कोरोना से कम भयावह नहीं वैचारिक विषाणुओं का कुटिल कुनबा

कोरोना के संकट की भयावहता का अनुमान लगाना हो तो एक निगाह अमेरिका के ताजा आंकड़ों पर डाल लेना उचित रहेगा। विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक व सामरिक महाशक्ति, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर अग्रणी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बीती शाम व्हाइट हाउस की कोरोनावायरस टास्क फोर्स मीडिया से रूबरू हुए। उन्हें यह कहते हुए सुना गया कि जिस तीव्र गति से हमने इस विषाणु को संभाला है अगर वैसा नहीं हुआ होता तो कम से कम 2200000 अमरीकी मौत के मुंह में चले जाते। अब यह आंकड़ा काफी कम रहने वाला है। मगर कितना कम, यह कहना उनके लिए भी संभव नहीं।

अमेरिका में सवा लाख से अधिक कोरोना संक्रमित मरीज हैं और ट्रंप मानते हैं कि अमेरिका में कोरोना का चरम आने में अभी 2 हफ्ते और लग सकते हैं। उधर, स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में दुनिया के दूसरे सबसे बेहतरीन देश (संकट में सब कुछ ध्वस्त हो गया ) इटली के प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से रोते हुए कई रोज पहले यह कहते सुने गए कि बात सरकार और चिकित्सकों के हाथ से बाहर निकल चुकी है और दुआ के सिवा वह भी कुछ नहीं कर सकते। एक दिन में औसतन सात आठ सौ नागरिकों का मरना और मरने वालों का आंकड़ा देखते-देखते 10 हजार पार हो जाना इटली की दुर्दशा का परिचायक है। यूरोप में स्पेन और जर्मनी की हालत भी दिनोंदिन नाजुक होती जा रही है। अफरा तफरी, घबराहट और विषाणु की बढ़ती जकड़ का नतीजा यह है कि जर्मनी के एक राज्य के वित्त मंत्री ने कल रेल के नीचे कटकर जान दे दी।

विश्व में कोरोना की राक्षसी पंजों की इस बढ़ती जकड़ को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रव्यापी लॉक डाउन जैसे जटिल मगर अपरिहार्य रास्ते को चुना था। सीधा सा मकसद था करोड़ों भारतीयों को काल के ग्रास से बचाने के लिए कोरोना के कुचक्र और चक्रव्यूह को सोशल डिस्टेंसिंग के ब्रह्मास्त्र से क्षत-विक्षत कर देना। जनता कर्फ्यू को भारत की जनता ने जैसा अभूतपूर्व समर्थन दिया उसकी उम्मीद बहुतों को नहीं थी। उनको तो बिल्कुल भी नहीं जो नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की जादुई क्षमताओं को जानते हुए भी लगातार नकारते रहे हैं। जनता कर्फ्यू कामयाब हुआ और प्रधानमंत्री फिर टेलीविजन पर प्रकट होकर देशव्यापी 21 दिवसीय लॉक डाउन का ऐलान कर गए तो भारत के भीतर रहकर भारत के अमंगल की कामना करने वाले तत्वों की बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक ही थी।

फिर क्या था? बेचैन आसुरी ताकतें देश को बेचैनी के भाड़ में झोंकने के लिए सक्रिय हो उठे। सबसे गरीब और संवेदनशील तबके को अफवाहों की तोप का बारूद बनाने में इन्होने बहुत देरी नहीं की। नतीजतन घरों की तरफ लौटने को बेताब हजारों लोग कोरोना की रोकथाम के मकसद से किए गए लॉक डाउन को तार-तार करते हुए सड़कों पर उतर आए हैं। इन्हें जाने अनजाने में कोरोना को गले लगाने या फिर उन्हें फैलाने के लिए सड़कों पर उतरे आत्मघाती या फिदायीन कहना पहली नजर में बहुत सख्तबयानी लग सकता है। मगर अफवाहों पर यकीन कर व्यवस्था को तार-तार करते हुए जिस तरह इन लोगों ने खुद अपना जीवन खतरे में डाला है, उसे देखते हुए इनके लिए ‘आत्मघाती’ शब्द काफी सटीक हो सकता है। सड़क पर उतर आए इनमें से अधिकांश लोग पैसा या रोटी का इंतजाम का बहाना बना सकते हैं । व्यवस्थाएं ना होने को अपने सड़क पर आने का कारण बता रहे हैं या बता सकते हैं। मगर बगैर व्यवस्था की दशा में या अव्यवस्था फैला कर सड़कों पर उतरना रोटी या पैसे की कौन सी गारंटी है।

दिल्ली में कुछ अन्य स्थानों पर जिस समय हजारों लोग सड़कों पर उतरे, उस समय तक सरकार गरीब लोगों के लिए व्यापक पैमाने पर खान-पान- राशन की आर्थिक व्यवस्था का एलान कर चुकी थी। लगभग हर शहर में, क्योंकि प्रवासी श्रमिकों के बड़े ठिकाने शहर ही हैं, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठन समाज के इस सीमित साधनों वाले जरूरत मंद वर्ग की मदद के लिए कमर कस चुके थे। देर सवेर इनमें से जिनका उनके मूल स्थानों पर गमन अपरिहार्य था, सरकारी अमले द्वारा उसकी भी व्यवस्था शायद खड़ी कर दी जाती। मगर जैसे अपने यहां अफवाहें फैलाने की असामाजिक तत्वों की एक स्थापित मशीनरी काम करती है ठीक उसी तरह उन सुनियोजित अफवाहों और संयंत्रों के माया जाल में फस कर अपना और समाज के अन्य लोगों का जीवन खतरे में डालने के लिए तैयार रहने का भी हम में से अनेक लोगों का स्वभाव है। यही लोग बीते एक-दो दिनों के दौरान किसी दुष्चक्र में फंस कर सड़कों पर उतरे और एक ऐसी विकट परिस्थिति पैदा कर दी जिसके परिणाम बहुत भयंकर भी हो सकते हैं।

हजारों लोगों के यूं सड़क पर आ जाने के बाद सरकारी अमले के पास आनन-फानन उनके आवागमन की व्यवस्था करने के अलावा कोई चारा नहीं था। अस्थाई शिविरों में रुकने की व्यवस्था का प्रयास भी यहां वहां किया गया लेकिन हकीकत यह है कि घरों की ओर लौट जाने की तमन्ना की या अस्थाई व्यवस्था के प्रति अफवाहों के कारण कमजोर हुआ विश्वास, इन्हें कहां टिकने देता? अब नागरिकों की यह भीड़ सुरक्षित अपने घरों तक तो पहुंच जाएगी, परंतु स्वयं कोरोना के विषाणु से इनमें से कितने सुरक्षित हैं और कितने संक्रमित होकर इस भयावह संक्रमण को किसी न्यूक्लीयर चैन रिएक्शन की तरह विस्फोटक बनाने का कार्य करेंगे, इसका अनुमान लगाना सचमुच कठिन है।

असल संकट या निकटतम संकट तो ठिकानों पर आने वाले दिनों में मंडराता नजर आएगा, जहां-जहां अफवाहों के कारण आत्मघाती हुए यह हमारे अपने लोग ‘अपने-लोगों’ के बीच जाने के चक्कर में जाकर डेरा डालने वाले हैं। वहां के सरकारी अमले के लिए भी यह कोई छोटी आफत का सबब नहीं बनेंगे। इनमें से किस किसको कहां और कैसे जांचा परखा या अलग रखा जा सकेगा, सचमुच कहना कठिन है।

इस बीच देश के सामने मौजूद संकट को अव्यवस्था के आलम में परिवर्तित करने को लालायित ‘अर्बन नक्सल’ और छद्म बुद्धिजीवी गरीबों के मसीहा बनकर अपनी रोटियां सेकने जंगल में उतर चुके हैं। उन्हें कोरोना महामारी के चलते किया गया लॉक डाउन अमीर बनाम गरीब की लड़ाई का एक मोर्चा नजर आने लगा है। यह वही लोग हैं जो पिछले महीने तक भारत में भारत की निर्वाचित संसद के बेहतरीन बहुमत द्वारा पारित नागरिकता संशोधन कानून में असंवैधानिक पे नजर आती थी। जो उस कानून के बहाने से देशभर में सैकड़ों और हजारों शाहीन बाद पैदा करके भारत को अस्थिर करने की तैयारियां और घोषणाएं छिपकर नहीं खुलेआम मंचों से और कैमरों के सामने करने लगे थे। इनमें घनघोर अनीश्वरवादी और धर्म को अफीम बताने वाले ‘कन्हैया-करात-कुल’ के कामरेड और गजवा-ए-हिंद के इंतजार में बेताब कट्टरपंथी इस्लाम के सरजील इमाम जैसे पतित पैरोकार शामिल थे। भारत की अस्थिरता में यह दोनों विपरीत ध्रुवीय ताकतें हमेशा की तरह सीएए विरोधी आंदोलन में भी गलबाहिया डालकर साथ थे।

अब जब देश चीन से पैदा होकर विश्व भर को अपने आगोश में लपेटने निकली कोरोना की महामारी से जूझने में जुटा है, यही विखंडन वादी ताकतें इस संघर्ष को बिखेरने की हर संभव कोशिश करेंगी। दिल्ली व आसपास के क्षेत्र में अफवाहें फैलाने वाले लोगों की देर सवेर जब पड़ताल होगी तो संदेह की सुई इसी कलुषित मानसिकता वाले कुनबे के आंगन के किसी कोने की तरफ इशारा करती नजर आएगी।

एक राष्ट्र के रूप में भारत के सम्मुख कोरोना के विषाणु को अड़कर और लड़कर हरा देना तात्कालिक चुनौती है। इसके लिए ‘भीमकाय’ इच्छाशक्ति वाले प्रभावी नेतृत्व के हाथ में भारत की कमान होना, संयोग हो या कोई ईश्वरीय योजना, यह संतोष की बात है। इस नेतृत्व पर देश की आबादी के बहुत बड़े हिस्से का विश्वास आज भी बरकरार है, जो भारत के राष्ट्रीय आत्मविश्वास का अद्भुत स्रोत है। आने वाले चंद दिनों में भले कुछ और खराब होती नजर आए मगर अंततोगत्वा इस विषाणु को भारत परास्त कर देगा। यह दीगर बात है कि अनायास आए इस संकट की भारतीय जनमानस और हमारा अर्थ तंत्र क्या कीमत अदा करेगा, फिलहाल कोई नहीं जानता।

परंतु कोरोना के विषाणु से कहीं अधिक विषैला और खतरनाक वह वैचारिक विषाणु है जो भारत की राष्ट्रीय चेतना के ‘डीएनए’ को आए दिन नया रूप धारण कर निशाना बनाने बनाने निकलता है। वह विषाणु जिसे चीन में पैदा हुए कोरोना नाम के वायरस को चीनी वायरस कहने में परेशानी होती है मगर विश्व के सर्वाधिक सहिष्णु और मानवतावादी राष्ट्र भारत को असहिष्णु घोषित करने में तनिक व क्षणिक लाज नहीं आती। इस वैचारिक-विषाणु को भी चीन समेत विभिन्न भारत विरोधी वैश्विक शक्तियां पर्दे के पीछे रहकर ठीक वैसे पोषित करती रही हैं, जैसे संदेह पैदा करने वाले सवाल कोरोना को लेकर बीते कुछ दिनों से विश्व भर के मीडिया में उभर कर आई कथित ‘कांस्पीरेसी’ कथाओं में चीन की भूमिका को लेकर आज सरेआम उठाए जा रहे है। ऐसे में दूसरे विषाणु के खिलाफ भी भारत की राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत मोर्चाबंदी करनी होगी। और यह काम पूरी तरह है सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता।
virendra singh chauhan

-डॉ. वीरेन्द्र सिंह चौहान
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षक हैं और सम्प्रति हरियाणा ग्रन्थ अकादमी में निदेशक और उपाध्यक्ष है)

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