तमसो मा ज्योतिर्गमय… ध्यान, धर्म और योग का सेतु

तमसो मा ज्योतिर्गमय का सामान्य अर्थ यह है कि अंधकार से प्रकाश की ओर चलो, बढ़ो। आज प्रधानमंत्री ने 9 अप्रैल को रात्र‍ि 9 बजे इसी प्रकाश की बात की है जो संभवत: कोरोना की इस व‍िकट स्थ‍ित‍ि में आम जन को भयमुक्त करने का सबसे सही तरीका भी है । हमें इसी ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने में सबसे अध‍िक सहयोग करेगा महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में बताए गए ध्यान, धर्म और योग  को एकसाथ साधने के उपाय।

महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों में अध्यात्म अपनी सर्वोच्चता पर है, योगसूत्र के रचनाकार पतंजलि ही है जो हिन्दुओं के छः दर्शनों (न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त) में से एक है। भारतीय साहित्य में पतंजलि के लिखे हुए ३ मुख्य ग्रन्थ मिलते हैं- योगसूत्र, अष्टाध्यायी पर भाष्य और आयुर्वेद पर ग्रन्थ।

इसमें निर्विचार समाधि के गूढ़ रहस्य और तत्व हैं। योग की यथार्थता तथा सार्थकता ‘ध्यान’ से फलित होती है। अगर ध्यान प्रबल हुआ तो समाधि का फल मिलता है। समाधि के विविध अवस्थाओं में सबसे पहली अवस्था है सम्प्रज्ञात। इसमें विचार की परिशुद्धि हो जाती है। बुद्धि के भ्रम दूर हो जाते हैं। यही अध्यात्म का फल है।

चित्त की अवस्थाओं में आने वाले उतार-चढ़ाव, इसमें इकट्ठे होने वाले कर्मबीजों की ही शुद्धि करनी है। व्यवहार के रूपान्तरण, परिवर्तन से करें या फिर ध्यान की तल्लीनता से, चित्त की शुद्धि आवश्यक है। इसकी अशुद्धि के कई कारण हैं लेकिन चित्त की गहराई में जाकर संस्कार के बीज को बाहर निकालकर उसे नष्ट करके चित्त को शुद्ध करना है।

चित्त के संस्कार अदृश्य होने पर भी बहुत शक्तिशाली होते हैं। ये कुसंस्कार दुष्परिणाम देते हैं।

ये पूरी जीचवन चेतना को नष्ट कर देते हैं लेकिन सुसंस्कार जीवन को सद्मार्ग पद चलाते हैं। महर्षि पतंजलि कहते हैंµ‘आध्यात्मिक जीवन के लिए चित्त के संस्कारों से मुक्त होना चाहिए। इस शुद्धिकरण की प्रक्रिया है पवित्र भाव, पवित्र विचार, पवित्र दृश्य और पवित्रता से ध्यान की प्रक्रिया शुरू होती है। जब चित्त में कोई लहर नहीं उठती है तब आती है चित्त मेें शून्यता और स्वच्छता। यह अवस्था परम निर्मल तथा आध्यात्मिक ज्ञान देने वाली होती है।’
अग्नि की तरह है ‘ध्यान’। बुराइयां ध्यान में जलकर नष्ट हो जाती हैं। धर्म और येाग की आत्म है ‘ध्यान’। ध्यानियों को मृत्यु का भय नहीं सताता है। ध्यान से हम अपने मूलस्वरूप को जान सकते हैं। स्वयं को ढूढने को ‘ध्यान’ ही एकमात्र विकल्प है।

किसी भी देश, जाति, धर्म या व्यक्ति सबको ध्यान की जरूरत है। ध्यान से ही व्यक्ति के विचारों में बदलाव आता है। ध्यान से हिंसा और मूढ़ता समाप्त होती है। ध्यान के अभ्यास से जागरुकता बढ़ती है। जागरुकता से हमें, हमारी और लोगों की बुद्धिहीनता का पता चलने लगता है। ज्ञानी, ध्यानी व्यक्ति चुप इसलिए रहता है कि वह लोगों के भीतर झांककर देख लेता है कि इसके भीतर क्या चल रहा है। ध्यानी व्यक्ति यंत्रवत जीवन छोड़ देता है। ‘ध्यान’ तो व्यक्ति को मौन कर देता है। ध्यान तो व्यक्ति को मौन कर देता है। ध्यान बहुत शांति प्रदान करता है। ध्यानस्थ होगे तो ज्यादा बात करने और जोर से बोलने का मन नहीं करेगा। जिसके भीतर व्यर्थ के विचार होते हैं वे ज्यादा बात करते है। भटके हुए मन के लोग जिन्दगी भर व्यर्थ की बात करते हैं। समस्याओं का समाधान बहस में नहीं बल्कि ध्यान में है।

हमारे मन में एक साथ कई विचार चलते रहते हैं। मन में दौड़ते विचारों से मस्तिष्क में हलचल उत्पन्न होने लगता है जिससे मानसिक अशांति पैदा होने लगती है। ध्यान अनावश्यक विचारों का मन से निकालकर शुद्ध और आवश्यक विचारों का मस्तिष्क में जगह देता है।
‘ध्यान’ तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है और उसे बल प्रदान करता है। ध्यान का नियमित अभ्यास करने से आत्मिक शक्ति बढ़ती और मानसिक अशांति की अनुभूति होती है। ध्यान का अभ्यास करते समय शुरू में 5 मिनट भी काफी होता है और अभ्यास के बाद 20-30 मिनट तक ध्यान लगायें।

मनुष्य के अंदर काफी बुराईयां हैं। ध्यान करने वाला साधक जब साधना की गहराई में जाता है तो साधना की प्रचंड अग्नि में बुराइयां धीरे-धीरे जल जाती हैं। योग का अष्टांग योग जब ध्यान तक पहुंचता है तो वह समाधि का फल देता है, समाधि फलीभूत होने लगता हैं ध्यान, धर्म और योग को जोड़ता है वह सेतु का कार्य करता है। धर्म, योग और ध्यान त्रिवेणी है, इसमें स्नान करने से साधक के सभी संताप नष्ट हो जाते हैं।
– Legend News

 

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