स्त्रियों के अंतर्मन की आवाज़ थीं गौरा पंत ‘शिवानी’

भारत हिंदी साहित्य के इतिहास का एक सुनहरा युग थीं मशहूर लेखिका शिवानी, इस आम भारतीय स्त्री की कलम से लिखी गई कहानी हर एक को अपनी सी लगती है। अपने समय के साहित्यकारों की तुलना में काफी सहज और सादगी से भरी थीं।

उनका साहित्य के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान था। हिंदी साहित्य जगत में शिवानी एक ऐसी कथाकार रहीं जिनकी हिंदी, संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू तथा अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ रही और जो अपनी रचनाओं में उत्तर भारत के कुमाऊँ क्षेत्र के आसपास की लोक संस्कृति की झलक दिखलाने और किरदारों के बेमिसाल चरित्र चित्रण करने के लिए जानी जाती हैं, वह कुछ इस तरह लिखती थीं कि आज भी लोगों की उसे पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है ।

स्त्रियों के अंतर्मन की आवाज़ थीं शिवानी
उन्होंने स्त्री के लगभग सभी पहलुओं का वर्णन अपनी कहानी में किया है। एक स्त्री के जीवन में कई क्षण आते हैं, जिसमें वह कई मनोभावों से होकर गुजरती है, शिवानी जी ने उनके अंतर्मन मे उठती हर लहर को बहुत ही खूबसूरती से अपने पन्नों पर उकेरा है।

वास्तविक नाम गौरा पन्त था
शिवानी जी एक सुप्रसिद्ध महिला उपन्यासकार थीं। वैसे तो, इनका वास्तविक नाम गौरा पन्त था, किन्तु ये उपनाम शिवानी के नाम से लेखन करती थीं। इनका जन्म 17 अक्टूबर 1923 को राजकोट, गुजरात मे हुआ था। और पढ़ाई शान्तिनिकेतन में हुई। शिवानी जी का निधन सन 2003 मे हुआ था।

उनकी लिखी कृतियाँ कृष्णकली, भैरवी, दो सखियां, शमशान चंपा, शान्तिनिकेतन, विषकन्या, चौदह फेरे आदि प्रमुख हैं। शिवानी जी की खासियत उनके कुमाऊँ अंचल के शब्द, जिस कारण मुझे उनकी कहानियां अतिप्रिय है।

वैसे तो किताबें पढ़ने का शौक मुझे बचपन से ही रहा। खासकर हिंदी साहित्य। बहुत सारे साहित्यकार मेरे पसंदीदा रहे हैं, जिन की मैंने लगभग सभी पुस्तकें और उपन्यास पढ़े। उनमें से एक है गौरा पंत जो शिवानी के नाम से साहित्य जगत में प्रसिद्ध है।

उत्तराखंड अंचल की यह साहित्यकार मानवीय संवेदनाओं का वर्णन बहुत सजीव रूप से करती थीं और पहाड़ के कुमाऊँ अंचल की होने के कारण वहाँ की लोक भाषा का जहाँ तहाँ प्रयोग किया करती थीं। मैंने उनके जैसी भाषा शैली और किसी की लेखनी में नहीं देखी। उनके कुछ उपन्यास ऐसे हैं, जिन्हें पढ़कर यह इच्छा होती है कि वे खत्म ही न हों। उपन्यास का कोई भी अंश उसकी कहानी में हमें पूरी तरह डुबो देता है।

अतिथी
शिवानी जी के उपन्यास ‘अतिथि’ का कथानक और शीर्षक दोनो ही अद्भुत है, धीरे धीरे इस उपन्यास में पाठक खो जाता है। उपन्यास की मुख्य पात्र जया सरल और स्वाभिमानी लड़की है, सरकारी मास्टर की बेटी अपने आत्म-सम्मान को ही सब मानती है।

जया के कॉलेज में हुए एक प्रोग्राम के दौरान, प्रदेश के मंत्री माधव बाबू जो कि जया के पिता के बचपन के साथी भी थे, जया को देखते है और मन ही मन उसे अपने बेटे कार्तिक के लिए पसंद कर लेते हैं, माधव बाबू के घर में कोई गरीब की बेटी को अपनाना नहीं चाहता , इसलिए सभी उनके निर्णय से जुड़ जाते हैं।

माधव जी बिना किसी की परवाह किए, बिना जया को शादी कर अपने घर, बहू बनाकर ले आते हैं, जया के परिवार वाले शुरू में इस रिश्ते को पसंद नहीं करते।

माधव बाबू के घर के सदस्यों की नफरत के कारण जया को कैसे, अपने ससुराल में नीचा देखना पड़ता है? कैसे वो स्वाभिमानी लड़की अपने अस्तित्त्व के टुकड़े समेटे आगे की जिंदगी की राह खुद तलाशती है,? कैसे माधव जी को अपनी गलती का पश्चाताप होता है? उपन्यास का हर एक पात्र सजीव, हर एक एहसास जिया हुआ महसूस होता है, शिवानी की दुनिया जितनी स्वाभाविक है उतनी ही संघर्षों से भरी, यहाँ दुख है और अकेलापन भी, इसके बावजूद कोई भी पात्र बेबस लाचार नहीं है, अपनी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीना जानता है, जहां संस्कारों को मानता है, वहीं संकीर्णता और रूढ़ियों को तोड़ता भी है। राजनैतिक, पारिवारिक वैमनस्यता और दो विपरीत विचारधारा वाले लोगों का मेल, इन्हीं उतार चढ़ाव के बीच बुना है शिवानी का ये उपन्यास ‘अतिथि’

इसे पढ़कर जीवन के कटु अनुभव से साक्षात्कार होता है ।

चौदह फेरे
शिवानी जी को असली प्रसिद्धी इसी उपन्यास के कारण मिली किताब का शीर्षक पाठक के मन में जिज्ञासा पैदा करता है और पाठक किताब के साथ पात्रों में समाता चला जाता है। ‘चौदह फेरे’ की मुख्य पात्र अहिल्या का जन्म अलमोड़ा में होता है, लेकिन परिस्थितियों के चलते उसके पिता उसे बोर्डिंग स्कूल, ऊटी भेज देते है। अपनी माँ से बचपन में ही अलग हो जाने वाली अहिल्या अपने पिता की एक महिला मित्र, मल्लिका की संगत में रहकर बड़ी होती है, मॉडर्न परिवेश में पाली अहिल्या का रिश्ता उसके पिता अपने ही समाज में करना चाहते हैं, इसलिये, वो बिटिया को कुमाऊँ अंचल में लेकर आते हैं, वहीं से अहिल्या की जिंदगी में नया मोड़ आता है। नए लोगों का जिंदगी में आना, अजनबी एहसासों का मन में जगह बनाना।

हिमालय जाकर आश्रम में रहने वाली अपनी माँ से मिलना, प्यार के ऊहापोह में फंसे अपने मन को समझाना, दिल की उलझनें, और उन्हें सुलझाने की कोशिश, शिवानी जी ने अनूठे रंगो से रचा है ये उपन्यास ‘चौदह फेरे’

शमशान चंपा
चंपा फूल के बारे में एक कहावत बहुत मशहूर है,

चम्पा तुझ में तीन गुण, रूप, रंग अरु बास।
अवगुण तुझमें एक है, भ्रमर न आवत पास।।

ऐसा लगता है शिवानी जी जब यह उपन्यास लिख रही होंगी तब इसके केंद्र में यही कहावत रही होगी क्योंकि इसकी नायिका का पात्र भी इसी कहावत को चरितार्थ करता है।

शमशान चम्पा में नायिका चम्पा भी खुद मे रूप, रंग और गुणों की मादक कस्तूरी गंध समेटे है, लेकिन पिता की मृत्यु, बिगड़ैल छोटी बहन के कलंक और स्वयं उसकी बदकिस्मती ने उसे बुरी तरह झकझोर डाला। बाहर से संतोषी, संयमी और आत्मविश्वासी दिखने वाली डॉक्टर चम्पा के अभिशप्त जीवन की वेदना की मार्मिक कहानी है ‘श्मशान चंपा’। एक आज्ञाकारी बेटी, एक डॉक्टर जो सबको इलाज और सेवा दे सकती थी, पर अपने अकेलेपन का सन्नाटा भंग नहीं कर पाती है।

सुख के शिखर पर पहुँचाकर स्वयं नियति ही कठोरता से उसे बार-बार नीचे गिराती । जीवन के तूफानों मे अकेले भटकने को भेजती रहती है।

मगर उस अभिशप्त फूल चम्पा की तरह वह भी मजबूर है क्यूंकि यही इन दोनों की नियति है ।

भिक्षुणी
इस कहानी में रेल यात्रा का वर्णन बहुत ही प्रभावित करता है यात्रियों के हाव भाव से शुरू होकर कहानी मनुष्य के मनोभाव को प्रस्तुत करती है।साधारण विचार को महीनता से निरक्षण कर विशेष प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता रखती थीं उनकी कलम ।

कहानी मे लेडी कूपे में घुस आया अजनबी पुरुष कौन था? क्या वह किसी उद्देश्य से घुसा था? इसकी परत बड़ी सावधानी से खुलती है। इस उपन्यास को पढ़कर आप इसके घटनाओं और पात्रों में खो जाएंगे ।

चल खुसरो घर आपने
‘कैसी विचित्र पुतलियाँ लग रही थीं मालती की। जैसे दगदगाती हीरे की दो कनियाँ हों,’ इस तरह के वाक्यों से कहानी में चार चाँद लग गए हैं बार-बार पढ़ने का मन करता है। यह कहानी है कुमुद की, जिसे बिगड़ैल भाई-बहनों ने और आर्थिक पारिवारिक परिस्थितियों के कारण दूर बंगाल जाकर एक राजासाहब की मानसिक रूप से बीमार पत्नी की सेवा का कठिन काम करना पड़ा था।

मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों का मन, संसार, निम्न मध्यवर्गीय परिवार की अनब्याही बेटी और इस बात ग्लानि से अपराध बोध में दबी हुई उसकी माँ का सजीव चित्रण शिवानी के कलम का काम ही हो सकता है।

कालिंदी
स्थान का ऐसा चित्रण! लगता है जैसे मैं ही, अल्मोड़ा पहुँच गई हूँ! डॉक्टर कालिंदी एक स्वयंसिद्धा लड़की है, जिसने अपने जीवन के झंझावातों का डटकर सामना किया! कुमाऊँ की स्त्री शक्ति के लंबे समय से चले आ रहे शोषण और उनकी सहनशक्ति का बेजोड़ वर्णन इस उपन्यास में पढ़ने को मिलता है। नए और पुराने के टकराव और पुनःसृजन की गाथा भी है! शिवानी की मातृभूमि अल्मोड़ा और उस अंचल के गांवों की मिटटी-हवा की गंध से भरी कालिंदी की व्यथा-कथा भारत की उन सैकड़ों लड़कियों की कहानी है, जो आधुनिकता का स्वागत करती हैं, लेकिन परंपरा की डोर को भी नहीं काट पातीं ।

भैरवी
इस उपन्यास में दोहरे जीवन के कश्मकश को बताया गया है, जो कभी सड़क पर निकलती अर्थी के रामनाम को सुनकर माँ से लिपट जाती थी, रात-भर डर से थरथराती रहती थी, वही आज यहाँ शमशान के बीचोंबीच जा रही सड़क पर निडरता से चली जा रही थी। कहीं पर बुझी चिताओं के घेरे से उसकी भगवा धोती छू जाती, कभी बुझ रही चिता का धुआँ हवा के किसी झोंके के साथ नाक-मुँह में घुस जाता।

जटिल जीवन की परिस्थितियों ने थपेड़े मार-मारकर सुन्दरी चन्दन को पति के घर से बाहर किया और भैरवी बनने को बाध्य कर दिया।

जिस माथे पर गुरु ने चिता की भस्म लगा दी हो, क्या उस पर सिन्दूर का टीका फिर कभी लग सकता है? शिवानी के इस रोमांचकारी उपन्यास में सिद्ध साधकों और विकराल रूपधारिणी भैरवियों की दुनिया में भटक कर चली आई भोली, निष्पाप चन्दन एक ऐसी मुक्त बन्दिनी बन जाती है, जो सांसारिक प्रेम-सम्बन्धों में लौटकर आने की इच्छा के बावजूद अपनी अन्तर्रात्मा की बेड़ियाँ नहीं त्याग पाती और सोचती रह जाती है क्या वह यहाँ से निकल जाए? पर कहाँ?

ये और ऐसी अनगिनत, दिलचस्प कथा, कहानी, उपन्यास शिवानी जी ने गढ़े। इनकी कहानियाँ न केवल श्रेष्ठ साहित्यिक उपलब्धियाँ हैं, बल्कि रोचक भी इतनी अधिक हैं कि आप एक बार शुरू करके पूरी पढ़े बिना छोड़ ही नहीं सकेंगे।
-Legend News

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