निरंतर नकारात्मक स्पंदनों से अनिष्ट परिणाम होता है, Shilpa का शोधपत्र

व्यक्ति निरंतर नकारात्मक स्पंदनों के संपर्क में रहे, तो उसपर अनिष्ट परिणाम होता है; परिणामस्वरूप समाज की हानि होने के साथ ही आध्यात्मिक दृष्टि से वातावरण प्रदूषित होता है । यह टालने के लिए हमें आध्यात्मिक स्पंदन और उनका स्वयं के जीवन पर परिणाम के संबंध में सतर्क रहना आवश्यक है । उसके साथ ही यदि हम नियमित साधना करें, तो स्वयं की ओर सकारात्मकता आकर्षित करते हैं । फलस्वरूप अपनेआप अधिकाधिक सात्त्विक विकल्प चुनते हैं, ऐसा प्रतिपादन ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ की श्रीमती Shilpa Magdum ने किया ।

वे 20 सितंबर 2019 को बंगळुरू में 12th IBA International Conference on Corporate Spiritual and Social Responsibility : Redefining Human, Society and Corporation Relationships इस वैज्ञानिक परिषद में बोल रही थीं । इस परिषद का आयोजन ‘इंडस बिजनेस एकेडमी’, बंगळुरू नामक संस्था ने किया था । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी इस शोधप्रबंध के लेखक, तथा सहलेखक विश्‍वविद्यालय के श्री. शॉन क्लार्क हैं ।

श्रीमती मगदूम आगे बोलीं कि, समाज के कल्याण के लिए 70 और 80 के दशक में उद्योगक्षेत्र में ‘शाश्‍वत विकास’ (Sustainable development) और ‘औद्योगिक सामाजिक दायित्व’ (Corporate Social Responsibility (CSR)) ये 2 महत्त्वपूर्ण अभियान प्रारंभ हुए । तब भी आज समाज की स्थिति देखें, तो सत्ता के व्यक्तियों का चरित्र, भ्रष्टाचार, लोभ, शिक्षा का अभाव, प्रयत्नों में निरंतरता का अभाव, एकत्रित प्रयत्नों का अभाव आदि सूत्रों के कारण इन अभियानों की फलोत्पत्ति अल्प है । ये अभियान प्रारंभ होकर 50 वर्ष बीत चुके हैं, तब भी आज अपने आस-पास देखें, तो बडी मात्रा में पर्यावरण में अनिष्ट परिवर्तन, युद्ध का साया जैसे आपात्काल उत्पन्न करनेवाले संकट दिखाई देते हैं । यह सब देखते हुए स्वाभाविक ही सबके मन में यह प्रश्‍न उत्पन्न होता है कि, क्या इसमें मानवजाति से कुछ गलती हो रही है ? इसमें ‘धर्मपालन का अभाव’, यह गलती हो रही है । आद्य शंकराचार्यजी ने ‘धर्म’ की आगे दी हुई व्याख्या की है तथा वह आगे दिए तीन कार्य करता है :
अ. समाजव्यवस्था उत्तम स्थिति में रखना ।
आ. प्रत्येक प्राणिमात्र की ऐहिक उन्नति करना ।
इ. आध्यात्मिक उन्नति भी साध्य करना ।
वर्तमान स्थिति में औद्योगिक आचारसंहिता के वैचारिक नेतृत्व का ध्यान सूत्र क्र. ‘अ.’ और ‘आ.’ की ओर है; परंतु किसी का भी ध्यान सूत्र क्र. ‘इ.’ (आध्यात्मिक उन्नति) की ओर नहीं है । आध्यात्मिक उन्नति साधने के लिए किए जानेवाले प्रयत्नों के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण प्रयत्न है अपने जीवन तथा हम जो करते हैं, उसमें सकारात्मकता बढाना और नकारात्मकता न्यून करना ।
इसके पश्‍चात श्रीमती मगदूम ने ‘महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय’ की ओर से ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ का उपयोग कर किए हुए विपुल शोधों के प्रयोगों के संबंध में जानकारी दी । ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर’ (यु.ए.एस.) नामक वैज्ञानिक उपकरण भूतपूर्व अणु वैज्ञानिक डॉ. मन्नम मूर्ति ने विकसित किया है । ‘यु.ए.एस.’ उपकरण द्वारा किसी भी वस्तु, वास्तु अथवा व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा, नकारात्मक ऊर्जा तथा कुल प्रभामंडल मापा जा सकता है । पहला प्रयोग पहरावे पर था ।

इस प्रयोग में एक महिला आगे दिए हुए 7 प्रकार के पहरावे परिधान किए थे तथा प्रत्येक पहराव ३० मिनट परिधान किया था – 1. ‘व्हाईट इवनिंग गाऊन’, 2. ‘ब्लैक ट्यूब टॉप ड्रेस’ (‘ऑफ शेल्डर’, अर्थात कंधे पर खुला काले रंग का पश्‍चिमी पहरावा), 3. काली टी-शर्ट और काली पैंट, 4. सफेद टी-शर्ट और सफेद पैंट, 5. सलवार-कुरता, 6. छः गज की साडी एवं 7. नौ गज की साडी । प्रत्येक पहरावा परिधान करने से पूर्व तथा करने के उपरांत उसका ‘यु.ए.एस.’ द्वारा परीक्षण किया गया ।

उस महिला द्वारा पहले 4 पहरावे परिधान करने के उपरांत स्पष्ट हुआ कि उसकी नकारात्मक ऊर्जा बढ गई है ।

तदुपरांत के 3 पहरावे परिधान करने के पश्‍चात उसकी नकारात्मक ऊर्जा घट गई । पहरावा क्र. 3 और 4 एक समान थे, केवल रंग में भेद था, तब भी पहरावा क्र. 3 (काले रंग का पहराव) परिधान करने पर पहरावा क्र. 4 की तुलना में उसमें अधिक मात्रा में नकारात्मक ऊर्जा दिखाई देना विशेष है । महिला में सकारात्मक ऊर्जा केवल, अंत के 3 पहरावे परिधान करने पर दिखाई दी । इस प्रयोग से स्पष्ट होता है कि पहरावे का प्रकार और रंग का व्यक्ति पर आध्यात्मिक (ऊर्जा के) स्तरपर परिणाम होता है; परंतु पहरावों की निर्मिति करनेवाले प्रतिष्ठान और संबंधित व्यवसायी (फैशन डिजाइनर) इस संबंध में पूर्णतः अनभिज्ञ हैं ।

तदुपरांत श्रीमती मगदूम ने दूसरे प्रयोग की जानकारी दी । इस प्रयोग में एक व्यक्ति को वैज्ञानिकों के मतानुसार क्रमशः कष्टदायक ‘हेवी मेटल’ नामक संगीत, ‘सर्वाधिक शिथिलता निर्माण करनेवाला’, ‘वेटलेस’ (Weightless) नामक पाश्‍चात्त्य संगीत, सुप्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय गायक का गायन और संत भक्तराज महाराजजी का भजन प्रत्येक ५ मिनट सुनाया गया । प्रत्येक प्रकार का संगीत सुनने से पूर्व तथा सुनने के पश्‍चात उस साधक के ‘यु.ए.एस.’ उपकरण द्वारा निरीक्षण किए गए । ‘हेवी मेटल’ संगीत सुनने के पश्‍चात व्यक्ति में अधिक मात्रा में नकारात्मक ऊर्जा दिखाई दी । सर्वाधिक शिथिलता निर्माण करनेवाला पाश्‍चात्त्य संगीत सुनने का ऊर्जा के स्तर पर न्यूनतम परिणाम दिखाई दिया । ये दोनों प्रकार के संगीत सुनने के उपरांत व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा नहीं दिखाई दी । इसके विपरीत सुप्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय गायक का गायन और संत भक्तराज महाराजजी का भजन सुनने के पश्‍चात व्यक्ति में नकारात्मक ऊर्जा नहीं दिखाई दी; परंतु उसकी सकारात्मक ऊर्जा बढ गई । सकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि भजन सुनने के उपरांत सर्वाधिक थी ।
अधिकांश कलाकार, संगीतकार, संगीत क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को संगीत का श्रोताआें पर होनेवाले आध्यात्मिक स्तर के परिणाम के संबंध में जानकारी नहीं होती । कोई गीत लोकप्रिय होनेपर ‘इंटरनेट’ के माध्यम से वह लाखों लोगों तक पहुंचता है । इसलिए यदि कोई लोकप्रिय गीत नकारात्मक ऊर्जा प्रक्षेपित कर रहा हो (जो अधिकतर होते हुए हमें दिखाई नहीं दिया है) उसका लाखों लोगों पर आध्यात्मिक स्तरपर अनिष्ट परिणाम होता है । शाश्‍वत विकास और व्यवसायिक सामाजिक दायित्व से परे ‘आध्यात्मिक परिणाम’ नामक एक सूत्र है एवं नए उत्पादनों और सेवाआें की निर्मिति के समय उनका विचार करना अत्यंत आवश्यक है, यह इस शोधप्रबंध के माध्यम से अधोरेखित किया गया । उद्योग और उपभोक्ता इन दोनों घटकों को इस संबंध में भान होना आवश्यक है; क्योंकि निरंतर नकारात्मक स्पंदनों के संपर्क में रहने से व्यक्ति पर उसका अनिष्ट परिणाम होता है । परिणामस्वरूप समाज की हानि होती है तथा वातावरण में आध्यात्मिक प्रदूषण होता है । इसे रोकने के लिए नित्य साधना करना ही उपाय है, ऐसा भी श्रीमती मगदूम ने अंत में कहा ।

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