सरकारी बंगलों पर काबिज रहने की कसरत ने बता दिया, ”अंग्रेज चले गए लेकिन औलाद छोड़ गए”

यह कहावत लोगों के बीच अब भी कहीं न कहीं तैरती हुई सुनी जा सकती है कि ”अंग्रेज चले गए लेकिन औलाद छोड़ गए”। स्‍वतंत्र भारत में 70 सालों बाद तक अगर ये कहावत सुनाई देती है तो इसके कुछ मायने भी जरूर होंगे।
इसके वही मायने हैं जो पिछले दिनों पूर्व मुख्‍यमंत्रियों को सरकारी बंगलों से बेदखल करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देखने और सुनने को मिले।
कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी आखिरी बार 25 जून 1988 से लेकर 05 दिसंबर 1989 तक अर्थात कुल मिलाकर 1 वर्ष 163 दिन के लिए यूपी के मुख्‍यमंत्री रहे थे। उत्तर प्रदेश में यह उनका तीसरा कार्यकाल था। इसके बाद यूपी से अलग होकर बने नए राज्‍य उत्तराखंड के भी वह पहले मुख्‍यमंत्री बने।
आज नारायण दत्त तिवारी की आत्‍मा भी उनकी काया छोड़ने को बेताब है किंतु नारायण दत्त तिवारी ने लखनऊ में सरकारी बंगला अब तक नहीं छोड़ा और उत्तराखंड में भी पूर्व मुख्‍यमंत्री की हैसियत से कोई सरकारी बंगला जरूर कब्‍जा रखा होगा।
ये हाल तो तब है जबकि औलाद के नाम पर उनके परिवार में कोर्ट से घोषित एकमात्र पुत्र शेखर है और कोर्ट के ही आदेश से पत्‍नी का ”दर्जा प्राप्‍त” शेखर की मां है। नारायण दत्त तिवारी की ब्‍याहता पत्‍नी को स्‍वर्गवासी हुए एक अरसा बीत गया। यदि वो जिंदा होतीं तो हालात कुछ और होते।
फिलहाल नारायण दत्त तिवारी किसी अस्‍पताल में पड़े हैं लेकिन उनकी जैविक संतान भी बंगला खाली करने को तैयार नहीं है।
भाजपा के कल्‍याण सिंह कुल जमा दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री रहे। पहली बार 24 जून 1991 से लेकर 06 दिसंबर 1992 तक 1 वर्ष 165 दिनों के लिए और दूसरी बार 21 सितंबर 1997 से लेकर 12 नवंबर 1999 तक 2 वर्ष 52 दिन के लिए। मतलब आखिरी बार वह 18 साल पहले सूबे के सीएम रहे थे। इस बीच उनका बेटा भी बतौर मंत्री व सांसद सरकारी बंगला प्राप्‍त कर चुका और वह खुद भी राजस्‍थान के राज्‍यपाल पद को सुशोभित करने लगे। जाहिर है कि गवर्नर हाउस में ही रह रहे होंगे लेकिन इन्‍होंने भी लखनऊ का सरकारी बंगला कब्‍जाकर रखा। खुद न सही, नौकर-चाकर तो ऐश कर ही रहे थे।
भाजपा के ही राजनाथ सिंह 28 अक्‍टूबर 2000 से लेकर 08 मार्च 2002 तक 1 वर्ष 131 दिन के लिए यूपी के सीएम रहे। राजनाथ सिंह आज केंद्रीय गृहमंत्री का दायित्‍व संभाल रहे हैं और उसी हैसियत से राष्‍ट्रीय राजधानी में बंगला भी उनके नाम आवंटित है किंतु लखनऊ के बंगले पर डेढ़ दशक से वह भी काबिज थे।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट से सरकारी बंगला खाली कराने का सख्‍त आदेश आने के बाद कल्‍याण सिंह एवं राजनाथ सिंह ने तो बिना किसी हील-हुज्‍जत के बोरिया-बिस्‍तर समेट लिया और नारायण दत्त तिवारी के अस्‍पताल में होने की वजह से उनकी बेदखली पर फिलहाल अमल नहीं हो पाया किंतु मुलायम सिंह, मायावती और अखिलेश ने जिस तरह की नौटंकी की तथा बोर्ड से लेकर कोर्ट तक का सहारा लिया, वह बेहियाई की इंतिहा ही कही जा सकती है।
खुद को खांटी समाजवादी कहने वाले मुलायम सिंह यादव पार्टी से बेआबरू होकर बेदखल होने के बावजूद अंत तक सरकारी बंगले से बेदखल होने को तैयार नहीं थे।
सत्ता से बेदखल अखिलेश तो जैसे सरकारी बंगले को भी अपनी पार्टी समझकर नई-नई चालें चल रहे थे। कभी सुरक्षा की आड़ में तो कभी लखनऊ में मकान न होने का हवाला देकर दो साल का लंबा वक्‍त योगी सयरकार से मांगने लगे। दाल नहीं गली तो पिता-पुत्र सुप्रीम कोर्ट में भी दस्‍तक देने जा पहुंचे।
यह हाल तो तब है जबकि लखनऊ में ही इन सबके पास सैकड़ों करोड़ रुपए कीमत के निजी आवास सर्वविदित हैं।
दरअसल, यही वो मानसिकता है जिसके कारण ”अंग्रेज चले गए लेकिन औलाद छोड़ गए” जैसी कहावत स्‍वतंत्र भारत में अपना महत्‍व बनाए हुए है।
एक ओर जहां जनसामान्‍य के लिए आज भी अपने सिर पर एक अदद छत होने का सपना पूरा करना सबसे मुश्‍किल काम है वहीं दूसरी ओर ये नेता हैं जिनकी हवस कभी पूरी नहीं होती।
सामान्‍य आदमी बमुश्‍किल पूरे जीवन में यदि अपने लिए एक घर का सपना पूरा कर भी पाता है तो उसके लिए उसे जिंदगीभर की जमा पूंजी लुटाने के साथ-साथ कर्ज का इतना बोझ अपने सिर पर लादना पड़ता है कि उसके लिए उम्र कम पड़ जाती है।
बताया जाता है कि मायावती जिस सरकारी बंगले पर काबिज थीं, उसे उनके हिसाब से तैयार कराने के लिए वर्ष 2011 में 113 करोड़ रुपया खर्च किया गया था। एक अविवाहित औरत का यह अंदाज क्‍या बयां करता है, यह बताने की जरूरत नहीं रह जाती।
दलितों के नाम पर राजनीति करने वाली दौलत की इस बेटी ने पहले तो सरकारी बंगला हड़पने का हर जतन किया और हारकर जब बंगला खाली करना ही पड़ा तो उस मीडिया को साथ लेकर किया जिसे मायावती के रहते कभी अंदर फटकने तो क्‍या, झांकने की भी इजाजत नहीं दी गई।
मायावती ने यह तमाशा चाहे किसी मकसद से किया हो लेकिन मीडिया को अंदर लेजाकर वह खुद तमाशा बन गईं। इससे पहले लोग मायावती की शान-शौकत के कयास ही लगाते थे लेकिन अब मीडिया ने दिखा भी दिया कि वह कहावतों में ही नहीं हकीकत में भी दौलत की कितनी बड़ी पुजारी हैं।
राजनीति को पेशा बनाने वाले इन सभी नेताओं को एक बात यह समय रहते समझ लेनी चाहिए कि उनकी हवस ही किसी न किसी दिन उनके लिए बड़ी मुसीबत बनकर सामने खड़ी होगी।
अभी तो सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने आदेश में कहा है कि सत्ता से बेदखल होने के बाद राजनेता भी आम इंसान हैं लेकिन वो दिन दूर नहीं जब आम इंसान भी इन्‍हें इस बात का अहसास करा देगा कि एक-दो बार किसी पद पर रह लेने का मतलब यह नहीं होता कि राज सिंहासन उनकी बपौती हो गया।
वह यह भी बता देगा कि सत्ता से जुड़ी सुविधाएं और सरकारी खजाने से खड़े किए गए महलों जैसे घर कभी उनकी पैतृक संपत्ति नहीं हो सकते।
बेशक भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां के लोगों में अपार धैर्य समाया हुआ है लेकिन यदि आज के राजनेता इस धैर्य का दुरुपयोग करने की अपनी आदत से बाज नहीं आए तो वह दिन दूर नहीं जब फिरंगियों की तरह इन्‍हें भी देश से खदेड़ दिया जाएगा।
लोकतंत्र भी तभी तक कायम है जब तक लोक अपने लिए बनाए गए तंत्र पर भरोसा कर रहा है , जिस दिन लोक का भरोसा इस तंत्र पर से उठ गया, उस दिन बहुत कुछ टूट जाएगा। फिर न मूर्तियां बचेंगी और न स्‍मारक।
भारत में भले ही न हुआ हो किंतु यहां के लोगों ने देखा जरूर है कि किस तरह दुनिया में जिंदा लोगों की मूर्तियों को उनकी आंखों के सामने चकनाचूर कर दिया गया और किस तरह जनता का खून चूसकर अय्याशी करने वाले नेताओं को घसीट-घसीट कर सत्ता व मद के साथ-साथ दुनिया से भी रुखसत कराने में दया नहीं दिखाई गई।
बेहतर होगा कि भारत के नेता भी अब लोक और तंत्र से बने इस लोकतंत्र का मजाक बनाना छोड़ दें।
याद रखें कि नारायण दत्त तिवारी के पास किसी जमाने में अपने लिए तरबूजा खरीदने लायक पैसे नहीं होते थे। यकीन न हो तो उत्तराखंड में आज भी उनके हमउम्र यह सच्‍चाई बताने को शेष हैं।
मुलायम सिंह को उनके अपने पैतृक स्‍थान पर साइकिल की सवारी करते और थानों के चक्‍कर लगाते बहुत से लोगों ने देखा है।
अतरौली में कल्‍याण सिंह की भी हैसियत बताने वालों की कोई कमी नहीं है और राजनाथ सिंह के राजनीतिक सफर से भी लोग परिचित हैं।
ज्‍यादा समय नहीं बीता जब मायावती किसी दूसरे की साइकिल पर सवार होकर घूमा करती थीं और मामूली सी अध्‍यापक थीं।
माना कि व्‍यवस्‍थागत दोष और समय के चक्र ने आज इन सभी लोगों को इस मुकाम तक ला खड़ा किया है किंतु इसका यह मतलब नहीं कि हवस पूरी करने के लिए सारे कायदे-कानून ताक पर रख दिए जाएं।
हवस किसी भी चीज की हो, हवस के पुजारियों का अंत कभी अच्‍छा नहीं होता। उदाहरण के लिए नारायण दत्त तिवारी सामने हैं। एक ऐसी महिला और एक ऐसे युवक के सहारे अस्‍पताल के बिस्‍तर पर मौत का इंतजार कर रहे हैं जिन्‍हें उन्‍होंने अपनी ओर से कभी पत्‍नी एवं पुत्र का दर्जा नहीं दिया। जिनसे पीछा छुड़ाने को बुढ़ापे में अदालतों के चक्‍कर काटे। आज उन्‍हीं दो लोगों तक नारायण दत्त तिवारी की सारी दुनिया सिमटी हुई है। कोई पूछने वाला नहीं, कोई सुनने वाला नहीं।
नेता होने से कोई इस देश का मालिक नहीं हो सकता। हां, मालिक होने का भ्रम जरूर पाल सकता है।
किसी मुलायम, किसी मायावती और किसी अखिलेश को अगर अपना यह भ्रम दूर करना है तो उन अटल बिहारी वाजपेयी के ही वर्तमान जीवन को देख लें जिन्‍होंने बड़ी हसरत के साथ देवभूमि हिमाचल में एक आशियाना बनवाया था यह सोचकर कि राजनीति से सन्‍यास के बाद बाकी का जीवन प्रकृति की गोद में काटेंगे, किंतु आज शायद उन्‍हें अपना ही भान नहीं है आशियाने का तो क्‍या होगा।
-लीजेंड न्‍यूज़

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