Sushma Swaraj का जाना भारतीय राजनीति के लिए एक विराट शून्य

०७ अगस्त की सुबह जैसे ही नींद खुली तो पता चला कि हम सब की प्रिय, दीदी श्रीमती Sushma Swaraj जी चिर निंद्रा में थी, वो एक लम्बी यात्रा के लिए निकल चुकी हैं, लेकिन फर्क सिर्फ इतना है हम उन्हें देख नहीं सकते सिर्फ वो ही हमें देख सकती हैं। सुषमा जी इस दुनिया को छोड़कर एक नयी दुनिया में चली गयी हैं, वो नयी दुनिया भी Sushma Swaraj जी का पुष्प वर्षा करके स्वागत कर रही होगी। सुषमा जी का व्यक्तिगत जीवन बहुत ही सादगीपूर्ण और साहसिक था। सुषमा दीदी एक प्रखर वक्ता के साथ-साथ एक सख्त प्रशासक, साहसिक और लोकप्रिय नेता थी। सुषमा जी की  भाषण देने की कला हर किसी को बहुत प्रभावित करती थी, सुषमा जी जब भाषण देती थी तो ऐसा लगता था कि उनकी जुबान पर मान सरस्वती विराजमान हो। सुषमा जी हमेशा तथ्यों के साथ अपने भाषण देती थी। वो बहुत अच्छी तरह से धारा प्रवाह भाषण भी देती थी। आज भी उनके संसद में दिए गए भाषण लोकप्रिय हैं। जब वो बोलती थीं तो ऐसा लगता थी कि उन्हें देखते ही रहो और उनकी ओजस्वी वाणी को सुनते रहो। सुषमा जी हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और कन्नड़ भाषा सहित और कई भाषाओँ में धारा प्रवाह भाषण देती थीं। अच्छे-अच्छे विद्वानों में संस्कृत में भाषण देने की हिम्मत नहीं होती है लेकिन सुषमा जी द्वारा संस्कृत में दिए गए भाषण भी बहुत लोकप्रिय हैं। सुषमा जी का सामाजिक और राजनैतिक जीवन बहुत लम्बा रहा है। इतने बड़े सार्वजनिक जीवन में सुषमा जी का किसी विवाद से नाता नहीं रहा यही बात उनके व्यक्तिगत जीवन को विशेष बनाती है। सुषमा स्वराज जी ने अपने जीवन में कई रिकॉर्ड बनाये। सुषमा जी भारत की प्रमुख महिला राजनेताओं में से एक थी जिन्होंने अपने राजनैतिक जीवन में कई आयाम स्थापित किये।

सुषमा स्वराज जी का जन्म सन १४ फरवरी १९५२ को हरियाणा (तब पंजाब) राज्य की अम्बाला छावनी में हुआ। सुषमा जी के पिता का नाम हरदेव शर्मा और माता का नाम लक्ष्मी देवी था। सुषमा स्वराज विवाह पूर्व सुषमा शर्मा थीं। सुषमा स्वराज ने अम्बाला के सनातन धर्म कॉलेज से संस्कृत तथा राजनीति विज्ञान में स्नातक किया। सुषमा स्वराज ने पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ से कानून की डिग्री ली।  सुषमा स्वराज तीन साल तक लगातार एस॰डी॰ कालेज छावनी की एन सी सी की सर्वश्रेष्ठ कैडेट रहीं और तीन साल तक राज्य की श्रेष्ठ वक्ता भी चुनी गईं। सुषमा जी ने अपने छात्र जीवन कई बार सर्वश्रेष्ठ वक्ता के पुरस्कार प्राप्त किये। १९७३ में सुषमा स्वराज भारतीय सर्वोच्च न्यायलय में अधिवक्ता के पद पर कार्य करने लगी। सुषमा स्वराज जी का विवाह स्वराज कौशल के साथ १३ जुलाई १९७५ को हुआ, जो सर्वोच्च न्यायालय में उनके सहकर्मी और साथी अधिवक्ता थे। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद सुषमा स्वराज जी ने जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। १९७५ में आपातकाल का पुरजोर विरोध करने के बाद वे सक्रिय राजनीति से जुड़ गयीं। इसके बाद सुषमा स्वराज जी हरियाणा की राज्य सरकार के मंत्रिमंडल में देश की सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री के तौर पर साल १९७७ में शामिल हुईं, उस समय सुषमा स्वराज जी की उम्र 25 साल की थीं। सुषमा स्वराज को साल 1979 में 27 साल की उम्र में हरियाणा राज्य में  जनता पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। १९७९ में  सुषमा स्वराज जी हरियाणा की पहली महिला पार्टी प्रमुख बनी थीं।  भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद ८० के दशक में सुषमा स्वराज जी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गयी। इसके बाद एक बार फिर १९८७ से १९९० तक  वह अम्बाला छावनी से विशानसभा सदस्य रही, और भाजपा-लोकदल संयुक्त सरकार में शिक्षा मंत्री रही।

सुषमा स्वराज जी साल १९९०-१९९६ तक राज्यसभा सदस्य रहीं। १९९६ में सुषमा स्वराज जी ने  दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीता, और १३ दिन की अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में सूचना और प्रसारण मंत्री रही। इसके साथ ही सुषमा जी भारतीय जनता पार्टी की तरफ से कैबिनेट मंत्री बनने वाली पहली महिला बनीं। सुषमा स्वराज जी ने साल 1996 में केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री रहते हुए पहली बार लोकसभा से सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शुरुआत की थी। १९९८ में सुषमा जी ने एक बार फिर  दक्षिण दिल्ली संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीता। इस बार फिर से सुषमा स्वराज जी के पास वाजपेयी सरकार में दूरसंचार मंत्रालय के अतिरिक्त प्रभार के साथ सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का प्रभार था। वह केंद्रीय मंत्री के रूप में १९ मार्च १९९८ से १२ अक्टूबर १९९८ तक रहीं। इसके बाद सुषमा स्वराज जी को भारतीय जनता पार्टी द्वारा दिल्ली की मुख्यमंत्री बनाया गया इसके साथ ही सुषमा जी को दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। इसके साथ ही  सुषमा स्वराज जी भारतीय जनता पार्टी की तरफ से किसी भी राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद उमा भारती (मध्यप्रदेश), वसुंधरा राजे (राजस्थान), आनंदीबेन पटेल (गुजरात) की मुख्यमंत्री बनीं। सितंबर १९९९ में उन्होंने कर्नाटक के बेल्लारी लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा। अपने चुनाव अभियान के दौरान, उन्होंने स्थानीय कन्नड़ भाषा में ही सभाओं को संबोधित किया था। हालांकि वह बहुत ही कम अंतर से चुनाव हार गयी। लेकिन सुषमा स्वराज ने एक राष्ट्रीय नेता के रूप में अपनी पहचान बना ली थीं।  इसके बाद साल 2000 में सुषमा स्वराज जी उत्तर प्रदेश से राजयसभा सदस्य चुनी गयीं तथा उन्हें फिर से केन्द्रीय मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में शामिल किया गया था। साल २००३ में सुषमा स्वराज को  स्वास्थ्य, परिवार कल्याण और संसदीय मामलों में मंत्री बनाया गया, और सुषमा जी अटल जी की सरकार रहने  तक मंत्री रहीं। इसके साथ ही सुषमा स्वराज जी को किसी भी राजनैतिक दल  की पहली महिला प्रवक्ता होने का गौरव प्राप्त है। अप्रैल २००६ में सुषमा स्वराज को मध्य प्रदेश राज्य से राज्यसभा में तीसरे कार्यकाल के लिए फिर से निर्वाचित किया गया। इसके बाद सुषमा जी लगातार दो बार मध्य प्रदेश के विदिशा लोकसभा क्षेत्र से साल 2009 में १५वीं और साल 2014 में १6वीं लोकसभा के लिए सदस्य निर्वाचित हुई। साल 2009 में सुषमा स्वराज जी संसद में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से पहली महिला नेता प्रतिपक्ष चुनी गईं और २०१४ तक इस पद पर रहीं। इसके बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साल २०१४ में भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनायीं और इस सरकार में सुषमा स्वराज देश की पहली पूर्णकालिक महिला विदेश मंत्री थीं।

सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री रहते हुए बहुत अच्छे कार्य किये, उनके विदेश मंत्री रहते हुए भारत देश ने बहुत देशों के साथ अच्छे राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किये।  अगर कोई पीड़ित व्यक्ति सुषमा जी को अपनी परेशानी को लेकर कोई ट्वीट करता था तो उसके एक ट्वीट पर मदद पहुँच जाती थी। अपने विदेश मंत्री रहते हुए सुषमा जी ने कई बिछड़ों को अपनों से मिलाया इसलिए लोग उन्हें मदर इंडिया भी कहने लगे थे। इसके साथ ही सुषमा जी ने विदेशों में बसे हर भारतीय को परेशानी में मदद पहुंचाई। विदेश मंत्री के तौर पर सुषमा स्वराज ने ‘यमन संकट’ के दौरान  चलाए गए ‘ऑपरेशन राहत’ में बहुत ही शानदार काम किया था। इस दौरान 4,741 भारतीय नागरिकों और 48 देशों के 1,947 लोगों को बचाया गया था।

सुषमा स्वराज ने विदेशमंत्री रहते हुए युद्धग्रस्त इराक में फंसे 168 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला था। सुषमा स्वराज जी ने विदेशमंत्री रहते हुए मानवीयता के आधार पर भी कई शानदार फैंसले लिए, इसके लिए पूरे विश्व समुदाय में उनकी काफी तारीफ़ हुई। सुषमा स्वराज जी विदेश मंत्री रहते हुए खराब स्वास्थ्य के बावजूद भी लगातार काम करती थीं। उनका विदेशमंत्री का कार्यकाल अत्यंत सफल रहा। सुषमा स्वराज जी ने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर २०१९ का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा और न ही मोदी सरकार में कोई मंत्री पद स्वीकार किया। सुषमा जी अपने अंतिम समय तक सक्रिय रहीं उन्होंने अपने निधन से ३ घंटे पहले ट्वीट के माध्यम से कश्मीर से धारा ३७० हटाने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी जिसमे उन्होंने कहा था ”प्रधान मंत्री जी – आपका हार्दिक अभिनन्दन. मैं अपने जीवन में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।” सुषमा जी जम्मू कश्मीर से सरकार द्वारा धारा ३७० हटाने से अत्यंत प्रसन्न थीं किसी को क्या पता था कि सुषमा जी इतनी जल्दी गोलोकवास  के लिए चली जाएंगी।

सुषमा स्वराज जी का व्यक्तित्व हिमालय के सामान विराट था। भारत देश सहित सम्पूर्ण विश्व ने एक अत्यंत प्रिय नेता खो दिया है जो सार्वजनिक जीवन में गरिमा, सौम्यता, साहस और निष्ठा का प्रतीक था। सुषमा जी हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहती थीं। भारत की जनता की सेवा के लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा। सुषमा जी एक कुशल राजनीतिज्ञ, एक प्रखर ओजस्वी वक्ता और एक सादगीपूर्ण व्यक्तित्व की धनी थीं। सुषमा जी का स्थान भारतीय राजनीती में कोई नहीं ले सकता है। उन्होंने भारतीय राजनीती में अपने किये गए कार्यो और अपने व्यवहार से जो छाप छोड़ी है वह अमिट एवं अनुकरणीय है। सुषमा जी में भारतीय संस्कृति कूट-कूट कर भरी थी कहा जाए तो वह भारतीय नारी का गौरव थीं। सुषमा जी एक महान नेता थीं, जिनके जाने से भारतीय राजनीति को बहुत क्षति हुई है जिसकी भरपाई मुश्किल है। सुषमा स्वराज जी ने एक प्रखर ओजस्वी वक्ता, एक आदर्श कार्यकर्ता, लोकप्रिय जनप्रतिनिधि व कर्मठ मंत्री जैसे विभिन्न रूपों में भारतीय राजनीती में अपनी एक अद्वितीय पहचान बनायी। लोकप्रिय नेता सुषमा स्वराज जी का दिल का दौरा पड़ने से ०६ अगस्त २०१९ को ६७ साल की उम्र में निधन हो गया। सुषमा स्वराज जी का निधन भाजपा और भारतीय राजनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति है। ईश्वर उनकी पवित्र आत्मा को शांति दे।

लेखक – ब्रह्मानंद राजपूत, आगरा

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