बहुचर्चित रचनाकार धर्मवीर भारती की पुण्‍यतिथि पर विशेष

धर्मवीर भारती छठे दशक के हिंदी साहित्य के बहुचर्चित रचनाकार हैं। हालांकि उनकी चर्चा कविता की तुलना में गद्य लेखन के लिए ज़्यादा हुई। एक समय था जब ‘गुनाहों के देवता’ हर युवा की ज़रूरत बन गई थी, आज भी जो साहित्य में रुचि लेते हैं, वे अपने हमउम्र साथियों के बीच बतकही के दौरान इस उपन्यास की चर्चा ज़रूर करते हैं।
इसके अलावा धर्मवीर भारती की कहानियों का संकलन ‘बंद गली का आख़िरी मकान’ की भी पर्याप्त चर्चा हुई। लेकिन कविता भी एक ऐसी विधा है जिसके रास्ते विचार और भाव प्रवाहित होते हैं। भारती सिर्फ कथा-उपन्यास या गद्य लेखन के महारथी नहीं थे, वे एक कवि के रूप में भी जब अपने पाठकों के सामने आते हैं तब उनके काव्य व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।
‘महाभारत’ के अंतिम चार दिनों के युद्ध पर आधारित धर्मवीर भारती का काव्य नाटक ‘अन्धा युग’ का मंचन बीते कई दशकों से जगह-जगह पर होता रहा है।
भारती के काव्य में विविधता है, उनके काव्य में एक नहीं कई स्वर के सामने आते हैं। अगर आपको युद्ध और उसके बाद उपजे हालात और मनुष्य की महत्वाकांक्षा पर आधारित काव्य नाटक ‘अंधा युग’ पढ़ने को मिलेगा तो श्रृंगार और भोग की कवितायेँ भी मिलेंगी।
उन्होंने अपने काव्य में भी लगभग सभी विषयों को छुआ है, इसीलिए वे हर पाठक की ज़रूरत हैं। सदियों तक अपनी रचनाओं की बदौलत साहित्य जगत में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में मौजूद रहेंगे।
प्रेम और श्रृंगार पर उनकी कविताओं में इतनी स्पष्टता है कि हमारे जैसे पाठकों के लिए सोचना भी बड़ा मुश्किल है, प्रणय की अनंत गहराइयों में डूबे कवि की सहजकल्पना और आत्मस्वीकार की एक बानगी देखिए, अपनी कविता ‘गुनाह का गीत’ में वे लिखते हैं –
अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा मन, शिथिल सतरंगिया आँचल
उसी में खिल पड़ें यदि भूल से कुछ होठ के पाटल
किसी के होंठ पर झुक जायँ कच्चे नैन के बादल
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
किसी की गोद में सिर धर
घटा घनघोर बिखराकर, अगर विश्वास हो जाए
धड़कते वक्ष पर मेरा अगर अस्तित्व खो जाए?
न हो यह वासना तो ज़िन्दगी की माप कैसे हो?
किसी के रूप का सम्मान मुझ पर पाप कैसे हो?
नसों का रेशमी तूफान मुझ पर शाप कैसे हो?
किसी की साँस मैं चुन दूँ
किसी के होठ पर बुन दूँ अगर अंगूर की पर्तें
प्रणय में निभ नहीं पातीं कभी इस तौर की शर्तें
यहाँ तो हर कदम पर स्वर्ग की पगडण्डियाँ घूमीं
अगर मैंने किसी की मदभरी अँगड़ाइयाँ चूमीं
अगर मैंने किसी की साँस की पुरवाइयाँ चूमीं
महज इससे किसी का प्यार मुझ पर पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?
कविता में अपने चरम पर पहुंचकर वासना में बदल जाता है लेकिन वहाँ कोई अपराध का भाव नहीं है। इसी तरह वे कविता ‘फिरोजी होंठ’ में लिखते हैं –
मुझे तो वासना का विष
हमेशा ही लगा अमृत
बशर्ते वासना भी हो तुम्हारे रूप से आबाद
इन फिरोजी होंठों पर बरबाद मेरी ज़िंदगी।
धर्मवीर भारती सौंदर्य के प्रति अपने आकर्षण को छुपाते नहीं बल्कि खुले तौर पर उसका इज़हार करते हैं। इससे भी आगे जब वे सौंदर्य में डूबते हैं तो ‘मुग्धा’ में लिखते हैं –
अब तक तो छाया है खुमार
रेशम की सलज निगाहों पर
हैं अब तक कांपे नहीं अधर
पाकर अधरों का मृदुल भार
सपनों की आदी ये पलकें
कैसे सह पाएंगी चुम्बन ?
ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ श्रृंगार और प्रणय तक ही सीमित हैं, भारती का कवि ह्रदय जीवन के कठोर यथार्थों से भी जूझता है, निराशा और तनाव को भी अपनी कविताओं में शामिल करते हैं।
यह थके कदम, यह हवा सर्द
यह जख़्म चीरता हुआ दर्द
तो क्या है यह ज़िंदगी,
न जिससे मिलता छुटकारा
भारती के काव्य में प्रकृति के प्रति प्रेम भी कम नहीं छलकता –
घाट की सीढ़ी तोड़-तोड़ कर बन-तुलसा उग आयीं
झुरमुट से छन जल पर पड़ती सूरज की परछाईं
तोतापंखी किरनों में हिलती बाँसों की टहनी
यहीं बैठ कहती थी तुमसे सब कहनी-अनकहनी
आज खा गया बछड़ा माँ की रामायन की पोथी
अच्छा अब जाने दो मुझको घर में कितना काम है
इस सीढ़ी पर, यहीं जहाँ पर लगी हुई है काई
फिसल पड़ी थी मैं, फिर बाँहों में कितना शरमायी
यहीं न तुमने उस दिन तोड़ दिया था मेरा कंगन
यहाँ न आऊँगी अब, जाने क्या करने लगता मन !
भारती जी का काव्य नाटक ‘अंधा युग’ महाभारत युद्ध के बाद की घटनाओं की कथा कहता है, बड़ी साफगोई से वे कौरव और पांडव के अमर्यादित होने की प्रक्रिया को दर्ज करते हैं, धृतराष्ट्र का अपने अपराध को स्वीकार करना, गांधारी का कृष्ण को शाप जैसी बहुत सी घटनाएं काव्य नाटक में समाहित हैं। भारतीजी ‘अंधा युग’ के सीमित कलेवर में महाभारत के मार्मिक प्रसंगों को समेटते हैं। यही कारण है कि यह ‘काव्य नाटक’ हिंदी के सर्वश्रेष्ठ नाटकों में से एक है।
-एजेंसी

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