Sindhi संत स्वामी लीलाशाह जयंती 31 को, संकीर्तन यात्रा निकलेगी

मथुरा। Sindhi समुदाय के मार्गदर्शक आध्यात्मिक गुरू स्वामी लीलाशाह महाराज की 139 जयंती 31 मार्च रविवार को नगर में धूमधाम से मनायी जायेगी। पंचायत के अध्यक्ष नारायणदास लखवानी तथा महामंत्री बसंत मंगलानी ने बताया कि स्वामी लीलाशाह जयंती पर Sindhi जनरल पंचायत द्वारा विविध कार्यक्रम आयोजित किये जायेेंगे।

मुख्य संयोजक रामचंद्र ख़त्री एवं उपाध्यक्ष तुलसी दास गंगवानी ने बताया कि 31 मार्च रविवार को प्रातः 6 बजें बहादुर पुरा स्थित स्वामी लीलाशाह सिंधी धर्मशाला से संकीर्तन यात्रा शुरू होगी जिसमें स्वामी लीलाशाह की छवि की आकर्षक झांकी नगर भ्रमण करेगी। जवाहर हाट, होली गेट, छत्ता बाजार, डोरी बाजार, चौक बाजार, भरतपुर गेट से होते हुए यात्रा अपने उद्गमस्थल पहुंचेगी तदोपरांत भजन-कीर्तन होगा।

Sindhi संत की याद में होगा रक्तदान

रक्तदान शिविर के मुख्य संयोजक चंदनलाल आडवानी तथा संयोजक किशोर इसरानी के नेतृत्व में 2 अप्रैल मंगलवार को दोपहर 12 बजे से म.द.स. जिला चिकित्सालय के ब्लड बैंक में सिंधी युवा संत लीलाशाह की याद में रक्त दान करेंगें। इसी दिन सुबह 8 बजे से कृष्णा आर्चिड में भी विशेष कार्यक्रम होगा।

स्वामी लीलाशाह जयंती के कार्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए शुक्रवार को बहादुर पुरा स्थित सिंधी धर्मशाला में तथा कोतवाली रोड स्थित एक प्रतिष्ठान पर सिंधी जनरल पंचायत की बैठक हुई, जिसमें अध्यक्ष नारायणदास लखवानी, मुख्य संयोजक रामचंद खत्री, बसंत मगलानी, तुलसीदास गंगवानी, किशोर इसरानी, जीवतराम चंदानी, गुरूमुखदास, जितेंद्र लालवानी, किशन भाटिया, चंदनलाल आडवानी, अशोक अंदानी, गोपाल भाटिया, सुदामा खत्री, दौलतराम, झामनदास नाथानी, सुनील पंजवानी, सुंदरखत्री, प्रदीप उकरानी, पीताम्बर रोहेरा, सुरेश मेठवानी, मिर्चुमल, कंहैयालाल भाईजी, लीलाराम लखवानी, अनिल, रमेश नाथानी, विष्णू हेमानी, कंहैया वकिल, भगवानदास बेबू , हरीश चावला, आत्माराम खत्री, सुरेश मनसुखानी, विशनदास, गोविंद चंदानी, आदि ने स्वामी लीलाशाह महाराज की शिक्षाओं का स्मरण करने हेतु कार्यक्रम में भाग लेने की अपील की है।

प्रेरक है स्वामी लीलाशाह का जीवन

स्वामी लीलाशाह जी हर किसी को ईश्वर की उपासना व जनसेवा की ओर प्रेरित करने वाले मानवता के सच्चे हितेषी थे।

सिंधी लेखक किशोर इसरानी ने बताया कि स्वामी जी का जन्म सिंध प्रांत (तत्कालिन भारत का हिस्सा) के हैदराबाद जिले की टंडे बाग तहसील में महाराव चंडाई नामक गांव में सन् 1880 में ब्रहम क्षत्रिय कुल में हुआ था।

श्री इसरानी के अनुसार स्वामी लीलाशाह वेद विद्या और सनातन धर्म के उच्च ज्ञाता थे, वह समाज में व्यप्त कुरीतियों तथा लुप्त होते धार्मिक संस्कारों से काफी दुखी थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति के पुनरोत्थान तथा सोई हुई आध्यात्मिकता को जगाने के लिये बेहतर कार्य किये उन्होंने जहां समाज को आध्यात्मिक संदेश दिया वहीं समाज में फैली कुरीतियों को दूर करने हेतु सबको जागृत किया और दहेज बिना सामुहिक विवाह समारोह के प्रेरक आयोजन शुरू कराये।

किशोर ईसरानी ने बताया कि स्वामी लीलाशाह समाज के निर्बल वर्ग की पीड़ा से काफी आहत रहते थे, उन्होंने निर्धन विद्यार्थियों को पाठ्य सामिग्री एवं आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। कई स्थानों पर धर्मशाला, गौशाला, पाठशाला व सत्संग भवन बनवाये, ऐसे महान संत ने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज सेवा में अर्पण करते हुए 4 नवम्बर सन् 1973 को अपना नश्वर शरीर त्याग दिया।

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