उसे खूब मालूम है ज़ुल्म ढाने का तरीका- सलिल सरोज

 उसे खूब मालूम है ज़ुल्म ढाने का तरीका, ज़ख़्म देता है तो उसपर नमक भी रखता है. क्या कर सकेंगे

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सलिल सरोज की कविता: मेरे गाँव की यही निशानी रही

कविता: मेरे गाँव की यही निशानी रही राहों पे बाट जोहती जवानी रही मेरे गाँव  की  यही निशानी रही जो कदम

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