जहन्नुम की विभीषिकाओं से भी ज़्यादा ख़तरनाक होता है एक तिरस्कृत औरत का ग़ुस्सा

एक अंग्रेज़ नाटककार विलियम कंग्रीव ने 1697 में लिखे अपने नाटक ‘द मोर्निंग ब्राइड’ में लिखा था, ”हेवेन हैज़ नो

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