Hong Kong को लेकर बीजिंग की दुविधा दर्शाती है प्रत्यर्पण बिल की हार

Hong Kong को चीन के प्रत्यर्पण क़ानून के ख़िलाफ़ लड़ाई में बड़ी जीत हासिल हुई है. चीन के अधिकारियों के साथ घंटों लंबी चली बैठक के बाद Hong Kong की चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव कैरी लैम ने ऐलान किया कि सरकार ने इस क़ानून को अस्थाई रूप से स्थगित कर दिया है. चीन ने भी उनके इस ऐलान का समर्थन किया.
इस क़ानून के मुताबिक़ Hong Kong के लोगों को मुक़दमे के लिए चीन भेजा जा सकता था. Hong Kong वासियों को डर था कि इससे राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जा सकता है. साथ ही ये Hong Kong को मिली स्वायत्तता का भी हनन है.
लैम का ये ऐलान पिछले कुछ सालों में चीन के पीछे हटने का शायद पहला मौक़ा है. साल 2012 में शी जिनपिंग के हाथों में चीन की कमान आने के बाद राजनीतिक स्तर पर पहली बार चीन अपने क़दम रोकता हुआ नज़र आ रहा है.
चीन का ये क़ानून Hong Kong की स्वायत्तता में उसके दख़ल की जारी तमाम कोशिशों का एक हिस्सा है. साल 1997 में जब ब्रिटेन ने चीन को हॉन्गकॉन्ग सौंपा था तो इस शहर की स्वतंत्रता बनाए रखने को लेकर कुछ शर्तें रखी गई थीं लिहाज़ा Hong Kong के पास अपने अलग चुनाव, अपनी करेंसी, प्रवासियों से जुड़े नियम और अपनी न्यायिक प्रणाली है लेकिन बीते 20 साल में बीजिंग और Hong Kong के चीन समर्थित एसेंबली ने ना सिर्फ़ शहर की इस आज़ादी को ख़त्म करने की कोशिश की है बल्कि कई स्तर पर सफल भी हुए हैं.
माना जा रहा है आने वाले दिनों में इस प्रदर्शन के और आगे बढ़ने की स्थिति को देखते हुए और ख़ास कर रविवार को होने वाले प्रदर्शन को देखते हुए चीन ने लैम के बयान का समर्थन करना उचित समझा.
क्यों पीछे हटा चीन?
चीन इस वक़्त कई फ़्रंट पर लड़ाईयां लड़ रहा है. अमरीका के साथ जारी ट्रेड वॉर, देश की धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था और तेज़ी से बढ़ती मुद्रा स्फ़ीति दर चीन के सामने चुनौती पेश कर रहा है.
इन सब के बीच चीन नहीं चाहता की वह प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पेपर स्प्रे, आंसू गैस छोड़ने जैसी कार्यवाही दोहराता रहे.
9 जून को Hong Kong की सड़कों पर लोग बेहद शांति पूर्ण तरीक़े से निकले, ये इतना शांत प्रदर्शन था कि सड़कों के किनारे दुकानों के मालिकों ने दुकान पर लगे लोहे के शटर तक नहीं गिराए लेकिन एकाएक 12 जून को हिंसा का मंज़र सामने आया.
जब प्रदर्शनकारियों के कुछ पत्थर फेंके जाने का जवाब सुरक्षा कर्मियों ने भारी आंसू गैस और स्प्रे के इस्तेमाल से दिया लेकिन बीजिंग की ओर झुकाव रखने वाली लैम ने इस कार्यवाही को ”ज़रूरी और ज़िम्मेदार” क़दम बताया.
माना जा रहा है कि प्रदर्शन करने वालों पर ये कार्यवाही करने पर सिर्फ़ स्थानीय व्यवसायी ही नहीं बीजिंग भी लैम के खिलाफ़ हो गया. इनका कहना था कि ये क़दम मुद्दे को भटका रहा है.
चीन का अपने फ़ैसले पर रोक लगाना Hong Kong के लिए एक फौरी राहत तो हो सकती है लेकिन उसकी आज़ादी पर उसका हक़ अब भी पूरा नहीं है. इस शहर को स्वायत्तता तो दी गई है और चुनाव भी कराने का अधिकार है लेकिन पूर्ण लोकतंत्र यहां लोगों को नसीब नहीं है.
Hong Kong के नागरिक असेंबली में बैठे 50 फ़ीसदी सदस्यों के लिए वोट कर सकते हैं. लेकिन बाक़ी के सदस्यों का फ़ैसला इस क्षेत्र के बिज़नेस सेक्टर का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग ही करते हैं जो ज़ाहिर तौर पर बीजिंग के साथ ख़ास व्यापारी रिश्ते रखते हैं.
यहां चुनाव समिति में 1200 सदस्य हैं और ज़्यादातर का झुकाव बीजिंग की नीतियों की ओर होता है. ऐसे में Hong Kong का चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव वहीं बनता है जिसे बीजिंग का समर्थन प्राप्त हो और वो भी उसकी नीतियों से सहमत हो.
कैरी लैम भी ऐसे ही एक्ज़ीक्यूटिव में से एक हैं. पिछले साल दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ”आप कह सकते हैं कि ये जूता पोंछने जैसी बातें हैं लेकिन मुझे राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक करिश्माई शख्स़ियत लगते हैं, वो जो कहते हैं और करते हैं वो बेहद प्रशंसनीय होता है.”
प्रत्यर्पण बिल की हार Hong Kong को लेकर बीजिंग की दुविधा को दिखाता है. बीजिंग यहां पूर्ण नियंत्रण को बनाए रखना चाहता है और इसलिए अर्ध-स्वायतत्ता वाले इस क्षेत्र में पूर्ण लोकतंत्र की अनुमति नहीं देना चाहता है.
लोकतंत्र के अभाव के कारण यहां की सरकार एक राजनीतिक संकट में आ जाती है और ये भी भूल जाती है कि वह जनता के लिए है ना कि बीजिंग के साथ अपनी वफ़ादारी वाले रिश्ते के लिए.
यही कारण रहा कि इस बिल को एग्ज़िक्यूटिव बैठक में चीनी नए साल की छुट्टियों से तीन दिन पहले लाया गया इस पर बहस भी नहीं की गई. इस काउंसिल में ज़्यादातर वही नेता थे जो बीजिंग का समर्थन करते हैं.
बिल के मुताबिक चीन की सुरक्षा एजेंसियां Hong Kong में किसी की प्रॉपर्टी ज़ब्त कर सकती थी, ना सिर्फ़ हॉन्गकॉन्ग बल्कि विदेशी जो हॉन्गकॉन्ग में रह रहे हैं उन पर भी ये क़ानून लागू किए जाने का प्रावधान था. इन नियमों के कारण स्थानीय व्यापारी भी इसके खिलाफ़ थे लेकिन खुलकर सामने नहीं पा रहे थे.
इस पूरे प्रकरण से साफ़ पता चलता है कि Hong Kong की चीफ़ एक्जीक्यूटिव बीजिंग के प्रति जवाबदेह हैं न कि जनता के प्रति, फिर भी बीज़िंग ये कहता रहता है कि वह ”हॉन्गकॉन्ग को उच्चस्तरीय स्वायत्तता देने के लिए प्रतिबद्ध है. ”
लेकिन सवाल ये है कि अगर चीफ़ एग्जिक्यूटिव का चयन हॉन्गकॉन्ग की जनता ने किया होता तो क्या उसे इस तरह अपने मूल अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता?
Hong Kong में ऐसा पहली बार नहीं है जब लोग अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतरें हों. कई बार नागरिक महीनों अपनी मांगों के लिए लड़ चुके हैं. साल 2014 में हुआ अंब्रेला मूवमेंटजनता ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ा था. 79 दिन तक चले इस प्रदर्शन में जनता वोट देने और अपना नेता चुनने की मांग लेकर सड़कों पर डटी रही, हालांकि उसे इस लड़ाई में सफलता नहीं मिली.
इस आंदोलन के नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया है लेकिन इस गिरफ्तारी को अब तक चीफ़ एग्ज़िक्यूटिव राजनीतिक बदले की भावना से लिया गया क़दम नहीं मानती हैं.
Hong Kong के लोग कोई बड़ी क्रांति नहीं करना चाहते, वे बस अपने छोटे-छोटे मूल अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, शायद यही कारण है कि अब यहां के नागरिकों को अपनी लड़ाई लड़ने के लिए किसी नेता के चेहरे की ज़रूरत भी नहीं है.
-BBC

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