब ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ जब प्रकाशित हुई, तब मुक्तिबोध की मौत हो चुकी थी.

-Legend News