राफेल मामले में Review Petition पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को राफेल डील मामले में करारा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने सरकार की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए राफेल मामले में Review Petition पर नए दस्तावेज के आधार पर सुनवाई की फैसला किया है।
सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय बेंच ने एक मत से दिए फैसले में कहा कि जो नए दस्तावेज डोमेन में आए हैं, उन आधारों पर राफेल मामले में Review Petition पर सुनवाई होगी। बेंच में सीजेआई के अलावा जस्टिस एस. के. कौल और जस्टिस के. एम. जोसेफ शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट अब Review Petition पर सुनवाई के लिए नई तारीख तय करेगा। राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना था कि इससे संबंधित डिफेंस के जो दस्तावेज लीक हुए हैं, उस आधार पर Review Petition की सुनवाई की जाएगी या नहीं।
केंद्र ने लीक दस्तावेजों के आधार पर सुनवाई का किया था विरोध
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लीक दस्तावेजों के आधार पर Review Petition पर सुनवाई का विरोध किया था और कहा था कि ये दस्तावेज प्रिविलेज्ड (विशेषाधिकार वाला गोपनीय) दस्तावेज है और इस कारण रिव्यू पिटीशन खारिज किया जाना चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस के. एम. जोसेफ ने कहा था कि आरटीआई एक्ट 2005 में आया है और ये एक क्रांतिकारी कदम था ऐसे में हम पीछे नहीं जा सकते।
लीक दस्तावेजों को केंद्र ने बताया था गोपनीय
सरकार ने कहा था कि जो दस्तावेज प्रशांत भूषण ने रिव्यू पिटीशन के साथ पेश किए हैं वह प्रिविलेज्ड दस्तावेज हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। ये दस्तावेज गोपनीय हैं और आरटीआई के अपवाद में हैं, साथ ही एविडेंस एक्ट के तहत गोपनीय दस्तावेज हैं। इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत गोपनीय दस्तावेज पेश नहीं किए जा सकते। जो दस्तावेज राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हों, दो देशों के संबंधों पर असर डालते हों, उन्हें गोपनीय दस्तावेज माना गया है।
अनुच्छेद-19 (2) के तहत अभिव्यक्ति के अधिकार पर वाजिब रोक की बात है। जहां देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला होगा, वह रोक के दायरे में आएगा। आरटीआई के तहत भी देश की संप्रभुता से जुड़े मामले को अपवाद माना गया है। सरकारी गोपनीयता कानून की धारा-3 और 5 में भी रोक है।
पब्लिक डोमेन में हैं दस्तावेज: भूषण
इस दौरान याचिकाकर्ता वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि ये तमाम दस्तावेज पब्लिक डोमेन में हैं। जो दस्तावेज पहले से लोगों के सामने हैं उस पर कोर्ट इसलिए विचार न करें क्योंकि ये प्रिविलेज्ड दस्तावेज हैं, यह बेकार की दलील है। एविडेंस एक्ट के तहत जो दस्तावेज पब्लिक डोमेन में लाने से रोके गए हैं, वो ऐसे दस्तावेज हैं जो पहले से गोपनीय हैं और प्रकाशित नहीं हुए हैं लेकिन इस मामले में डिफेंस के दस्तोवज पहले से लोगों के सामने हैं। केंद्र सरकार ने अभी तक मामले में केस दर्ज नहीं किया। पहली बार 18 नवंबर को ये रिपोर्ट वेबसाइट पर छपी।
सीएजी रिपोर्ट सरकार ने पेश की है। उसमें डिफेंस डील से संबंधित जानकारी है। भूषण की दलील थी कि सरकार ने खुद सीएजी रिपोर्ट को कोर्ट में पेश किया। ऐसे में उनकी ओर से पेश दस्तावेज को प्रिविलेज्ड दस्तावेज कैसे कह सकते हैं। उधर प्रेस काउंसिल कहता है कि मीडिया कर्मी सोर्स बताने के लिए बाध्य नहीं हैं। एसपी गुप्ता से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दे रखी है कि कोई दस्तावेज गोपनीय है या नहीं और देश की सुरक्षा से जुड़ा है, इस बात को पब्लिक इंट्रेस्ट में परखा जाएगा। इस मामले में दस्तावेज पहले से पब्लिक में है। सरकार खुद की अपने लोगों को इस तरह की जानकारी लीक करती रही है। रक्षा मंत्री की फाइल नोटिंग भी इसी तरह लीक की गई। 2 जी मामले और कोल ब्लॉक मामले में भी दस्तावेज पब्लिक डोमेन में आए थे और सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि व्‍हसिल ब्लोअर का नाम बाहर लाने की जरूरत नहीं है। अगर दस्तावेज केस के लिए जरूरी हैं तो यह बात औचित्यहीन है कि उसे कहां से और कैसे लाया गया है।
याचिकाकर्ता की दलील, गोपनीयता जनहित से ऊपर नहीं
भूषण ने कहा कि वियतनाम वॉर से संबंधित पेंटागन के दस्तावेज पब्लिक डोमेन में आए या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था और यूएस सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण दस्तावेज गोपनीय रखने की दलील खारिज कर दी गई थी। सरकार की दलील पूर्वाग्रह वाली है और टिकने वाली नहीं है कि दस्तावेजों को विशेषाधिकार वाले दायरे में नहीं रखा जा सकता क्योंकि ये पहले से ही प्रकाशित है। अगर दस्तावेज करप्शन के केस के लिए औचित्यपूर्ण हैं तो इस बात का मतलब नहीं रह जाता कि ये कहां से लाए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में जांच की गुहार से संबंधित अर्जी को 14 दिसंबर 2018 को खारिज कर दिया था, जिसके बाद रिव्यू पिटीशन दाखिल की गई है जिस पर ओपन कोर्ट में सुनवाई हुई थी। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की बेंच ने मामले की सुनवाई की। 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस ऐतराज पर ऑर्डर रिजर्व कर लिया था कि क्या प्रिविलेज्ड दस्तावेज पर रिव्यू पिटीशन सुनी जा सकती है।
-एजेंसियां

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