मुल्‍ला नसरुद्दीन की गवाही

क्‍या हमारी न्‍याय व्‍यवस्‍था ही हमें झूठ बोलने और उस पर अंत तक टिके रहने को बाध्‍य करती है?
क्‍या अदालतों में दी जाने वाली गवाहियां अधिकांशत: इसीलिए झूठी होती हैं क्‍योंकि हमारी कानून-व्‍यवस्‍था ही हमें उसके लिए प्रेरित करती है ? विचार कीजिए।
मुल्‍ला नसरुद्दीन गया अदालत में गवाही देने। गवाही देने से पहले जज ने मुल्‍ला से पूछा- मुल्‍ला, तुम्‍हें मालूम है कि यहां शपथ लेकर गवाही देने का क्‍या मतलब है?
जी हां, हुजूर! मुल्‍ला बोला।
मुझे अच्‍छी तरह मालूम है कि यदि मैं शपथ लेकर झूठी गवाही दूं तो अंत तक उसी पर टिका रहूं, चाहे कुछ भी हो जाए।