गांधी पर लिखा वह नाटक, जिसे 50 साल तक किसी ने नहीं छापा

“हिंदुस्तान एक था और एक बना रहे. इससे ज़्यादा स्वाभाविक कोई और बात मैं नहीं मानता. जिसे मैं निराशाजनक मानता

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