राही मासूम रज़ा और दुष्‍यंत कुमार की जयंती पर विशेष

प्रेम और माधुर्य भाव के गीतों को लिखने में राही मासूम रजा अग्रणी हैं। प्रसिद्ध शायर राही मासूम रजा का जन्म 1 सितंबर 1927 को गाजीपुर में हुआ। निधन 15 मार्च 1992 को मुंबई में हुआ। सामाजिक सरोकार से लिपटी इनकी गजलें और नज्में मन से कई सवाल करती हैं।
रजा ने टीवी सीरियल महाभारत के संवाद भी लिखे थे। राही मासूम रजा की लेखन प्रतिभा को एक-दो गीतों या कविताओं के जरिए नहीं मापा जा सकता। उनका लेखन संसार काफी गहरा और व्यापक है। हम यहां काव्य चर्चा सेक्शन के तहत अपने पाठकों के लिए उनकी एक नज्म पेश कर रहे हैं।
अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे

ज़िंदगी भी हमें आज़माती रही…

ज़हर मिलता रहा ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे
ज़िंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे

हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं…

ज़ख़्म जब भी कोई ज़ेह्न-ओ-दिल पे लगा, ज़िंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं, चोट खाते रहे गुनगुनाते रहे

इतनी यादों के भटके हुए कारवाँ…

कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिये सुन के भी अनसुनी कर गया
इतनी यादों के भटके हुए कारवाँ, दिल के ज़ख़्मों के दर खटखटाते रहे

हम चिराग़े-तमन्ना जलाते रहे…

सख़्त हालात के तेज़ तूफानों में , घिर गयी थी हमारी जुनूने-वफ़ा
हम चिराग़े-तमन्ना जलाते रहे, वो चिराग़े-तमन्ना बुझाते रहे

दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितंबर 1933 को बिजनौर में हुआ था। निधन भोपाल में 30 दिसंबर 1975 को हुआ था।
बहुत आसान है यह कह देना कि दुष्यंत एक बे-बेहरा शायर है, बहुत आसान है यह कह देना कि दुष्यंत हिंदी का शायर है इसलिए उसके यहां व्याकरण का बचकाना दोष है और बहुत आसान यह भी कह देना है कि मुट्ठी भर ग़ज़लें कह कर कोई बड़ा शायर नहीं बन जाता। मगर बहुत कठिन है यह बात स्वीकार कर पाना कि मुट्ठी भर ग़ज़लें कहने वाला यह बे-बेहरा शायर अपनी झोली में कम से कम दो दर्जन ऐसे शेर लिए बैठा है जो अब इतने बड़े हो गए हैं कि किताबों की क़ैद से बाहर निकल आए हैं और इतने तेज़ रफ्तार के भी हो गए हैं कि सरहदों को मुंह चिढ़ाते हुए शायरी समझने वाले लगभग सभी देशों में घूम आए हैं।
आम से दिखने वाले इस शायर को इतनी शोहरत कैसे हासिल हो गयी?
आम से दिखने वाले इस शायर को इतनी शोहरत कैसे हासिल हो गयी? इसका जवाब यह है कि दुष्यंत ने कभी भी शायरी अपने लिए नहीं की बल्कि जब भी कलम उठाया, अपने लोगों के लिए उठाया। जब भी दुख ज़ाहिर किया उन लोगों का किया जिनका दुख दुनिया के लिए कोई मायने नहीं रखता। वही लोग जो अपने दुख अपने सीनों में लिए जीते रहते हैं और ऐसे ही मर जाते हैं। शायर जब अपने दुखों को शब्द देने लगता है तो उसकी शायरी में हल्की- हल्की चिंगारियां नज़र आने लगती हैं और पढ़ने सुनने वालों को धीमी – धीमी आंच महसूस होने लगती है मगर जब शायर अपने दुखों को एक तरफ रख कर अपने लोगों के दुखों को ज़ुबान देता है तो उसके यहां हल्की-फुल्की चिंगारियां नहीं बल्कि एक ऐसी आग पैदा हो जाती है जो पढ़ने और सुनने वालों के चेहरों को ही नहीं बल्कि रूहों को भी दमका जाती है। दुष्यंत कुमार अपने हाथों में अंगारे लिए ऐसा ही एक शायर है जो अपने लोगों की ज़िंदगियां अन्धेरी होने के कारण ही नहीं बताता बल्कि उन्हें रौशन करने के उपाय भी सुझाता है :-
रहनुमाओं की अदाओं पे फिदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कवंल के फूल कुम्लहाने लगे हैं

अब नई तहज़ीब के पेशे – नज़र हम
आदमी को भून कर खाने लगे हैं

कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप
जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही

खड़े हुए थे अलाव की आंच लेने को
सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए

लहूलुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ लोग उठे, दूर जाके बैठ गए

हो गयी है पीर पर्वत सी, पिघलनी चाहिए
इस हिमाला से कोई गंगा निकलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

दुष्यंत ने उम्र भर राजनेताओं की तरफ ही अपनी सोच के अंगारे उछाले…
दिलों की बुझ गयी आग को जलाने और जलाए रखने का हुनर सिखाने वाला यह शायर अगर किसी से सबसे ज़्यादा नफरत करता था तो अपने मुल्क की राजनीति और राजनेताओं से करता था इसीलिए दुष्यंत ने उम्र भर राजनेताओं की तरफ ही अपनी सोच के अंगारे उछाले :-

मत कहो आकाश में कोहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पैर घुटनों तक सना है

भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस यह मुद्दआ

यहां तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियां
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा

देखिए उस तरफ़ उजाला है
जिस तरफ़ रौशनी नहीं जाती

दुष्यंत को सिर्फ सियासत को आईना दिखाने वाला शायर समझ लेना नादानी होगी…
दुष्यंत को सिर्फ सियासत को आइना दिखाने वाला शायर ही समझ लेना इस शायर और इसकी शायरी की अनदेखी करना है, जो कि हम लोग वर्षों से करते आ रहे हैं। दुष्यंत अपने हाथों में अंगारे लिए नज़र आता है मगर दूसरी तरफ उसके सीने में वह महके हुए फूल भी हैं जो जवां दिलों को महकाते हैं और प्रेम की एक अनदेखी और अनजानी फिज़ा कायम करते हैं।
दुष्यंत की रूमानी शायरी में भी उसका खुरदुरापन उसी तरह मौजूद है, मगर यह खुरदुराहट दिल पर ख़राशें नहीं डालती बल्कि एक मीठे से दर्द का एहसास कराती चली जाती है। दुष्यंत कहता है :-

एक आदत सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती

जिसने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ
उस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए

एक जंगल है तेरी आंखों में
मैं जहां राह भूल जाता हूं

तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं

चढ़ाता फिर रहा हूं जो चढ़ावे
तुम्हारे नाम पर बोले हुए हैं

तमाम रात तेरे मयकदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं

तुम्हें भी इस बहाने देख लेंगे
इधर दो चार पत्थर फेंक दो तुम भी

आंधी में सिर्फ हम ही उखड़ कर नहीं गिरे
हमसे जुड़ा हुआ था कोई एक नाम और

तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फसल रही होगी

वह घर में मेज़ पर कोहनी टिकाए बैठी है
थमी हुई है वहीं उम्र आजकल लोगों

दिल के नर्म गोशों को सहलाने वाले शेर उसी के हो सकते हैं जिसकी क़लम अंगारे उगलती है…

दिल के नर्म गोशों को सहलाने वाले यह शेर उसी शायर की क़लम से निकले हैं जिसका क़लम अंगारे उगलने के लिए मशहूर है। चाहते न चाहते हर रचनाकार किसी ना किसी सांचे में ढल ही जाता है या ढाल दिया जाता है। यही मुआमला दुष्यंत के साथ भी हुआ। कुछ बातें इस शायर की शोहरतों के साथ-साथ सफर करती रही हैं, पहली बात यह कि दुष्यंत रूमानी शायरी नहीं कर सकता जिस को रद्द करने के लिए ऊपर दिए गए अशआर ही काफी हैं। दूसरी बात यह है कही जाती है कि दुष्यंत उर्दू का शायर नहीं है बल्की हिंदी का शायर है। इस बात या गुमान को रद्द करने के लिए अशआर पेश करने से पहले यह बताना भी ज़रूरी है कि किसी एक ज़बान का शायर दूसरी जबान के अल्फाज़ न के बराबर इस्तेमाल करता है। अगर दुष्यंत सिर्फ हिंदी का शायर होता तो उर्दू के ऐसे अल्फाज़ का इस्तमाल करते हुए ये अशआर कभी नहीं कहता :-

जो हमको ढूंढने निकला तो फिर वापस नहीं लौटा
तसव्वुर ऐसे ग़ैर – आबाद हल्क़ों तक चला आया

वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको
क़ायदे क़ानून समझाने लगे हैं

कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे
कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही

नज़र-नवाज़ नज़ारा बदल न जाए कहीं
ज़रा सी बात है दिल से निकल न जाए कहीं

हुज़ूर आरिज़ो रुखसार क्या तमाम बदन
मेरी सुने तो मुजस्सम गुलाब हो जाए

यह ज़ुबां हमसे सी नहीं जाती
जिंदगी है कि जी नहीं जाती

मैं बेपनाह अंधेरों को सुब्ह कैसे कहूं
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
कहीं पर शाम सिरहाने लगा के बैठ गए

तमाम रात तेरे मयकदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल ना जाए कहीं

मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम
तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है

शब ग़नीमत थी लोग कहते थे
सुब्ह बदनाम हो रही है अब

अशआर की ये चंद मिसालें हैं जो किसी भी एतबार से किसी हिंदी गज़ल के शायर की नहीं कही जा सकतीं। अब तीसरी बात पर आते हैं वह यह कि दुष्यंत हिंदी का शायर है, यह मान भी लिया जाए तो भी दुष्यंत हिंदी का वैसा आम सा शायर नहीं है जैसा दूसरा हिंदी का शायर समझा जाता है। देखिए शायरी की ज़बान के लिए सबसे जरूरी कोई चीज़ है तो वह यह कि वह ज़बान ऐसे अल्फाज़ अपनी झोली में लिए हुए होती है जो बोलते हुए ज़बान पर बहने का माद्दा रखते हैं। नस्रऔर नज़्म में यही तो फर्क है कि नस्र पढ़ते हुए ज़बान पर बह नहीं सकती, इसमें अटकाव और ठहराव होता है जबकि नज़्म की यह सबसे बड़ी खूबी है कि वह ज़बान पर बहती चली जाती है। इसलिए जिस ज़बान में जितने ज्यादा बहाव वाले अल्फाज़ होते हैं उस ज़बान की शायरी उतनी ही ज़्यादा असरदार, बड़ी और याद रह जाने वाली होती है। दुष्यंत ने हिंदी ज़बान के अल्फाज़ भी खूब इस्तेमाल किए हैं, मगर दुष्यंत का यह कमाल है कि उसने इन अल्फाज़ को बहने वाले अल्फाज़ में तब्दील कर दिया है। यानी अल्फाज़ का बहाव बनाया भी है और निभाया भी है। यह काम वही रचनाकार कर सकता है जो अल्फाज़ में छुपी खामोशियों और अल्फाज़ की खूबियां और खामियों से पूरी तरह वाक़िफ हो। दुष्यंत ने हिंदी अल्फाज़ को किस खूबी से उर्दू ग़ज़ल के भाव में शामिल किया है और उन अल्फाज़ को ग़ज़ल के रिवायती अल्फाज़ के साथ किस फनकारी से चस्पां किया है, यह देखते ही बनता है। यह खूबी हर शायर को मयस्सर नहीं आती। जो नए लोग और पुराने भी, हिंदी ज़बान में ग़ज़लें कह रहे हैं या कहने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें दुष्यंत के ये शेर ज़रूर सुनने और पढ़ने चाहिए और अल्फाज के बहाव पर मंथन करना चाहिए:-

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो आकाश सी छाती तो है

ग़जब है सच को सच कहते नहीं वे
क़ुरानो उपनिषद खोले हुए हैं

किसी संवेदना के काम आएंगे
यहां टूटे हुए पर फेंक दो तुम भी

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है

हिंदी अल्फाज़ की ऐसी रवानी और किसी शायर के यहां मुश्किल से ही देखने को मिलती है…

हिंदी अल्फाज़ की ऐसी रवानी और किसी शायर के यहां मुश्किल से ही देखने को मिलती है। दुष्यंत के यहां हिंदी उर्दू अल्फाज़ की आमेज़िश एक नई ताज़गी के साथ ज़ाहिर हुई है और यह इस शायर की बड़ी खूबी मानी जा सकती है। दुष्यंत के यहां इंसानी कशमकश, जज़्बात, उदासी, महरूमी को भी बहुत फनकारी के साथ बयान किया गया है, जो उसे एक न भूलने वाला शायर बनाता है। इसके अलावा ज़बान की सादगी और ज़बान का हिंदुस्तानीपन दुष्यंत को अपने अहद का सबसे अनोखा और अलबेला शायर भी बनाता है। दिल से निकलने और दिल में उतर जाने वाले कुछ अशआर सुनिए :-

दुख को बहुत सहेज के रखना पड़ा हमें
सुख तो किसी कपूर की टिकिया सा उड़ गया

दिल को बहला ले, इजाज़त है मगर इतना न उड़
रोज़ सपने देख लेकिन इस कदऱ प्यारे न देख

थोड़ी आग बनी रहने दो थोड़ा धुआं निकलने दो
कल देखोगी कई मुसाफिर इसी बहाने आएंगे

अब सब से पूछता हूं बताओ तो कौन था
वो बदनसीब शख़्स जो मेरी जगह जिया
दुष्यंत हिंदी ग़ज़ल का शायर है या उर्दू ग़ज़ल का…
यह बहस खूब की जा सकती है कि दुष्यंत हिंदी ग़ज़ल का शायर है या उर्दू ग़ज़ल का। दुष्यंत बे-बहरा शायर है या नहीं इस पर भी घंटो एक दूसरे का सब्र आज़माया जा सकता है। इस बात पर भी चर्चा हो सकती है कि दुष्यंत ने ग़ज़ल के व्याकरण की अनदेखी अपनी अज्ञानता के कारण की है या अपने बग़ावती तेवर के सबब उसने यह काम जानबूझकर किया है। मगर दुष्यंत नई ग़ज़ल का सच बोलने वाला सबसे अनोखा शायर है जिसकी शायरी तब तक ज़िंदा रहेगी जब तक गरीबों, लाचारों और बेबसों के लिए कोई न कोई आवाज़ उठती रहेगी।

दुष्यंत के बारे में अच्छी और बुरी बातें हर नए दौर में कही जाती रहेंगी लेकिन दुष्यंत ही अकेला ऐसा शायर है जिसने उम्र भर सियासत को मुंह चढ़ाया मगर दुष्यंत के बाद सियासतदानों ने संसद में या संसद के बाहर, विधानसभाओं में या विधानसभाओं के बाहर अपनी बात को मनवाने और अपनी बात में ज़्यादा वज़्न पैदा करने के लिए दुष्यंत को ही हजारों बार कोष किया है। दुष्यंत मायूसी के काले बादलों को तार-तार करने की ताक़त रखता है और दूसरों को भी ऐसा करने पर उकसाता है, तभी तो दुष्यंत का यह शेर उसकी सारी शायरी उसकी सोच और समाज को बदलने, संभालने और सजाने के लिए एक मिसाल बन चुका है :-

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
-एजेंसी

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