उ. Korea को मदद भेजेगा द. कोरिया, शी भी जा रहे हैं उ. कोरिया

सूखे की मार झेल रहे उत्तर Korea को दक्षिण Korea 50 हज़ार टन चावल भेजने की योजना बना रहा है. बीते एक दशक में ये पहली बार है जब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से एक तरह से अलग-थलग पड़े उत्तर कोरिया को दक्षिण कोरिया मानवीय राहत देने वाला है.
उत्तर कोरिया फिलहाल भयंकर सूखे की चपेट में है, और उस पर लगे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के कारण वहां खाद्यान्न की कमी का संकट पैदा हो गया है. दक्षिण कोरिया के एकीकरण मंत्रालय ने कहा है कि वो “जल्द से जल्द” अपने पड़ोसी मुल्क तक चावल पहुंचाएंगे. संयुक्त राष्ट्र का विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) मानवीय राहत पहुंचाने की इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगी.
दक्षिण Korea के एकीकरण मंत्री किम इयोन चुल ने कहा, “उत्तर Korea के लोगों की स्थिति को सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती.”
इससे पहले दक्षिण कोरिया ने साल 2010 में उत्तर कोरिया को मानवीय मदद दी थी. उस वक्त उसने पांच हज़ार टन चावल अपने पड़ोसी के पास भेजा था.
दोनों देशों के बीच हाल में रिश्तों में कुछ गर्माहट आई है. कुछ दिनों पहले दक्षिण Korea ने संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम के लिए 80 लाख डॉलर का दान दिया था. इस कार्यक्रम के तहत उत्तर Korea की महिलाओं और बच्चों को पोषक खाद्य और स्वास्थ्य सुविधाएं देने की योजना थी.
बीते महीने संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट पेश की थी जिसमें कहा गया था कि “उत्तर कोरिया को जल्द से जल्द खाद्यान्न के रूप में मानवीय मदद की ज़रूरत है.”
कितनी गंभीर है उत्तर Korea का खाद्य संकट?
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार इस साल उत्तर Korea के लोगों के 300 ग्राम प्रतिदिन के भोजन पर निर्भर करना पड़ रहा है.
उत्तर Korea में इस साल खाद्यान्न की कमी सूखे के कारण है जो बीते 37 सालों का सबसे भयंकर सूखा बताया जा रहा है. सूखे का असर पूरे देश में खेती पर पड़ा है और इस साल कम उपज हुई है.
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार 2008 के बाद से अब तक, 2018 में उत्तर कोरिया की कृषि पैदावार सबसे रही है.
एक आकलन के अनुसार उत्तर कोरिया के 40 फीसदी लोगों को फौरी तौर पर मानवीय मदद की ज़रूरत है जबकि 70 फीसदी लोग अब भी राशन पर निर्भर कर रहे हैं.
लंबे वक्त से उत्तर कोरिया कृषि उत्पादन के संकट से जूझता रहा है. 1990 के दौर में देश में भयंकर सूखा पड़ा था. माना जाता है कि उस वक्त यहां हज़ारों की संख्या में लोगों की मौत हुई थी.
दावा किया जाता है कि परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के कारण लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का असर न केवल उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था पर हुआ है बल्कि लोगों के लिए खाद्यान्न जुटाने की उसकी क्षमता पर भी पड़ा है.
उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच संबंध
उत्तर कोरिया के साथ दक्षिण कोरिया के संबंधों में हाल के वर्षों में कुछ सुधार हुआ है.
2018 में उत्तर कोरिया ने कहा कि वो परमाणु निरस्त्रीकरण और लंबी दूरी की मिसाइल परीक्षणों पर लगाम लगाएगा. इसके साथ ही दोनों देशों के बीच बातचीत और सहयोग का एक नया मार्ग खुला.
लेकिन फरवरी में दोनों देशों की इन कोशिशों को तब धक्का लगा जब वियतनाम में अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया शासक किम जोंग-उन की मुलाक़ात बेनतीजा रही.
इसके बाद उत्तर कोरिया ने कम दूरी के मिसाइलों का परीक्षण एक बार फिर शुरु किया जिस कारण अमरीका और दक्षिण कोरिया के बीत संबंधों में तनाव आ गया.
आलोचकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के तहत उत्तर कोरिया को खाद्यान्न के रूप में मानवीय मदद नहीं दी जानी चाहिए. लेकिन दक्षिण कोरियाई सरकार का मानना ​​है कि मानवीय मदद का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए.
साथ ही संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के तहत उत्तर कोरिया को मानवीय मदद देने पर कोई प्रतिबंध नहीं है. हालांकि इसके लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति की मंजूरी ज़रूरी है.
दक्षिण कोरिया की योनहाप समाचार एजेंसी की एक रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण कोरिया को उम्मीद है कि मानवीय राहत से दोनों देशों के संबंध और बेहतर होंगे.
फरवरी में वियतनाम शिखरवार्ता के नाकाम होने के बाद से कोरियाई प्रांत के परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर बातचीत ठप है.
उम्मीद की जा रही है कि इसी सप्ताह होने वाले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उत्तर कोरियाई दौरे में एक बार फिर इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती है.
इस बीच डोनल्ड ट्रंप भी दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जेई-इन से मुलाक़ात के लिए दक्षिण कोरिया का दौरा करने वाले हैं.
बुधवार को उत्तर कोरिया के लिए दक्षिण कोरिया के विशेष दूत ली डो-हून ने प्योंगयांग से आग्रह किया था कि वो ट्रंप के दौरे से पहले अगर उत्तर और दक्षिण कोरिया दोनों देशों के शिखर सम्मेलन का निमंत्रण स्वीकार करें.
शी जिनपिंग दो दिवसीय दौरे पर
दूसरी ओर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग गुरुवार को उत्तर कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग-उन से मुलाक़ात करने वाले हैं. शी जिनपिंग उत्तर कोरिया के दो दिन के दौरे पर हैं.
माना जा रहा है कि शी जिनपिंग और किम जोंग-उन के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण और आर्थिक मुद्दों पर बातचीत हो सकती है.
दोनों की ये मुलाक़ात जापान में होने वाले जी20 सम्मेलन से ठीक पहले हो रही है. जापान में शी जिनपिंग अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से भी मुलाक़ात करने वाले हैं.
बीते सालों में शी जिनपिंग और किम जोंग-उन की चार मुलाक़ातें हुई हैं लेकिन 2005 के बाद से दोनों राष्ट्राध्यक्षों की उत्तर कोरिया में ये पहली मुलाक़ात है.
2012 में सत्ता संभालने के बाद से शी जिनपिंग का ये पहला उत्तर कोरियाई दौरा है.
इसी साल फ़रवरी में वियतनाम की राजधानी हनोई में किम और ट्रंप की मुलाक़ात हुई थी. दोनों के बीच परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर सहमति बननी थी लेकिन ये मुलाक़ात बेनतीजा रही थी.
माना जा रहा है कि इसके बाद परमाणु निरस्त्रीकरण पर रुकी चर्चा को इस मुलाक़ात के ज़रिए आगे बढ़ाया जा सकता है.
हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि शी जिनपिंग ये जानना चाहते हैं कि हनोई में क्या हुआ था और क्या बातों को आगे बढ़ाने का कोई रास्ता अब भी बाक़ी है.
विश्लेषक मानते हैं कि शी जिनपिंग इस बारे में जानकारी जापान में डॉनल्ड ट्रंप के साथ साझा कर सकते हैं.
उत्तर कोरिया के लिए चीन उसका प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर है और बेहद अहम है. साथ ही फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहे उत्तर कोरिया के लिए कूटनीतिक तौर पर भी चीन बेहद महत्वपूर्ण है.
चीन को उत्तर कोरिया से क्या चाहिए?
किम जोंग-उन और शी जिनपिंग की मुलाक़ात मात्र एक सप्ताह पहले ही तय हुई थी. अमरीका स्थित विश्लेषण साइट 38 नॉर्थ के प्रबंध संपादक जैनी टाउन का कहना है कि दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 70वीं सालगिरह नज़दीक आ रही है और इस कारण इममें इतने आश्चर्य की कोई बात नहीं है.
हालांकि वो कहती हैं कि जी20 सम्मेलन से ठीक पहले इस दौरे के कुछ “सांकेतिक मायने” भी हो सकते हैं. चीन का मुख्य उद्देश्य है उत्तर कोरिया में स्थायित्व और उसके साथ आर्थिक सहयोग.
ये दोनों देशों में काफ़ी पहले से कम्युनिस्ट नेतृत्व के तहत दोस्ताना संबंध थे. हालांकि रिश्तों में बीते एक दशक में तब तनाव आया, जब चीन ने उत्तर कोरिया के परमाणु महत्वाकांक्षा की आलोचना की.
चीन से छपने वाले अख़बार चाइना डेली ने बुधवार को लिखा था कि इस मुलाक़ात के दौरान दोनों के बीच “कुछ अहम परियोजनाओं पर सहमति बन सकती है.”
वहीं उत्तर कोरिया के अख़बार रोडोंग सिनमुन ने अपने पहले पन्ने पर छपे संपादकीय मे कहा कि शी जिनपिंग परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे पर पर बातचीत के लिए तैयार हैं. अख़बार ने लिखा, “कोरियाई प्रायद्वीप के मुद्दे को सुलझाने में सही दिशा बनाए रखने के लिए चीन उत्तर कोरिया का समर्थन करता है.”
उत्तर कोरिया को चीन से क्या चहिए?
जैनी टाउन कहती हैं कि “उत्तर कोरियाई चाहते हैं कि भले ही भरोसा थोड़ा कम हुआ हो लेकिन उनके पुराने मित्र उनके नज़दीक बने रहें.”
उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण मुश्किल में है. चीन के साथ उनके अच्छे व्यावसायिक संबंध हैं और उनके लिए काफ़ी कुछ दांव पर लगा है.
लेकिन इसे बराबरी का रिश्ता नहीं कहा जा सकता क्योंकि चीन को उत्तर कोरिया की जितनी ज़रूरत है उससे कहीं अधिक ज़रूरत उत्तर कोरिया को चीन की है.
उत्तर कोरिया मामलों के विश्लेषक पीटर वार्ड कहते हैं, “उत्तर कोरिया का अधिकांश निर्यात चीन से होता है. खनिज, मछली, कपड़े और मज़दूर.”
पारंपरिक तौर पर भी चीन उत्तर कोरियाई कारखानों में बना काफ़ी सामान आयात करता है. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण फ़िलहाल ये व्यापार रुक गया है.
पीटर वार्ड कहते हैं, “चीन चाहेगा कि संयुक्त राष्ट्र उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंध ख़त्म करे. चीन सुनिश्चित करना चाहता है कि उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था तरक्की करे और उसे बैलिस्टिक मिसाइलों या परमाणु हथियारों के परीक्षण की आवश्यकता महसूस न हो.”
संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध न उठाने की सूरत में चीन बहुत कुछ नहीं कर पाएगा.
कोरियाई नेशनल डिप्लोमैटिक अकादमी के प्रोफ़ेसर किम ह्यून-वुक ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा है, ”चीन आर्थिक मदद से उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों को कम कर सकता है ताकि किम जोंग उन ट्रंप लेकर अपनी कमज़ोर स्थिति के कारण नकारात्मक ना हों.”
-BBC

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