उसे खूब मालूम है ज़ुल्म ढाने का तरीका- सलिल सरोज

 उसे खूब मालूम है ज़ुल्म ढाने का तरीका, ज़ख़्म देता है तो उसपर नमक भी रखता है. क्या कर सकेंगे

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नवसृजन: रचनाकार सलिल सरोज की कुछ गज़लें

मेरे अज़ीम मुल्क़ से ही मेरी पहचान है मेरे अज़ीम मुल्क़ से ही मेरी पहचान है मंदिर की घंटी,मस्जिद की

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