स्वर्णिम शिखर पर भारत की खिलाड़ी बेटियां

पी.वी. सिन्धू, मानसी जोशी, कोमालिका बारी, रागिनी मार्को, हिमा दास, दुती चंद का कमाल

खेल दिवस से ठीक पहले खिलाड़ी बेटियों ने अपने स्वर्णिम कौशल से दुनिया भर में नारी शक्ति की जो आभा छोड़ी है, उससे अगले साल जापान के टोक्यो शहर में होने जा रहे ओलम्पिक खेलों से एकाएक भारतीय खेलप्रेमियों का अनुराग जाग उठा है। शटलर पी.वी. सिन्धू और मानसी जोशी ने जहां बैडमिंटन में स्वर्णिम प्रदर्शन किया वहीं जमशेदपुर की कोमालिका बारी और जबलपुर की रागिनी मार्को ने मैड्रिड में अपनी अचूक तीरंदाजी से दुनिया भर में वाहवाही लूटी है। हिमा दास और दुती चंद ने ट्रैक पर अपनी तेजी का जलवा दिखाया तो भारतीय हाकी बेटियों ने मेजबान जापान का मानमर्दन कर मादरेवतन का मान बढ़ाया है। जीत-हार खेल का हिस्सा है लेकिन भारतीय बेटियों की यह सफलता इसलिए मायने रखती है क्योंकि इनमें से अधिकांश बेटियां उन घरों से ताल्लुक रखती हैं, जिनके यहां बमुश्किल दो वक्त ही चूल्हा जलता है।

हाल ही भारतीयों के लिए स्विट्जरलैंड का बासेल शहर तब यादगार बन गया जब स्टार बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी. सिन्धू ने फाइनल फोबिया से मुक्त होकर पहली बार विश्व चैम्पियन बनने का गौरव हासिल किया। विश्व चैम्पियनशिप में ऐसा तमाशाई प्रदर्शन करने वाली सिन्धू भारत ही नहीं दुनिया की पहली खिलाड़ी बेटी हैं। पी.वी. ने विश्व चैम्पियनशिप में पांच पदक (एक स्वर्ण, दो रजत व दो कांस्य पदक) जीते हैं, ऐसा कारनामा दुनिया की किसी शटलर के नाम नहीं है। रियो ओलम्पिक में रजत पदक जीतने वाली सिन्धू 2017 व 2018 की विश्व चैम्पियनशिप के फाइनल में स्वर्ण पदक से चूक गई थीं। देखा जाए तो पी.वी. सिन्धू अब तक विभिन्न प्रतियोगिताओं के फाइनल में 16 बार पहुंचीं हैं तथा पांच बार खिताबी जश्न मनाया है।

लगातार तीन साल से इस प्रतियोगिता का फाइनल खेल रही सिन्धू पर दबाव था लेकिन उसने अपने अदम्य साहस और कौशल से फाइनल फोबिया से उबरते हुए जापानी बाला की चुनौती को 34 मिनट में ही ध्वस्त कर दिया। देखा जाए तो इस बार प्रतियोगिता की शुरुआत से ही शटलर पी.वी. ने अपना स्वाभाविक खेल दिखाया तथा अपनी लम्बाई और चपलता से सबको करारा जवाब दिया। इस भारत विजय की सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सिन्धू ने इस दफा दुनिया की शीर्ष वरीय खिलाड़ियों को हराया है। पांचवीं वरीयता हासिल सिन्धू ने क्वार्टर फाइनल में विश्व की दूसरी वरीय चीनी ताइपे की ताई जू यिंग को तो सेमीफाइनल में चौथी वरीयता प्राप्त चीन की चेन यू फेई को सहजता से परास्त किया। फाइनल तक पहुंचते-पहुंचते सिन्धू अपना दबदबा कायम कर चुकी थीं। सिन्धू ने फाइनल में जापान की  तीसरी वरीयता हासिल नोजोमी ओकूहारा को एकतरफा मुकाबलों में हराकर न केवल खिताब जीता बल्कि उससे 2017 में फाइनल में मिली पराजय का बदला भी चुका लिया। निःसंदेह सिन्धू ने अपनी इस कामयाबी के लिये भरपूर मेहनत की तथा उन खामियों से अपने आपको उबारा जो फाइनल में उनकी हार का कारण बनती रही हैं। स्वाभाविक खेल के जरिये पैदा हुआ आत्मविश्वास ही पी.वी. सिन्धू की शानदार जीत का सारथी बना। सिन्धू की यह कामयाबी सिन्धु सी गहराई लिये हुए है जो इस खेल में चीन, जापान व इंडोनेशिया, इंग्लैण्ड का वर्चस्व तोड़ने वाली है। मौलिक प्रतिभा की धनी सिन्धू की नजर अब अगले ओलम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने के लक्ष्य की ओर है। बैडमिंटन के प्रति पी.वी. के जुनून व समर्पण को देखते हुए यह लक्ष्य मुमकिन लगता है। सिन्धू की कामयाबी किसी प्रेरक कहानी सरीखी है जो बताती है कि लगातार हार के बाद भी यदि धैर्य न खोया जाये तथा लक्ष्य को केन्द्र में रखा जाये तो कामयाबी कदम चूमती ही है। आमतौर पर लगातार हार के बाद तमाम दिग्गज हौसला खोने लगते हैं और विजय पथ से भटक जाते हैं, लेकिन सिन्धू ने इसके उलट कामयाबी की पटकथा लिखी है।

सिन्धू की इस जीत के साथ ही इसी खेल में पैरा शटलर मानसी जोशी ने भी अपने जोशीले और दमदार खेल से विश्व पैरा बैडमिंटन चैम्पियनशिप का एकल खिताब अपने नाम किया। मानसी जोशी ने बासेल में विश्व पैरा बैडमिंटन चैम्पियनशिप के महिला एकल एसए-3 फाइनल में हमवतन पारुल परमार को हराकर खिताब जीता। मानसी ने 2011 में एक दुर्घटना में अपना बायां पैर गंवाया था। उसके आठ साल बाद फाइनल में उन्होंने तीन बार की विश्व चैम्पियन परमार को पराजित किया। खिताबी जीत के बाद मानसी जोशी ने कहा कि यह उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। दिव्यांगता को चुनौती दे रही मानसी 2015 से बैडमिंटन खेल रही हैं। मानसी अपने आपको फिट रखने के लिए जहां जिम का सहारा लेती हैं वहीं खेल को नई धार देने को घण्टों कोर्ट पर पसीना बहाती हैं।

भारतीय शटलरों की शानदार सफलता से तीरंदाज बेटियों को भी जीत का संदेश मिला। मैड्रिड में खेली गई जूनियर विश्व तीरंदाजी चैम्पियनशिप में जमशेदपुर की टाटा तीरंदाजी अकादमी की 17 साल की तीरंदाज कोमालिका बारी अण्डर-18 आयु वर्ग में विश्व चैम्पियन बनने वाली भारत की दूसरी तीरंदाज बनीं। कोमालिका से पहले दीपिका कुमारी ने 2009 में यह खिताब जीता था। 2016 में कोमालिका के पिता घनश्याम बारी ने अपनी बेटी को तीरंदाजी सीखने के लिए इसलिए भेजा था ताकि वह फिट रहे लेकिन उसने तीर-कमान को ही अपना हमसफर बना लिया। कोमालिका के तीरंदाजी के प्रति बढ़ते रुझान ने एक समय पिता घनश्याम को ही आर्थिक परेशानी में डाल दिया था। घनश्याम के लिए बेटी को डेढ़ से तीन लाख तक का धनुष दिला पाना आसान नहीं था लेकिन उन्होंने बेटी के सपनों को साकार करने के लिए अपने घर को बेच दिया। इधर कोमालिका के पिता ने घर बेचा उधर कोमालिका को टाटा आर्चरी एकडेमी में जगह मिल गई। एकेडमी में जगह मिलने के बाद कोमालिका को सारी सुविधाएं वहीं से मिलने लगीं।

कोमालिका की मां लक्ष्मी बारी आंगनबाड़ी सेविका हैं। दरअसल लक्ष्मी चाहती थीं कि उनकी बिटिया तीरंदाजी में कौशल दिखाए क्योंकि इस खेल में चोट का खतरा नहीं होता। मां की पसंद को ध्यान में रखते हुए ही कोमालिका ने तीरंदाजी को अपनाया। कोमालिका की इस सफलता का श्रेय टाटा आर्चरी एकेडमी के साथ उसके चचेरे भाई राजकुमार बारी को जाता है जिनकी साइकिल पर सवार होकर वह प्रारम्भिक दिनों में अभ्यास के लिए तार कम्पनी सेण्टर जाती थी। तार कम्पनी सेण्टर में लगभग चार वर्षों के दौरान मिनी व सब जूनियर राष्ट्रीय तीरंदाजी प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन के बाद ही कोमालिका को 2016 में टाटा आर्चरी एकेडमी में प्रवेश मिला। कोमालिका अब तक डेढ़ दर्जन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पदक जीत चुकी है। अब झारखंड की इस बेटी को तीरंदाजी में दीपिका कुमारी के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

कोमालिका की ही तरह मध्य प्रदेश तीरंदाजी एकेडमी जबलपुर की तीरंदाज रागिनी मार्को ने भी मैड्रिड में अपने सटीक निशानों की धूम मचाते हुए स्वर्णिम सफलता हासिल की। रागिनी ने फिरोजपुर (पंजाब) के सुखबीर सिंह के साथ मिलकर भारत को वर्ल्ड यूथ आर्चरी चैम्पियनशिप का स्वर्ण पदक दिलाया। भारत को यह स्वर्ण पदक मिश्रित जूनियर टीम स्पर्धा में मिला। फाइनल मुकाबले में रागिनी और उसके साथी सुखबीर ने स्विट्जरलैंड की एंड्रिया वलारो और जेने हुंसपर्गर की जोड़ी को पराजित किया। रागिनी तीरंदाजी से पहले थ्रो बाल की राष्ट्रीय चैम्पियन रही। रागिनी के सब इंस्पेक्टर पिता मान सिंह चाहते थे कि उनकी बेटी व्यक्तिगत खेलों में हिस्सा ले। आखिर, 2017 में सामाजिक चोचलेबाजी की परवाह किए बिना उन्होंने अपनी बेटी का प्रवेश मध्य प्रदेश तीरंदाजी एकेडमी जबलपुर में कराया और प्रशिक्षक रिछपाल ने मुस्कान किरार की ही तरह रागिनी मार्को को भी स्वर्णिम तीर बरसाने के गुर सिखाये। मध्य प्रदेश के लिए यह संतोष और खुशी की बात है कि उसकी एक नहीं दो-दो बेटियां तीरंदाजी में देश को स्वर्णिम सौगात दे रही हैं। आओ बेटियों के स्वर्णिम प्रदर्शन पर तालियां पीटें और उन्हें खेल की दिशा में प्रोत्साहित करें ताकि स्वस्थ भारत की संकल्पना को फलीभूत किया जा सके।

Shriprakash-shukla

 

श्रीप्रकाश शुक्ला

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